ताऊ की चौपाल में : दिमागी कसरत - 34

ताऊ की चौपाल मे आपका स्वागत है. ताऊ की चौपाल मे सांस्कृतिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक विषयों पर सवाल पूछे जायेंगे. आशा है आपको हमारा यह प्रयास अवश्य पसंद आयेगा.

सवाल के विषय मे आप तथ्यपुर्ण जानकारी हिंदी भाषा मे, टिप्पणी द्वारा दे सकें तो यह सराहनीय प्रयास होगा.


आज का सवाल नीचे दिया है. इसका जवाव और विजेताओं के नाम अगला सवाल आने के साथ साथ, इसी पोस्ट मे अपडेट कर दिया जायेगा.


आज का सवाल :-

गांधारी ने भगवान कृष्ण को श्राप क्युं दिया था?


अब ताऊ की रामराम.


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Promoted By : ताऊ और भतीजाएवम कोटिश:धन्यवाद

8 comments:

  seema gupta

2 January 2010 at 08:32

दुर्योधन के अंत के साथ ही महाभारत के महायुद्ध का भी अंत हो गया । माता गाँधारी दुर्योधन के शव के पास खडी फफक-फफक कर रो रही हैं । पुत्र वियोग में “गाँधारी का भगवान कृष्ण को श्राप देना, भगवान कृष्ण का श्राप को स्वीकार करना और गाँधारी का पश्चताप करना” । इसका बडा ही मार्मिक वर्णन किया है धर्मवीर भारती जी ने (गीता-कविता से संकलित)

गाँधारी : ह्र्दय विदारक स्वर में

तो वह पडा है कंकाल मेरे पुत्र का
किया है यह सब कुछ कृष्ण
तुमने किया है सब
सुनो
आज तुम भी सुनो
मैं तपस्विनी गाँधारी
अपने सारे जीवन के पुण्यों का
बल ले कर कहती हूँ
कृष्ण सुनो
तुम अगर चाहते तो रूक सकता था युद्द यह
मैंने प्रसव नहीं किया था कंकाल वह
इंगित पर तुम्हारे ही भीम ने अधर्म किया
क्यों नहीं तुमने यह शाप दिया भीम को
जो तुमने दिया अश्वत्थामा को
तुमने किया है प्रभुता का दुरूपयोग
यदि मेरी सेवा में बल है
संचित तप में धर्म है
प्रभु हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को परस्पर फाड खायेगा
तुम खुद उनका विनाश कर के कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभु हो पर मारे जाओगे पशु की तरह

regards

  seema gupta

2 January 2010 at 08:37

गांधारी अपने सौ पुत्रों के मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया कि तुम्हारे कारण से जिस प्रकार से मेरे सौ पुत्रों का आपस में लड़ कर के नाश हुआ है उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी आपस में एक दूसरे को मारने के कारण नाश हो जायेगा।

regards

  seema gupta

2 January 2010 at 08:38

भगवान श्री कृष्णचन्द्र ने माता गांधारी के उस श्राप को पूर्ण करने के लिये यादवों की मति को फेर दिया। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। इस पर दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया कि यादव वंश का नाश हो जाये। उनके शाप के प्रभाव से यदुवंशी पर्व के दिन प्रभास क्षेत्र में आये। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले हो कर एक दूसरे को मारने लगे। इस तरह से भगवान श्री कृष्णचन्द्र को छोड़ कर एक भी यादव जीवित न बचा। इस घटना के बाद भगवान श्री कृष्णचन्द्र महाप्रयाण कर के स्वधाम चले जाने के विचार से सोमनाथ के पास वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानस्थ हो गये। जरा नामक एक बहेलिये ने भूलवश उन्हें हिरण समझ कर विषयुक्त बाण चला दिया जो के उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्री कृष्णचन्द्र स्वधाम को पधार गये।
regards

  Sadhana Vaid

2 January 2010 at 08:40

गांधारी ने कृष्ण को इसलिये श्राप दिया था क्योंकि उसका मानना था कि कृष्ण ने युद्ध में अधर्म का सहारा लेकर पाण्डवों की सहायता की और कौरवों को अनीति से मरवाया । श्राप उसने दुर्योधन के शव को देखने के बाद दिया था जिसकी मृत्यु गदा युद्ध में हुई थी जिसमें उस पर युद्ध के नियमों के विरुद्ध कमर के नीचे वार किया गया था और यह सब कृष्ण के सामने उनके प्रोत्साहन पर हुआ था ।

  संगीता पुरी

2 January 2010 at 08:42

गांधारी का मानना था कि यदि कृष्ण ने बड़े होने की बात कहकर पूर्ण नग्न होकर जाने के बजाए केले के पत्ते लपेटने की सलाह न दी होती तो भीम की गदा दुयरेधन का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसी बात से दुखी होकर गांधारी ने कहा था तुम भी इसी तरह तड़प कर मरोगे कोई सहायता भी नहीं कर सकेगा।

  Udan Tashtari

2 January 2010 at 08:46

भगवान श्री कृष्णचन्द्र ने माता गांधारी के उस श्राप को पूर्ण करने के लिये यादवों की मति को फेर दिया। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। इस पर दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया कि यादव वंश का नाश हो जाये। उनके शाप के प्रभाव से यदुवंशी पर्व के दिन प्रभास क्षेत्र में आये। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले हो कर एक दूसरे को मारने लगे। इस तरह से भगवान श्री कृष्णचन्द्र को छोड़ कर एक भी यादव जीवित न बचा। इस घटना के बाद भगवान श्री कृष्णचन्द्र महाप्रयाण कर के स्वधाम चले जाने के विचार से सोमनाथ के पास वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानस्थ हो गये। जरा नामक एक बहेलिये ने भूलवश उन्हें हिरण समझ कर विषयुक्त बाण चला दिया जो के उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्री कृष्णचन्द्र स्वधाम को पधार गये।


haa haa haa!!

regards

  संगीता पुरी

2 January 2010 at 08:47

साल 2009 की मेगा पहेली (158) में निचे के चित्र पर चटका लगाकर जवाब दिजिये. हिंट दो की पोस्ट आज ठीक ९:०० बजे प्रकाशित होगी.
इसका जबाब तो दिया जा चुका है .. समझ में नहीं आया !!

  प्रकाश गोविन्द

2 January 2010 at 15:07

सीमा जी की सारी टिप्पणियां जमा करता जा रहा हूँ .... बाद में उन्हें क्रम से लगाकर दोबारा पढ़ लूँगा ! सम्पूर्ण महाभारत को समझने में बहुत मदद मिलेगी.
आपने धर्मवीर भारती की काव्य पंक्तियों को यहाँ प्रस्तुत करके दिल खुश कर दिया ! मुझे याद आ रहा है संभवतः भारती जी की अमर कृति 'अँधा युग' में यही काव्य पंक्तियाँ हैं !
बहुत सुन्दर और विस्तृत जानकारी मिल रही है .....
आभार

समीर जी भी निरंतर बहुत परिश्रम कर रहे हैं :)

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