ताऊ की चौपाल मे : दिमागी कसरत - 43


नमस्कार दोस्तों. मैं आचार्य हीरामन "अंकशाश्त्री" आज सुबह की दिमागी कसरत की कक्षा मे आपका स्वागत करता हूं. आप अगर मेरी क्लास में नियमित आते रहे तो आपका दिमाग बिल्कुल मेरी तरह यानि तेज कैंची की तरह चलने लगेगा. तो आज हम आपको एक इतिहास का सवाल दे रहे हैं. इसका जवाब दिजिये. फ़िर हम आपकी कापी चेक करके बतायेंगे कि आपके दिमाग की कसरत कितनी हुई?

सवाल यह रहा :-


मेवाड़ के सलुम्बर ठिकाने की रानी हाड़ी ने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी के तौर पर क्या भेजा था


तो फ़टाफ़ट जवाब दिजिये!

आभार : श्री समीरलाल "समीर"

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Promoted By : ताऊ और भतीजाएवम कोटिश:धन्यवाद

11 comments:

  Rekhaa Prahalad

11 January 2010 at 08:12

apana sar kat ke diya tha:(

  Rekhaa Prahalad

11 January 2010 at 08:21

अपना सर कट्वाके भेजा:(

  seema gupta

11 January 2010 at 08:24

अपना सिर काट कर भिजवा दिया था |
regards

  seema gupta

11 January 2010 at 08:25

यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत रतन सिंह चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला | नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा | सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके | और रावत रतन सिंह चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया |
regards

  Udan Tashtari

11 January 2010 at 08:25

रानी हाड़ी ने अपना सर भेंट दिया था राजा को!युध में जाने के लिए!

  Udan Tashtari

11 January 2010 at 08:26

Hadi Rani a legendary character daughter of Hada Rajput married to Chundawat Chieften of Salumbar, Mewar who sacrificed herself to motivate her husband to go to the War.

When Maharana Raj Singh I (1653-1680) of Mewar called her husband to join the battle against Aurangzeb, the Sardar having married only a few days earlier hesitated about going into battle.

However Rajput honour being what it is, he had to join the battle. He asked his wife Hadi Rani for some memento to take with him to the battlefield.

Thinking that she was an obstacle to his doing his duty for Mewar, she ordered that her head be severed and presented to her husband. The Sardar shattered but nevertheless proud tied the memento around his neck by its hair. With no one to live for, he fought bravely until he was killed. This story is not true. since hadi rani did not die so early. Besides Rajsinh was not a coward to hesitate for going on a battlefield. He opened war with Aurangzeb immediately after he came into power.

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

11 January 2010 at 08:36

अपना सिर काट कर भिजवा दिया था। क्यों कि राजा ने कहा था कि युद्ध भूमि में उसे रानी का स्मरण रहेगा। रानी ने सोचा कि मैं जीवित रही तो युद्ध मेरे ध्यान के कारण ठीक से नहीं लड़ा जा सकेगा। उस ने अपना सर काट कर भेज दिया।

  संगीता पुरी

11 January 2010 at 09:32

अपना सर !!

  संगीता पुरी

11 January 2010 at 09:37

तीसरे दिन फिर एक आया । इस बार वह पत्नी के नाम सरदार का पत्र लाया था । प्रिय मैं यहां शत्रुओं से लोहा ले रहा हूं । अंगद के समना पैर जमारक उनको रोक दिया है ।मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाएं । यह तो तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है॥ पत्रवाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवष्य भेज देना । उसे ही देखकर मैं मन को हल्का कर लिया करूगा । हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयी । युद्धरत पति कामन यदि में रके में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से केसे लड़ेंगे । विजय श्री का वरण कैसे करेंगे ? सके मन में एक विचार कौंधा । वह सैनिक से बोली वीर ? मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूं । इसे ले जाकर उ न्हें दे देना । थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना । किन्तु इसे कोई और न देखे । वे ही खोल कर देखें । साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना । हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय । मैं तुम्हेंअपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं । तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं । अब बेफिक्र होरक अपने कर्तव्य कापालन करें मैं तो ची ............ स्वर्ग में तुम्हारी बाट जोहूंगी ।
पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल , एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया । वह धरती पर लुढ़क पड़ा । सिपाही के नेत्रो से अश्रुधारा बह निकल । कर्तव्य कर्म कठोर होता है सैनिक ने स्वर्णथाल में हाड़ी रानी के कटे सिर को सजाया । सुहाग के चूनर से उसको ढका । भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा । उसको दखकर हाड़ा सरदार स्तब्ध रह गया उसे समझ में न आया कि उसके नेत्रों से अश्रुधारा क्यों बह रही है ? धीरे से वह बोला क्यों यदुसिंह । रानी की निषानी ले आए ?यदु ने कांपते हाथों से थाल उसकी ओर बढ़ा दिया । हाड़ा सरदार फटी आंखो से पत्नी का सिर देखता रह गया । उसके मुख से केवल इतना निकला उफ्‌ हाय रानी । तुमने यह क्या कर डाला । संदेही पति को इतनी बड़ी सजा दे डाली खैर । मैं भी तुमसे मिलने आ रहा हूं ।
हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे । वह शत्रु पर टूट पड़ा । इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है । जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा । औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नही ही बढ़ने दिया , जब तक मुसगल बादषाह मैदान छोड़कर भाग नहीं गया था ।इस विजय को श्रेय किसको ? राणा राजसिंहि को या हाड़ा सरदार को । या हाड़ी रानी को अथवा उसकी इस अनोखी निशानी को ?

  संजय बेंगाणी

11 January 2010 at 11:08

यह प्रेम, बलिदान, शौर्य की कहानी है जो हमारे बच्चे किताबों में नहीं पढ़ते क्योंकि वे चरित्रहिन मुगलों के गुणगान पढ़ते है.

वास्तव में स्वतंत्रता के बाद भी शीश कटा है भारतीयता का.

  Ratan Singh Shekhawat

11 January 2010 at 20:16

हाड़ी रानी के बारे में काफी जानकारी दी चुकी है | अत: मै हाड़ी रानी पर कुछ लिखने के बजाय यहाँ कवि मेघराज "मुकुल" की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ |

सैनांण पड्यो हथलेवे रो,हिन्लू माथै में दमकै ही |
रखडी फैरा री आण लियां गमगमाट करती गमकै ही |
कांगण-डोरों पूंछे माही, चुडलो सुहाग ले सुघडाई |
चुन्दडी रो रंग न छुट्यो हो, था बंध्या रह्या बिछिया थांई |

अरमान सुहाग-रात रा ले, छत्राणी महलां में आई |
ठमकै सूं ठुमक-ठुमक छम-छम चढ़गी महलां में सरमाई |
पोढ़ण री अमर लियां आसां,प्यासा नैणा में लियां हेत |
चुण्डावत गठजोड़ो खोल्यो, तन-मन री सुध-बुध अमित मेट |

पण बाज रही थी सहनाई ,महलां में गुंज्यो शंखनाद |
अधरां पर अधर झुक्या रह गया , सरदार भूल गयो आलिंगन |
राजपूती मुख पीलो पड्ग्यो, बोल्यो , रण में नही जवुलां |
राणी ! थारी पलकां सहला , हूँ गीत हेत रा गाऊंला |
आ बात उचित है कीं हद तक , ब्या" में भी चैन न ले पाऊ ?
मेवाड़ भलां क्यों न दास, हूं रण में लड़ण नही ञाऊ |
बोली छात्रणी, "नाथ ! आज थे मती पधारो रण माहीं |
तलवार बताधो , हूं जासूं , थे चुडो पैर रैवो घर माहीं |

कह, कूद पड़ी झट सेज त्याग, नैणा मै अग्नि झमक उठी |
चंडी रूप बण्यो छिण में , बिकराल भवानी भभक उठी |
बोली आ बात जचे कोनी,पति नै चाहूँ मै मरवाणो |
पति म्हारो कोमल कुम्पल सो, फुलां सो छिण में मुरझाणो |
पैल्याँ कीं समझ नही आई, पागल सो बैठ्यो रह्यो मुर्ख |
पण बात समझ में जद आई , हो गया नैन इक्दम्म सुर्ख |
बिजली सी चाली रग-रग में, वो धार कवच उतरयो पोडी |
हुँकार "बम-बम महादेव" , " ठक-ठक-ठक ठपक" बढ़ी घोड़ी |

पैल्याँ राणी ने हरख हुयो,पण फेर ज्यान सी निकल गई |
कालजो मुंह कानी आयो, डब-डब आँखङियां पथर गई |
उन्मत सी भाजी महलां में, फ़िर बीच झरोखा टिका नैण |
बारे दरवाजे चुण्डावत, उच्चार रह्यो थो वीर बैण |
आँख्या सूं आँख मिली छिण में , सरदार वीरता बरसाई |
सेवक ने भेज रावले में, अन्तिम सैनाणी मंगवाई |
सेवक पहुँच्यो अन्तःपुर में, राणी सूं मांगी सैनाणी |
राणी सहमी फ़िर गरज उठी, बोली कह दे मरगी राणी |

फ़िर कह्यो, ठहर ! लै सैनाणी, कह झपट खडग खिंच्यो भारी |
सिर काट्यो हाथ में उछल पड्यो, सेवक ले भाग्यो सैनाणी |
सरदार उछ्ल्यो घोड़ी पर, बोल्यो, " ल्या-ल्या-ल्या सैनाणी |
फ़िर देख्यो कटयो सीस हंसतो, बोल्यो, राणी ! राणी ! मेरी राणी !

तूं भली सैनाणी दी है राणी ! है धन्य- धन्य तू छत्राणी |
हूं भूल चुक्यो हो रण पथ ने, तू भलो पाठ दीन्यो राणी |
कह ऐड लगायी घोड़ी कै, रण बीच भयंकर हुयो नाद |
के हरी करी गर्जन भारी, अरि-गण रै ऊपर पड़ी गाज |

फ़िर कटयो सीस गळ में धारयो, बेणी री दो लाट बाँट बळी |
उन्मत बण्यो फ़िर करद धार, असपत फौज नै खूब दळी |
सरदार विजय पाई रण में , सारी जगती बोली, जय हो |
रण-देवी हाड़ी राणी री, माँ भारत री जय हो ! जय हो !
हाड़ी रानी और उसकी सैनाणी ( निशानी )”

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