वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : श्री ललित शर्मा

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमने वैशाखनंदन सम्मान पुरस्कारों की घोषणा की थी. जिसके लिये हमें बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हुई हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. जैसा की हमने बताया था कि शामिल प्रविष्टियों का प्रकाशन ताऊजी डाट काम पर किया जायेगा. उसी घोषणा अनुसार आज से हम प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. रचनाएं भेजने एवम पूछताछ के लिये contest@taau.in पर संपर्क करें.

आज हम श्री ललित शर्मा की रचना यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

लेखक का परिचय :-
नाम-ललित शर्मा
शिक्षा- स्नातकोत्तर उपाधि
उम्र- 41 वर्ष
व्यवसाय- शिक्षाविद,लेखन, अध्यन,
आरंभ--पत्रकारिता से
शौक-शुटिंग (रायफ़ल एव पिस्टल), पेंटिंग(वाटर कलर, आईल, एक्रेलिक कलर, वैक्स इत्यादि से,)
भ्रमण, देशाटन लगभग सम्पुर्ण भारत का (लेह लद्दाख को छोड़ कर)
स्थान-अभनपुर जिला रायपुर (छ.ग.) पिन-493661

वेलेन्टाईन डे पर रांझे का प्रेम पत्र हीर के नाम!!!

प्रिय, हीर

आशा है कि तुम कु्शल होगी

प्रिय एक अर्से के बाद पत्र लिख रहा हूँ। आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है,क्या तुम्हे पता है? आज लोग वेलेन्टाईन डे मना रहे हैं। हमारे दे्श में यह एक नया अंग्रेजी जुगाड़ आया है, प्रेम का इजहार करने के लिए। कोई नैन मट्टके की जरुरत नही है, डायरेक्ट कान्ट्रेक्ट है। पहले तो पहल सिर्फ़ लड़कों की तरफ़ से होती थी, अब लड़के-लड़की दोनो ही प्रेम का इजहार कर सकते है। पहले सफ़ेद गुलाब पेश किया जाता है,फ़िर पीला गुलाब, जब दोनो कबु्ल हो गए तो झट से लाल गुलाब थमा दिया जाता है, या फ़िर कोई तो सीधे ही लाल पर आ जाता है, समय गंवाने की जरुरत नही। फ़टाफ़ट प्रेम कबुल हुआ फ़िर तैयार है झमा-झम करती बाईक, लांग ड्राईव के लिए। दो बार की लांग ड्राईव से बाईक का दम निकल जाता है और सवार का भी. फुल भी मुरझा जाता है. फिर से यही फ़ूल बनाने प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है. तुम्हारे-हमारे प्रेम की तरह अब कुछ भी टिकाऊ नहीं है. सब कुछ नकली है.

याद करो जब तुम और हम पहली बार जब हम स्कुल में आमने सामने हुए थे. एक प्रेम की चिंगारी हमारे दिल में फूटी थी. जिसकी लपट को हमारे हिंदी के गुरूजी ने अपने अंतर चक्षुओं से देख लिया था, कामायनी पढ़ाते हुए कहा था कि "घटायें उमड़-घुमड़ कर आ रही हैं. बिजली चमक रही है, आग दोनों तरफ बराबर लगी हुयी है. बस बरसात होनी बाकी है". उस समय तक हमें पता ही नहीं था कि यही प्रेम होता है. इसका खुलासा तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध से हुआ था. क्या जमाना था वह? बिना प्रेम प्रकटन के ही प्रकट हो जाता था. मित्रों को भी पता चल जाता था. कहीं तो कुछ है। जब हम दिन में कई बार जुल्फें संवारते थे.

प्रेम-पत्र लिखना भी एक कला होती थी. रात-रात भर जाग कर पत्र का मसौदा तैयार करते थे. फिर उसे कई बार पढ़ते थे. किसी बोर्ड परीक्षा से भी बढ़कर यह परीक्षा होती थी. सबसे जोखिम भरा काम होता था उन्हें तुम्हारे तक पहुँचाना. जिसमे जान जाने का खतरा भी था. शायद हमारे ज़माने में इसीलिए प्रेमियों को जांबाज कहा जाता था. बड़ी तिकड़म लगानी पड़ती थी एक पत्र को पहुँचाने में. याद है तुम्हे एक बार चुन्नू के हाथों भेजा गया पत्र तुम्हारी भाभी के हाथ लग गया था और बात तुम्हारे पिताजी तक पहुँच गई थी. फ़िर क्या सुपर रिन से तुम्हारी धुलाई हुई थी कि आज तक चमक नही गई होगी। वह समय जिन्दगी का सबसे मुस्किल समय था.

हमें भी फौजी पिता से पिटने का डर और तुम्हारे भी पिता को भी हमारे पिता की बन्दुक का डर, मामला बड़ा फँस गया था. बस तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारे ब्याह करने की ठान ली.तुम्हारा ब्याह हो गया और तुम्हारे पिताजी ने चैन की साँस ली. वे एक दिन मुझे मिले थे और मेरा हाल-चाल और कमाई-धमाई पूछी थी. तो मैंने कहा था कि अब क्या करोगे पूछ कर? मर्द की कमाई, औरत की उमर और रायल इन्फ़ील्ड मोटर सायकिल की एवरेज पूछने वाला मुरख ही होता है.

पुराने तरीके सब समाप्त हो गये.आज कल मोबाईल ईंटरनेट का चलन हो गया है, कब प्रेम का इजहार होता है और कब प्रेम टूटता है पता ही नहीं चलता. बस एक एस.एम.एस और फिर वह हो जाता है बेस्ट फ्रेंड. रक्षा बन्धन की तरह फ्रेंड बैंड (मित्र सुत्र)भी आ गए है. जो एक दोस्त दुसरे दोस्त को पहनाता है, मतलब जिसके हाथ में मित्र-सूत्र दिखे समझ लो वह बुक हो गया है. मुंह पर रुमाल बांध कर कहीं भी हो आते हैं घर वालों को पता ही नहीं चलता. बस सब दोस्ती-दोस्ती की आड़ में हो चल जाता है. कितना जमाना बदल गया है ना?

कहने का तात्पर्य यह है कि अब इस तरह के हाई टेक प्रेम में वो मजा नहीं रहा. जो अपने समय में होता था. प्रेमलाप भी नजाकत और नफासत से होता था. तारे गिनने की कहानियां होती थी, प्रेम ग्रन्थ रचे जाते थे. नायिका और नायक की कहानी ही गायब हो गयी. तोता-मैना की कहानी की तो क्या बात करें? वो साँप से बल खाते कुंतल और कानों में झूमते झुमके बरेली के बाजार में खोने के बाद मिले ही नहीं हैं. विछोह में अब वो तडफ कहाँ, जो एक अग्नि दिल में सुलगाये रहती थी. जिसने तुलसी को कवि तुलसी दास बनाया.

तुम्हारे विवाहोपरांत विछोह ने हमें पागल कर दिया (आधे तो पहले ही थी,अन्यथा इस पचड़े में क्यों पड़ते?) कवि दुष्यंत कुमार ने कहा है " गमे जानां गमे दौरां गमे हस्ती गमे ईश्क, जब गम-गम ही दिल मे भरा होतो गजल होती है।" बस फ़िर क्या था, तुम्हारे विवाहोपरांत एक नए कवि का जन्म हुआ.हम कवि वियोगी हो गए तथा कागजों का मुंह काला करना शुरू कर दिया. संयोग के सपने और वियोग का यथार्थ दिन-रात कागजों में उतारा. बस यही एक काम रह गया था, जीवन में हमारे। हो गए स्थापित कवि जो हम कभी विस्थापित थे।

अब तो मैं देखता हुँ कि हमारे जैसे समर्पित प्रेमियों का टोटा ही पड़ गया है। हमारी चाहे असफ़ल प्रेम कहानी ही क्यों ना हो जीवन भर सीने से लगाए घुमते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से लगाये फिरती है. अब नये कवि भी पैदा होने बंद हो गए शायद फैक्ट्री ही बंद हो गई. वही पुराने खूसट कवि, जिनके मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं मंचो से प्रेम गीत गाते मिल जाते हैं . यह वेलेंटाईन डे तो नए कवियों के लिए नसबंदी जैसा शासकीय प्रोग्राम हो गया. ना प्रेम की आग जल रही है ना कवियों का जन्म हो रहा है. इससे कविता के अस्तित्व को बहुत बड़ा खतरा हो गया है. पहले की प्रेमिकाएं भी कविता एवं शेर-ओ-शायरी की समझ रखती थी. लेकिन आज कल तो सिर्फ पैसा-पैसा. एक दिल जले ने इस सत्यता को उजागर करते हुए एक गाना ही लिख दिया " तू पैसा-पैसा करती है तू पैसे पे क्यों मरती है, एक बात मुझे बतला दे तू उस रब से क्यों नहीं डरती है". आज भी तुम्हारी यादें इस दिल में संजोये हुए जीवन के सफ़र में चल रहे हैं. ये तुम्हारी याद है गोया लक्ष्मण सिल्वेनिया का बल्ब जो बुझता ही नहीं है. लगता है जीवन भर की गारंटी है.

और तुम्हारे पति देव कैसे हैं? उनके और अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना, सुना है, बहुत मोटी हो गयी हो. शुगर भी तुम्हारी बढ़ी रहती है. जरा पैदल चले करो, हफ्ते में एक बार शुगर बी.पी. नपवा लिए करो, तुम्हारे नाती-पोतों को प्यार और तुम्हे वेलेंन्टाईन डे और मदनोत्सव पर ढेर सारा प्यार,

एक मुक्तक अर्ज किया है.

आरजू लिए फिरते रहे उनको पाने की

हम हवा का रुख देखते रहे ज़माने की

सारी तमन्नाएं धरी की धरी रह गयी

अब घडी आ ही गयी जनाजा उठाने की



तुम्हारा

तुम्हारा रांझा

23 comments:

  Udan Tashtari

24 March 2010 at 05:50

हाय!! री यह मोहब्बत!!

बेहतरीन ललित भाई..आनन्द आ गया!

-

  Suman

24 March 2010 at 06:16

nice

  Ratan Singh Shekhawat

24 March 2010 at 06:17

बहुत शानदार लिखा है ललित जी पढ़कर मजा आ गया |

  'अदा'

24 March 2010 at 08:46

बहुत बहुत बधाई होवे..!!

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

24 March 2010 at 08:55

मुहब्बतें कायम रहें!

  महेन्द्र मिश्र

24 March 2010 at 09:04

बहुत बहुत बधाई और रामनवमी की शुभकामनाये ....

  P.N. Subramanian

24 March 2010 at 09:06

मजा आ गया. ललित शर्मा जी की इस रचना को हम तक पहुँचाने के लिए आपका आभार. " प्रविष्टियों का प्रकाशन ताऊजी डाट काम किया जायेगा." इस अंश का संशोधन अपेक्षित है.

  गिरीश बिल्लोरे

24 March 2010 at 10:18

भाई
तस्वीर का ये रुख भी मज़ेदार

  वन्दना

24 March 2010 at 10:23

वाह वाह्…………………अब कहाँ से लायें वो मोहब्बत्…………बहुत ही रसमयी प्रस्तुति।

  shikha varshney

24 March 2010 at 14:21

behtareen prastuti lalit ji ! maja aa gaya padhkar.

  Pankaj

24 March 2010 at 15:55

amazing sir ji........ FUll Appke style me

  मो सम कौन ?

24 March 2010 at 17:34

वाह महाराज, हम तो समझ रहे थे कि हमारे जैसे निकम्मे थोड़े ही हैं, बाकी आप जैसे तो अभी भी आदमी काम के ही होंगे। हमारी खुशी बर्दाश्त नहीं हुई ऊपरवाले को। आ गये आप भी हमारी जमात में, हमारा नंबर और पीछे सरक गया, अब बड़े भाई आप तो लाईन में सबसे आगे ही शोभा देंगे।
आ गये गुजरे जमाने भी याद और ये क्षोभ भी बढ़ गया कि हम आज के फ़ास्ट ट्रैक समय में पैदा क्यों नहीं हुये।
मजा आ गया शर्मा जी।

  योगेन्द्र मौदगिल

24 March 2010 at 18:45

ललित भाई इस अद्भुत लालित्यपूर्ण आलेख के लिये badhai.. बहुत दिनों बाद किसी को पढ़ कर मज़ा आया बधाई स्वीकारें ताऊ को भी इस प्रस्तुति के लिये घणा आभार

  sangeeta swarup

24 March 2010 at 20:41

खुला प्रेम पत्र ...बढ़िया लगा..वैसे भी ऐसी बातें पढ़ना अच्छा ही लगता है..बधाई

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

24 March 2010 at 21:13

सुन्दर आलेख!
ताऊ को राम-राम!
राम-नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

  शेफाली पाण्डे

24 March 2010 at 22:08

kripya, apna mail add bhej deejiye...taaki main bhi vyangya bhej paaun...

  दीपक 'मशाल'

25 March 2010 at 02:20

Bahut sundar.. anandkari.

  विनोद कुमार पांडेय

25 March 2010 at 09:01

सुंदर व्यंग....बहुत बढ़िया रचना..ललित जी बहुत बहुत बधाई

  रानीविशाल

25 March 2010 at 22:16

bahut hi bhadiya vyang ....badhaiyan!!

  अल्पना वर्मा

25 March 2010 at 22:16

बहुत बहुत बधाई ललित जी,
बहुत ही मज़ेदार पत्र लिखा है.
यह शैली भी निराली है.

  padmsingh

27 March 2010 at 09:59

उफ़! .....
दुखती रग़ पर हाथ क्यों रखते हैं
ऐसे पुराने घाव न कुरेदो जालिम
बहुत खूब क्या बात है
क्या रिसर्च है

बिस्तर की सिलवटों से महसूस हो रहा है
तोडा है दम किसी ने करवट बदल बदल के

हा हा हा ..... बहुत खूब

  संगीता पुरी

27 March 2010 at 13:46

बहुत खूब !!

  अजय कुमार

28 March 2010 at 10:51

शानदार अंदाज में जोरदार रचना

Followers