वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री रानी विशाल

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज सुश्री रानी विशाल की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं ३० अप्रेल २०१० तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखिका परिचय :-
नाम: रानीविशाल
मैंने अपनी शिक्षा स्वदेश में ही संपन्न की है। मेरा मुख्य कार्यक्षेत्र प्रबंधन है । मानव संसाधन प्रबंधन में मास्टर डिग्री (MBA in HR) लेने के पश्चात कुछ महीनो तक मुंबई की एक मल्टीनेशनल आई. टी. कंपनी में अपनी सेवा दी । बाद में मेनेजमेंट कालेज में प्रख्याता के रूप में कार्यरत रही । कविताएँ लिखने का शोक मुझे बचपन से ही है । मेरे माता पिता और भाइयों का बहुत प्रोत्साहन होने के कारण यह शोक और भी परवान चड़ा ।

जब भारत में थी तो समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में मेरे आलेख व कविताएँ प्रकाशित होते थे किन्तु विगत कुछ वर्षो से यहाँ अमेरिका (New York) में होने के कारण अब ऐसा नहीं कर पाती । स्कूल, कालेज में काव्य रचना हेतु कई पुरस्कार अर्जित किये है ...पिछले कुछ समय से मेरी कविताएँ बस दोस्तों की महफ़िल और यहाँ के मिलने वालो तक सीमित हो रही थी, लेकिन जब से ब्लॉग लिखना शुरू किया है । मैं बहुत खुश एवं उत्साहित भी हूँ, यही अभिलाषा रखती हूँ कि अपनी लगन और काव्य प्रेम के सहारे ऐसा काव्य सृजन करू जो पाठक की आत्मा को छू सके ॥

मेरे पति श्री विशाल जोशी एवं लगभग ३ वर्षीय मेरी सुपुत्री अनुष्का जोशी ही मेरे कार्यो हेतु मुझमे निरंतर शक्ति का संचार करते है ।

मेरे ब्लॉग का नाम काव्य तरंग है ।



पति पत्नी और "वो" ...........{ इगो }


जब से दुनिया में इंसां ने पति-पत्नी का रिश्ता बनाया
तभी से इस सम्बन्ध में बंधु "वो" ने भी अस्तित्व है पाया

कभी प्रेमी, कभी प्रेयसी बन दोनों में आग लगाई
कभी साली, कभी ननद, सास बन बीच में टांग अड़ाई

कभी पड़ोसी की ताँक झाँक, कभी शाहरुख, अमिताभ या रेखा
चढ़े त्योरियां मेडम की जो साहब ने नज़र भर महरी को देखा

मार्डन ज़माने में तो भैया अब "वो" ने भी नया रूप है पाया
बदलते समय के साथ है बदली सभी सम्बन्धों ने भी काया

अब पति पत्नी के बीच में सास की हिम्मत की आजाए
दाल में तो गवा ही दिया है फिर रोटी में भी घी ना पाए

दुनिया, देश, परिवार से अलग-थलग अब तो हम प्राइवेसी में जीते है
चार दीवारों में मिल काट रहे जो आधुनिक औपचारिकताओं के फीते है

दिलो में प्यार, तन पर कपड़े और परिवार घरों में सिकुड़े है
आज अपने अपनो के पास नहीं घर से दूर दिलों के टुकड़े है

चार रोटियां साथ करी के मेडम जी अब पकाती है
मूड न हो तो अक्सर दोनों की नुडल्स से ही कट जाती है

डिस्को, मूवी, शोपिंग तक तो दोनों प्रेममग्न ही रहते है
लेकिन अक्सर ये इक दूजे से लीव मी अल़ोन ही कहते है

नहीं अछूते रह सके यहाँ भी, इनके बीच भी "वो "का साया है
नए ज़माने में नए स्वरुप में "वो" बनकर इगो बीच में आया है

न आस पड़ोस न प्रेयसी प्रेमी न अब रिश्तेदारों से अपना नाता है
आधुनिक जीवन की महिमा है की अब इगो ही बीच में आता है

सादर
रानीविशाल

41 comments:

  वाणी गीत

27 March 2010 at 05:40

रानी विशाल जी को सम्मान मिलने की बहुत बधाई ...
कविता और आपका प्रयास दोनों ही अच्छे लगे ...!!

  'अदा'

27 March 2010 at 05:47

Rani ko hriday se bahut bahut badhai ...

  Suman

27 March 2010 at 06:20

nice

  Udan Tashtari

27 March 2010 at 07:06

बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुत की है रानी विशाल जी ने..आनन्द आया.

  007

27 March 2010 at 07:06

This is true story of every couple, thaks for this inspirational poem, can really help and change lives of many struggling pairs. Kill the Ego, great hidden message you have Rani. Simple words touches the soul. love it, Great Work.

  संजय भास्कर

27 March 2010 at 07:52

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

  विनोद कुमार पांडेय

27 March 2010 at 08:48

एक बढ़िया हास्य से भरपूर कविता...रानीविशाल जी को बहुत बहुत बधाई..

  kedar

27 March 2010 at 09:24

excellent,this is what the western culture has gifted us,poets only can enlighten the hearts to cultivate seeds of humanity & love. keep it up.

  sangeeta swarup

27 March 2010 at 09:37

एक सच को हास्य में ढाल कर खूबसूरत बना दिया है..ये इगो बहुत कष्टकारक होता है....अच्छी रचना....बधाई

  गिरीश बिल्लोरे

27 March 2010 at 10:14

अति उत्तम
बधाइयां

  Vivek Rastogi

27 March 2010 at 11:36

वास्तविकता है यह जो आपने लिखा है और अब तो यह घर घर की कहानी होता जा रहा है |

  Arvind Chaudhari

27 March 2010 at 12:27

*
बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुत की है रानी विशाल जी ने..
एक सुंदर हास्यपूर्ण अनोखी कविता पढकर बहुत मजा आया...
रानीविशाल जी को बहुत बहुत बधाई....

अभिनंदन....
....अरविंद

  डॉ. मनोज मिश्र

27 March 2010 at 16:51

बहुत सुंदर.

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

27 March 2010 at 19:28

सुन्दर कविता का चयन किया है आपने!

रानीविशाल को बधाई!

  संगीता पुरी

27 March 2010 at 20:43

बहुत अच्‍छी रचना है .. रानी विशाल जी को बधाई !!

  मनोज कुमार

27 March 2010 at 21:02

रानी विशाल जी को
बहुत बहुत बधाई ! अनन्त शुभकामनाएं ।

  Sushil Thakur

27 March 2010 at 21:26

निरंतरता, सुन्दरता, परिपक्वता तथा हास्य का विशिस्ट समागम~!
शेयर करने के लिए धन्यवाद एवं प्रतियोगिता हेतु हार्दिक शुभकामनाये!

  भारतीय नागरिक - Indian Citizen

27 March 2010 at 21:35

अच्छी रचना. घर-घर की कहानी.

  NARENDRA

27 March 2010 at 23:26

Indeed I am happy knowing that you are given such an award.
May God give you everything you think of
Wishes

Narendra Singh Solanki

  दीपक 'मशाल'

27 March 2010 at 23:35

Rani ji ki kavita padhna hamesha sukhad rahta hai.. aaj bhi raha..

  शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद''

27 March 2010 at 23:38

दिलो में प्यार, तन पर कपड़े और परिवार घरों में सिकुड़े है
आज अपने अपनो के पास नहीं घर से दूर दिलों के टुकड़े है....
बहुत खूब.......
काव्य विधा में सुश्री रानी साहिबा इतनी गहरी बात कह जाती हैं कि काफ़ी देर तक चिंतन के लिये विवश होना पड़ता है.
लेखिका को बधाई.

  vijay

27 March 2010 at 23:58

One good thing one should notice about the subjet. subject is one we face in real life. so thats why i like it. Rani keep writing so we can compare it with our life style and get someting to learn.

keep going

  vijay

28 March 2010 at 00:01

One good thing one should notice about the subjet. subject is one we face in real life. so thats why i like it. Rani keep writing so we can compare it with our life style and get someting to learn.

keep going

  Atul

28 March 2010 at 00:13

itne halke andaaz mein itni badi baat..bahut khub...kash is kavita k madhayam se hum sab k samajh mein is "WOH" ki baat aa jaye aur hum use apne beech se nikal phenke..chalo sab pratigya kerte hai ki is tarah k kisi bhi WOH ko hum apne jindagi mein bardasht nahi karenge...Shukariya Rani ji itini achi rachna se hume mahatavapoorna pahlu pe samjhane k liye..

  anita

28 March 2010 at 00:23

bahut hi achi rachna..shayad hume in baaton ko samajhna chahiye aur sambhal jana chahiye.Bahut hi acha prayas Rani ne kiya.

  Arpit

28 March 2010 at 00:43

बहुत अच्‍छी रचना है, good to c u here with these nice words .. रानी बहुत बहुत बधाई !!

  khozema

28 March 2010 at 00:54

Nice work!! Worth reading for all the couples. Congratualtions to you!

  HEY PRABHU YEH TERA PATH

28 March 2010 at 05:36

SUNDER रचना
रानीविशालJI को बधाई!

  अजय कुमार

28 March 2010 at 10:54

आनन्ददायक कविता

  Bhuvan

28 March 2010 at 18:58

Nice collection... All poems are good

  श्याम कोरी 'उदय'

28 March 2010 at 20:41

...प्रसंशनीय रचना!!!

  It's me megha

29 March 2010 at 10:14

Very true..!! the art of writing..explains the reality in floral language, with a deep meaning in it. Very well written!

  Prem Farrukhabadi

1 April 2010 at 09:57

न आस पड़ोस न प्रेयसी प्रेमी न अब रिश्तेदारों से अपना नाता है
आधुनिक जीवन की महिमा है की अब इगो ही बीच में आता है
ati sundar!!!

  ITO Ratlam - 1

1 April 2010 at 11:04

Sooooooo Nice.. Aaj ki yuva varg ke sambandh main bahut hi achchhi tarah se apne vichar abhivyakta kiye hai... jo ki kafi had tak sahi hai..... iske liye badhai

  देवेश प्रताप

1 April 2010 at 15:09

मौजूदा स्तिथि को बहुत .....मजेदार ढंग से पेश किया है आपने .......बहुत बढ़िया रचना .
बहुत बहुत बंधाई .

  भूतनाथ

1 April 2010 at 15:12

रानी जी ,
मेरे लेके लिखने से ज्यादा पढना महत्वपूर्ण होता है हजारों चीज़ें आप पढ़ते हो तब एकाध चीज़ लिखने के काबिल होते हो....इसी करके पढना होता है....पढना दरअसल "कुछ"जज्ब करना होता है,और लिखना अभिव्यक्त करना...या कहूँ कि खुद से बाहर निकलना....और बाहर निकलने का अर्थ बहुत मायने वाला है....कोई घर से बाहर निकलता है तो मौज-मस्ती करता है तो कोई बाहर निकलता है तो किसी की सेवा करता भी पाया जा सकता है....सबके लिए जिन्दगी के अपने अर्थ हैं...तय आपको करना होता है कि आपने जाना कहाँ है....मेरी तलाश क्या है........क्या बताऊँ....फिर कभी......हाँ आप को भी कभी-कभी देखा और अच्छा भी लगा....मगर समय ही नहीं होता.....बस दो-चार शब्दों की टिप्पणी मार दी....जो हमेशा पर्याप्त भी नहीं होती...आज कुछ हद से ज्यादा बढ़कर लिख रहा हूँ....जाने तुम्हे (आप कहना अजीब लगा करता है मुझे )कैसा भी लगे ......आज तुम्हारी पंक्तियों को अपने हिसाब से बना रहा हूँ....देख लेना ठीक लगे तो ठीक और ना लगे तो कोई बात नहीं......
जब से दुनिया में इंसां ने पति-पत्नी का रिश्ता बनाया
तभी से इस सम्बन्ध में "वो" ने भी अस्तित्व है पाया !!

कभी प्रेमी, कभी प्रेयसी बन दोनों में आग लगाई
सास-साली, कभी ननद, बन बीच में टांग अड़ाई !!

पड़ोसी की ताँक झाँक,शाहरुख-अमिताभ या कभी रेखा
चढ़े त्योरियां मैडम की साहब ने इक नज़र महरी को देखा

मार्डन ज़माने में भैया अब "वो" ने भी नया रूप है पाया
बदलते समय के साथ बदली सभी सम्बन्धों ने काया !!

अब पति पत्नी के बीच में सास की हिम्मत की आजाए
दाल में तो गवा ही दिया है फिर रोटी में भी घी ना पाए !!

देश-परिवार-दुनिया से अलग-थलग हम अब प्राइवेसी में जीते है
चार दीवारों में मिल काट रहे जो नव औपचारिकताओं के फीते है !!

दिलो में प्यार, तन पर कपड़े और परिवार घरों में सिकुड़े है
आज अपने अपनो के पास नहीं घर से दूर दिलों के टुकड़े है

चार रोटियां साथ करी के मेडम जी तो अब भी पकाती है
मूड न हो तो अक्सर दोनों की नुडल्स से ही कट जाती है !!

डिस्को, मूवी, शोपिंग तक तो दोनों प्रेममग्न ही रहते है
किन्तु अक्सर ये इक दूजे से लीव मी अल़ोन ही कहते है !!

नहीं अछूते रह सके यहाँ भी, इनके बीच भी "वो "का साया है
नए ज़माने में नए स्वरुप में बनकर"वो" इगो बीच में आया है

आस-पड़ोस-प्रेयसी-प्रेमी न रिश्तेदारों से कोई अपना नाता है
आधुनिक जीवन की महिमा,अब तो इगो ही बीच में आता है !!

  Amitraghat

1 April 2010 at 16:04

आधुनिक सन्दर्भों को समेटे हुए एक हास्य-पगी कविता

  योगेश स्वप्न

1 April 2010 at 18:40

sunder vyangyatmak adhunik rachna.

  Kulwant Happy

1 April 2010 at 20:04

मैं और तू का पर्दा हट जाए\

ईश्वर का अस्तित्व घट जाए

दीये की कदर न होय
बिन ज्योति

हँस और कौए में फर्क क्या,

जब हँस चुगे ना मोति।


घट मतलब पैदा हो जाए

  डॉ टी एस दराल

1 April 2010 at 20:22

रानी जी , आपने हास्य कविता लिखकर अपने व्यक्तित्व का एक और रूप दिखाया है । बढ़िया लगा ये अंदाज़। बधाई पुरस्कार और सम्मान की ।

  pankaj

10 April 2010 at 20:16

well done Rani....great composition...I personally enjoyed reading your lines....very few poets like you are remaining in the world who can can attempt to write this kind of interesting poem...keep it up and keep writing poems which are not banal. All your poems shows your versatile writing skills...All the best...Pankaj-Preeti-Atharv.

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