वैशाख्नंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री अविनाश वाचस्पति

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री अविनाश वाचस्पति की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.


लेखक परिचय :-
अविनाश वाचस्‍पति,
साहित्‍यकार सदन, पहली मंजिल,
195 सन्‍त नगर,
नई दिल्‍ली 110065
मोबाइल 09868166586/09711537664

संदर्भ : कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स और दिल्‍ली सरकार का बजट

मुख्‍यमंत्री का खुला पत्र दिल्‍ली के दिलवालों के नाम

अविनाश वाचस्‍पति

दिल्‍ली का बजट क्‍या पेश किया गया दिल्‍ली वालों ने दहकना शुरू कर दिया। यह सब तो दिल्‍ली वालों के दिल की परख की जा रही है। यह निरखा परखा जा रहा है कि दिल्‍ली वालों का दिल कितना मजबूत है या सिर्फ नाम के ही दिलवाले हैं दिल्‍लीवाले अथवा इस नाम को सार्थक करके दिखलाने के लिए भी डटना जानते हैं। अब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स हुआ ही चाहते हैं कुछ सौ दिन ही बकाया है। इन खेलों में निश्चित ही देश के चोटी के खिलाड़ी अपनी विशाल परंपराओं को कायम रखते हुए हारेंगे तो पब्लिक जो मोटे मोटे आंसू बहायेगी उससे पानी की कमी तो पूरी हो जाएगी। यह पानी की कमी को दूर करने की हमारी सार्थक पहल मानी जानी चाहिए। इसलिए अगर दिल्‍लीवालों के दिल की मजबूती की जांच की जा रही है तो काहे को हल्‍ला मचाया जा रहा है। एकदम मौके पर दिल्‍ली का दिल फेल तो नहीं हो जाएगा, इसे कसौटी पर कस कर देखने पर एतराज करने वालों की बुद्धि पर मुझे तरस आ रहा है। पर आप यह भूल जाइये कि मैं भावनाओं में बहकर बढ़ाई गई कीमतों को वापिस ले लूंगी तो फिर आपने मुझे अच्‍छी तरह पहचाना ही नहीं है। आपके भले के लिए, खेलों को आपके गले में उतारने के लिए मैं किसी भी हद तक गुजर जाऊंगी पर आपको गुजरने नहीं दूंगी।

अफवाहें फैलाई जा रही हैं कि दिल्‍लीवालों को दिल्‍ली सरकार ने लूट लिया है। कुछ चैनल रो रोकर कह रहे हैं कि दिल्‍ली रो रही है जबकि वे रो खुद रहे हैं। कोई कह रहा है कि दिल्‍ली सरकार जेबकट है, सरेआम जेब काट ली उसने पब्लिक की। अब भला अपनी जेब से कुछ निकालना जेब काटना कब से हो गया। अब अगर दिल्‍ली सरकार दिल्‍ली वालों को अपना मानती है तो उसकी जेब से कुछ भी निकालने का हक रखती है कि नहीं। अपनी जेब से खुद निकालना जेबकटी की श्रेणी में कब से शुमार हो गया। अगर गेम्‍स के नाम पर या सुविधाएं दिलाने के नाम पर थोड़ा अधिक निकाल भी लिया तो खफा होने की क्‍या बात है, इंसान जब पैदा होता है तो कुछ भी न तो साथ लाता है और न ही मरते समय साथ ले जाता है। दूध महंगा हो गया तो जो अफवाह सबसे अधिक सुर्खियों में रही वो यह थी कि दिल्‍ली में चाय बनाने, बेचने और पीने-पिलाने पर दिल्‍ली सरकार प्रतिबंध लगाने वाली है। आपको मैं पूरा विश्‍वास दिलाती हूं कि ऐसा कुछ नहीं है। इस तरह की अफवाहों पर बिल्‍कुल कान मत दीजिए और चाय चाहे बीस रुपये कप भी हो जाए तब भी इस पर प्रतिबंध लगाने का हमारा कोई प्रस्‍ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है।

कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के नाम पर कितना कुछ मिला है दिल्‍लीवालों को, उसकी तरफ ध्‍यान नहीं दे रहे हैं आप लोग। जरा सी दस, बीस, पचास पैसे अथवा रुपये दो रुपये या अधिक से अधिक चालीस रुपये रोजाना की जरूरत की उपयोगी चीजों पर क्‍या बढ़ा दिए, सब नाहक बिसूर रहे हैं और एलपीजी के लाल रंग के घरेलू सिलैंडर की तरह तमतमा रहे हैं । भला यह भी कोई बात हुई, सभ्‍य और सुसंस्‍कृत नागरिक कभी ऐसा नहीं करते हैं। हम तो आपसे बहुत बड़ी बड़ी त्‍याग की उम्‍मीदें लगाकर बैठे हैं, तो दिल्‍लीवाले अपनी इकलौती मुख्‍यमंत्री को नाउम्‍मीद करेंगे।

अभी हमने इतनी महंगाई तो नहीं बढ़ाई है कि पब्लिक को भीख मांगने की नौबत आ गई हो बल्कि हम तो यहां से भिखारियों को हटाना चाहते हैं। इसी मिशन की प्राप्ति के लिए महंगाई बढ़ाई गई है। चौराहों पर, नुक्‍कड़ पर, गलियों पर, सड़कों पर, मंदिरों में – सब जगह पर भिखारियों को भीख देने के लिए दिल्‍लीवाले जब इतने दिलदार हैं तो सीधे से तो उनका दिल तोड़ना मुझे ठीक नहीं लगा। इसलिए यह सोचा गया कि पब्लिक के पास इतने पैसे छोड़ो ही मत कि भीख दे पाएं, जब भीख मिलेगी ही नहीं तो भिखारी खुदबखुद दिल्‍ली से किनारा कर जाएंगे। वह नौबत तो नहीं आने दी जाएगी इसका पब्लिक को पूरा विश्‍वास दिलाते हैं कि दिल्‍ली के दिलवालों को भीख देने की जगह भीख मांगनी पड़े। हमारी कोशिश तो सिर्फ यही है कि आप भीख न दे पाएं, बस्‍स। इससे अधिक दिल्‍ली सरकार और कुछ नहीं चाहती।

वो भी सिर्फ दिल्‍लीवालों की छवि विदेशियों, खिलाडि़यों, पर्यटकों की निगाह में धूमिल न हो, इसके लिए इतनी कीमतें बढ़ाने को विवश होना पड़ा है फिर भी मैं आपको विश ही कर रही हूं विष तो नहीं दे रही हूं। मेरे दिल ने कभी नहीं चाहा कि दिल्‍लीवालों का दिल दुखाया जाए बल्कि कोई और भी न दुखाये इसीलिए ऐसी कोशिश की जा रही है कि पहले ही दिल इतना दुखता रहे कि कोई और दुखाये तो दुखने का अहसास ही न हो। वैसे भी दिल्‍ली अब सिर्फ दिलवालों के लिए ही आरक्षित नहीं रहेगी। जब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स आयोजित की जा रही हैं तो ऐसे नागरिक होने चाहिए जिनके सभी अंग-प्रत्‍यंग चुस्‍त-दुरुस्‍त हों। सिर्फ दिल ही मजबूत हो और बाकी शरीर बीमार हो तो कोई भी खेल खेलना तो क्‍या देखना भी संभव नहीं होता है। टांगों में जरा-सा भी दर्द हो रहा हो तो मन नहीं करता कुछ भी करने के लिए। तो इन सभी छोटी मोटी बाधाओं और मुसीबतों को आप हंस हंस कर पार कर जायेंगे, मुझे आप सब पर पूरा विश्‍वास है।

40 comments:

  Udan Tashtari

30 March 2010 at 05:45

बहुत शानदार रही अविनाश जी की प्रस्तुति..आनन्द आ गया. अविनाश जी को बधाई.

  विनोद कुमार पांडेय

30 March 2010 at 07:59

बहुत खूब..पत्र तो बड़ा ही मजेदार है....साथ ही साथ कई बात और पता चली जो दिल्ली वासियों के लिए बहुत ज़रूरी है जैसे अब दिल्ली में केवल दिल मजबूत करने से काम नही चलने वाला शरीर के बाकी अंगो का भी मजबूत होना बहुत ज़रूरी है...

दिल्ली सरकार की बढ़िया पहल...बढ़िया व्यंग...बहुत बहुत बधाई ....

  अन्तर सोहिल

30 March 2010 at 10:35

तालियां तालियां तालियां
सटीक व्यंग्य, शानदार प्रस्तुति
ताऊ जी का और अविनाश जी का हार्दिक अभिनन्दन
बहुत पसन्द आया जी यह आलेख

प्रणाम स्वीकार करें

  संदीप पाण्डेय

30 March 2010 at 12:34

कमाल का व्यंग है अविनाश जी बधाई स्वीकार करें।

  संदीप पाण्डेय

30 March 2010 at 12:41

मजेदार

  Dhiraj Shah

30 March 2010 at 12:43

सुन्दर पत्र सरकार के नाम

बधाई हो।

  ACHARYAJI KAHI

30 March 2010 at 13:48

TRUTH LIES IN THIS BLOG.
EXCELLENT LETTER.
EXCELLENT COUNCELLING.
NIVE WAY TO PROGRESS
SURELY GLASS AADHA BHARA H.

  रवीन्द्र प्रभात

30 March 2010 at 14:58

मजेदार पत्र,शानदार प्रस्तुति...बढ़िया व्यंग,अविनाश जी को बहुत बहुत बधाई ....

  पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

30 March 2010 at 15:00

"जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है"

ताऊ, हमारे पास तो कोई सूचना नहीं पहुंची....

  पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

30 March 2010 at 15:01

बहुत ही बढिया प्रस्तुति!!
एकदम सटीक व्यंग्य !!
बधाई!

  शेफाली पाण्डे

30 March 2010 at 15:50

badhiya vyngya hai....avinash ji ko badhai

  "अर्श"

30 March 2010 at 15:56

soch rahaa hun ke kya unhe vastavikataa pataa hai dilli walon ki ya fir pataa hote huye bhi wo aisaa kah rahi hain... bahas par byang badhiya rahi...

shukriyaa avinash ji


arsh

  ई-गुरु राजीव

30 March 2010 at 16:30

एक ओये ओये हमारी तरफ से भी स्वीकार करें.

:)

  आशीष कुमार 'अंशु'

30 March 2010 at 16:53

kaamaal ka hai jer

  vinay

30 March 2010 at 17:21

बहुत ही सटीक व्यगं ।

  नरेन्द्र व्यास

30 March 2010 at 18:34

वाह अविनाश सर! आपने भी क्या पुष्प में लपेट कर अचूक व्यंग्य-बाण चलाया है... जो सीधा निशाने पे लगा है। बहुत ही सरल और सटीक शब्दों में आपने अपनी चिट्ठी दिल्ली के दिलवालों के नाम सरकार की तरफ से भेजी है। सच में मजा आ गया! आपका बहुत आभार!!

  नरेन्द्र व्यास

30 March 2010 at 18:34

वाह अविनाश सर! आपने भी क्या पुष्प में लपेट कर अचूक व्यंग्य-बाण चलाया है... जो सीधा जहन में लगा है। बहुत ही सरल और सटीक शब्दों में आपने सबकुछ समझा दिया। सच में मजा आ गया! आपका बहुत आभार!!

  दिगम्बर नासवा

30 March 2010 at 19:25

अविनाश जी की प्रस्तुति पर आनन्द आ गया...

  HARI SHARMA

30 March 2010 at 20:43

खत लिखा है प्रेम से अर्जी ना सम्झना
मेरे दिल के घाव को फ़र्ज़ी ना समझना

खूब लपेटा जी खूब लपेटा.

  वन्दना अवस्थी दुबे

30 March 2010 at 23:33

सिर्फ दिल ही मजबूत हो और बाकी शरीर बीमार हो तो कोई भी खेल खेलना तो क्‍या देखना भी संभव नहीं होता है। टांगों में जरा-सा भी दर्द हो रहा हो तो मन नहीं करता कुछ भी करने के लिए। तो इन सभी छोटी मोटी बाधाओं और मुसीबतों को आप हंस हंस कर पार कर जायेंगे, मुझे आप सब पर पूरा विश्‍वास है।

बहुत शानदार-जानदार-असरदार पत्र है अविनाश जी. बधाई.

  भारतीय नागरिक - Indian Citizen

30 March 2010 at 23:36

अर्थ हासिल हो जाये चाहे भले ही अर्थी उठ जाये.लगी रहें ..

  राज भाटिय़ा

30 March 2010 at 23:46

बहुत सुंदर लिखा जी, दिल्ली वासियो डरना नही पिछली बार की तरह से फ़िर इसे जीताना ,देखा जल्द ही पानी की समस्या, भिखारियो की समस्या, जल्द ही खत्म हो जायेगी, फ़िर आप के पास पेसा ही नही बचेगा तो आप भी कहा बचेगे... यानि आप भी अरे नही आप की समस्या भी खत्म... तो प्यारे ओर प्यरियो प्यार से बोलो मुख्यामंत्री जी की ......

  यशवन्त मेहता "फ़कीरा"

31 March 2010 at 10:58

महंगाई के कारण मेरे भी आसूं निकल गये हैं

रोज २ लीटर की बोतल भर जाती हैं, हमारा प्रस्ताव हैं की महंगाई उस स्तर तक बढाई जाये

जिस स्तर पर आकर हम २० लीटर की बाल्टी भर सकें ताकि नहाने-धोने-पीने के इंतजाम के लिए

बाल्टी लेकर इधर उधर न भागना पड़े

बहुत ही सुन्दर व्यंग......बधाई स्वीकारें

  अजित वडनेरकर

31 March 2010 at 10:59

दिल्ली के दिल की बात कही आपने और अपने ही लहजे में। शीला जी को भी पढ़वा दीजिए उनकी चिट्ठी। शायद लिख कर पोस्ट करना भूल गई हो...

  Arvind Mishra

31 March 2010 at 11:15

आनंदम आनंदम

  गिरीश बिल्लोरे

31 March 2010 at 11:24

अविनाश जी
हुर्रे हिप हिप हुर्रे
अभी से १-२-३ की दौड में

  गिरीश बिल्लोरे

31 March 2010 at 11:24

ताउ मन्ने एक सटायर भेजणा है तीस तो निकल गई है दो दिन का टैम बढा देवो

  अविनाश वाचस्पति

31 March 2010 at 12:20

@ 30 निकल गई है तो
क्‍या हुआ
अगले महीने भी
आ रही है 30
तब तक भेज सकते हैं 30
अगर रोज एक भी भेजेंगे
वैसे टोटल 5 चाहिए उन्‍हें
पर अगले यानी अप्रैल
के बाद नहीं बढ़ायेंगे
आखिर इनामों से
आप कितनी दूर तय करवायेंगे।

  M D Soni

31 March 2010 at 12:43

DILli ke DILwalon ke naam mukhyamantri ke KHULE KHAT ke roop mein aapkla VYANGYA ASARDAAR laga.

  रेखा श्रीवास्तव

31 March 2010 at 13:20

बहुत बढ़िया व्यंग्य , मन की कही ओर कस के कही. वैसे मुख्यमंत्रीजी आपको बुलावा देंगी कि आप उनके लिए बहुत उपयोगी व्यक्ति साबित हो सकते हैं. कहाँ ये कलम घिस रहे हैं? आपके पत्र से बहुतउम्मीदें बंधी हैं सो हमारा साथ दीजिये.

  anitakumar

31 March 2010 at 14:27

मजा आ गया अविनाश जी, बहुत ही सटीक व्यंग

  ललित शर्मा

31 March 2010 at 14:34

मुख्यमंत्री जी बहुत ही बढिया सकीम लागाई
दिल्ली ते भिखारी भगावण की।
लोगां की जेब मै पैसे नही पावेगें तो
वे भीख कड़े तै देंगें। महंगाई बढ ज्यागी तो
फ़िजुल खर्ची रुक जागी, फ़ेर तो सिर्फ़ बचत ही बचत सै।

बहोत बढिया पत्तर
राम राम

  बलराम अग्रवाल

31 March 2010 at 15:00

दिल्ली के दिलवाले(मरीजों)के नाम मुख्यमंत्री का खुला पत्र मैं शुरू से आखिर तक पढ़ गया। उसके बाद मैंने 31 कमैंट्स भी पढ़े--सब के सब अविनाश वाचस्पति के नाम! मैंने एक बार फिर पत्र को पूरा पढ़ा, खुला तो वह पहले से था ही। मुझे कहीं कोई ऐसी लाइन दिखाई नहीं दी कि इस खुले पत्र के एवज़ अविनाश वाचस्पति की प्रशंसा में या उनकी भर्त्सना में एक भी शब्द लिखा जाय। (सभी टिप्पणीकारों से, मुख्यमंत्री से और वाचस्पतिजी से भी क्षमायाचना सहित)यह तो वही बात हुई कि गलती कुम्हार करे और कान गधे के ऐंठे जायँ! पत्र मुख्यमंत्री का, और कसीदे अविनाश वाचस्पति के नाम! क्यों? कमेंट्स देने वालों को मुख्यमंत्री के बजाय वाचस्पति का डर ज्यादा है शायद। भई मुझे तो अभी दिल्ली में रहना है, सो तारीफ भी मैं मुख्यमंत्री की साफगोई की ही करूँगा। मैं वाचस्पति को नहीं जानता मुख्यमंत्रीजी। जय देश जय दिल्ली और जय उसके दोहनकर्ता।

  प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी)

31 March 2010 at 15:04

अविनाश जी जिस सहजता से और व्यंगात्मक लहजे में आप ने आम जन की समस्याए उठाई बहुत बेहतरीन है ,,,, आज कल सरकारे कहने को तो आम जन का चुनाव है मगर है शोषण का पर्याय
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

  anuradha srivastav

31 March 2010 at 16:02

सटीक व्यंग्य एक-एक मुद्दे को बडी ही खूबसूरती से उठाया है।

  mukti

31 March 2010 at 23:05

वोह मारा पापड़ वाले को !!! क्या व्यंग्य है भई. मज़ा आ गया. दिल्ली वालों के दर्द को बखूबी वर्णित किया आपने.

  rashmi ravija

2 April 2010 at 19:29

बहुत ही सटीक व्यंग है,अविनाश जी,हमेशा की तरह...बहुत शानदार प्रस्तुति..
बहुत बहुत बधाई

  विकास

3 April 2010 at 16:11

बहुत सुन्दर....मजा आ गया.

  Ram Krishna Gautam

5 April 2010 at 00:45

Behatreen Prastuti Avinash ji... Badhai!!



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