वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री संगीता पुरी

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये आखिरी दिन है. इस प्रतियोगिता में आप सभी का अपार स्नेह और सहयोग मिला बहुत आभार आपका.

जिन मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हुई हैं और जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. अब तक ताऊजी डाट काम पर सभी प्रतिभागियों की प्रथम रचना प्रकाशित की जारही थी. अब कुछ ही प्रथम रचनायें शेष बची हैं. कल से प्रथम बची हूई रचनाओं और अगले दौर की रचनाओं का प्रकाशन सुबह शाम होगा.

हमने बहुत बारीकी से देखकर सभी रचनाओं का प्रकाशन किया है. फ़िर भी आप सम्माननिय प्रतिभागियों से निवेदन है कि अगर हमारी त्रुटीवश आपकी रचना का प्रकाशन शेष रह गया हो तो अविलंब सूचना देने की कृपा करें जिससे उन रचनाओं को प्रकाशित किया जा सके. हम आपके आभारी रहेंगे.

आपसे पुन: विनम्र निवेदन है कि इस प्रतियोगिता मे रचनाएं भेजने का आज आखिरी दिन है. अत: जो भी अपनी रचना भेजना चाहें आज भिजवाने की कृपा करें.

आज सुश्री संगीता पुरी की रचना पढिये.

लेखिका परिचय
नाम : संगीता पुरी
जन्म 19 दिसम्‍बर 1963 को झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत ग्राम - पेटरवार में हुआ।
रांची विश्‍वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में 1984 में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री ली।

उसके बाद झुकाव अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित
की गयी ज्‍योतिष की एक नई शाखा गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की ओर हुआ और सब कुछ
छोडकर इसी के अध्‍ययन मनन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। गत्‍यात्‍मक
ज्‍योतिष पर आधारित अपना साफ्टवेयर भी वे बना चुकी हैं।

सितम्‍बर 2007 से ही ज्‍योतिष पर आधारित अपने अनुभवों के साथ ब्‍लागिंग
की दुनिया में हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन करती आ रही हैं।
ज्‍योतिष पर आधारित एक पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: ग्रहों का
प्रभाव' 1996 में प्रकाशित हो चुकी है।

ब्‍लॉग : गत्यात्मक ज्योतिष और गत्यात्मक चिंतन


ग्‍लोबल वार्मिंग से लाभ ही लाभ

आज सभी पत्र पत्रिकाओं में .. चर्चा परिचर्चाओं में ग्‍लोबल वार्मिंग का
ही शोर है .. बताते हैं पृथ्‍वी गर्म होती जा रही है .. हानि ही हानि है
इससे .. चिंता का विषय बना हुआ है ये मुद्दा आजकल .. वैज्ञानिकों के
द्वारा वातावरण की वार्मिंग को कम किए जाने के लिए .. धरती को बचाने के
लिए निरंतर बैठकें की जा रही हैं .. चिंतन किया जा रहा है .. मुझे बडा
अजीब सा लग रहा है .. आखिर क्‍या हानि है .. इधर के वर्षों में सुबह से
दिनभर के रूटीन को देखूं तो .. ग्‍लोबल वार्मिंग से मुझे तो सिर्फ बचत ही
बचत .. लाभ ही लाभ नजर आ रहा है।

ग्‍लोबल वार्मिंग के फलस्‍वरूप ठंड सिकुडकर मात्र 20 या 25 दिनों का रह
गया है .. किसी तरह काटा जा सकता है .. नहाने के लिए पानी गरम करने में
होनेवाली ईंधन की बचत .. रूम हीटर या ब्‍लॉवर की कोई आवश्‍यकता नहीं ..
और न ही शरीर को गर्म बनाए रखने के लिए गर्म खानों पर माथापच्‍ची करने की
आवश्‍यकता .. मेहनत भी कम .. जाडे के महीने में भी हर जगह बचत ही बचत ..
इस समय कहीं आने जाने का झंझट छोड दो .. घर में पुराने कपडों में दुबककर
पडे रहो .. ऊनी कपडे बनवाने , खरीदने की बचत .. रजाई , कंबल आदि बनवाने ,
खरीदने का झंझट कम .. इसमें लगनेवाले समय और पैसों की बचत ।

इसके विपरीत गर्मी के दिन फैलकर छह महीने के हो गए हैं .. इन छह महीनों
में तो बचत तो तिगुनी , चौगुनी तक हो जाती है .. तापमान बढते हुए आज 48
डिग्री तक पहुंच चुका है .. ईंधन की कितनी कम जरूरत पडती है .. सबकुछ
गरमागरम .. 45 डिग्री तक स्‍वयं गरम हुए पानी को .. दुध को गैस पर चढाया
.. तुरंत उबल गए .. गरम पानी के कारण धोए गए चावल , दाल , सब्जियों तक का
तापमान स्‍वयं ही 45 डिग्री तक .. इससे गैस की सबसे अधिक बचत होती है..
सुबह के बजाय दोपहर में खाना बनाया जाए .. तो थोडी मुश्किल तो अवश्‍य हो
.. पर कम से कम एक सिलिंडर पंद्रह दिन और चल जाए।

जब ग्‍लोबल वार्मिंग न था तो पहले की गृहिणियों की परेशानी कितनी थी ..
कपडे धोए तो सुखाने के लिए छत या आंगन में जाओं .. आज धोकर घर पे ही कहीं
टांग दिए जाएं .. दो चार घंटों में कपडों को सुखना ही है .. फर्श पर पानी
गिर जाए पोछने की कोई आवश्‍यकता नहीं.. यहां तक कि बिस्‍तर पर भी पानी
गिर गया .. बाहर सूखने देने की कोई आवश्‍यकता नहीं .. तेज धूप की आंच
वहां भी आ रही है .. बिस्‍तर को कुछ ही देर में सूख ही जाना है .. डब्‍बे
में पडे सामानों के भी खराब होने का कोई झंझट नहीं .. किसी भी डब्‍बे का
सामान इस भीषण गर्मी से नहीं बच सकता .. पुरानी गृहिणियों की तुलना में
हमारे सुखी होने का राज का कारण तो ग्‍लोबल वार्मिग ही है।

गर्मी बढ गयी है तो बिजली की उपभोग तो बढेगा ही .. अब बारंबार बिजली की
कटौती .. भले ही झेलना कठिन हो .. पर बिल की बचत तो हो ही जाती है..
अत्‍यधिक गर्मी के कारण पानी की भी कमी हो गयी है .. भला मनमानी सप्‍लाई
हो भी तो कैसे .. सुबह सुबह आ जाने वाला पानी अब कम से कम दो घंटे देर से
ही आएगा.. सबलोग ब्रश करने के इंतजार में बैठे रह जाते हैं .. अब ब्रश ही
नहीं हुई .. तो चाय , नाश्‍ते सबमें कटौती होनी ही है .. सुबह सुबह कई कप
चाय की ही बचत हो जाती है .. और अधिक देर से पानी आए .. तो नाश्‍ते की भी
.. इस पानी के कारण स्‍नान में ही 12 बज जाए .. तो लोग एक ही बार खाना ही
तो खाएंगे .. गर्मी अधिक रहे तो एक बार खा भी लिया .. तो इतनी गर्मी में
पाचन संस्‍थान भी सही काम कहां कर पाएगा.. न खाना पचेगा और न भूख लगेगी
.. रात्रि में भी नाम मात्र का खाना ..खाद्यान्‍न की बचत तो होनी ही है
.. इससे कितने भूखों को खाना मिल जाए ।

ग्‍लोबल वार्मिंग का ही असर है .. कि बाजार में सब्जियों की कमी हो जाती
है .. भले ही बाजार जानेवाले मुंह लटाकाकर खाली झोला लिए वापस आते हों ..
पर पॉकेट के पैसे अवश्‍य सुरक्षित बने रहते हैं .. घर में मौजूद दूध ,
दही , बेसन , दलहन और चने मटर आदि का उपयोग कर भी तो घर चलाया जा सकता है
.. गृहिणी को भी आराम ही आराम .. हरी साग सब्जियां बीनने , छीलने, काटने
में लगने वाले समय की पूरी बचत .. ऐसे में गृहिणियों के समय की जो बचत
होगी .. उसमें वह अपनी रूचि का कोई काम कर सकती हैं .. इसी कारण तो महिला
ब्‍लॉगर प्रतिदिन अपना ब्‍लॉग भी अपडेट कर लेती हैं .. पर इतने तरह की
बचत और लाभ के बावजूद भी वैज्ञानिक ग्‍लोबल वार्मिंग पर चिंतित होकर
सेमिनार किए जा रहे हैं .. कहीं ग्‍लोबल वार्मिंग से पृथ्‍वी को छुटकारा
मिल जाए .. तो महिलाओं की समस्‍याएं कितनी बढ जाएंगी ..।

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे भाग लेने का कल अंतिम दिन है!

माननिय ब्लागर मित्रों,


आप सभी का अपार स्नेह और सहयोग इस प्रतियोगिता को मिला है. कल 30 अप्रेल 2010 शुक्रवार इस प्रतियोगिता में प्रविष्ठियां भेजने का अंतिम दिन है. इसके बाद प्रविष्ठियां स्वीकार नही की जायेंगी.

जिन प्रतिभागियों ने इस प्रतियोगिता में अपनी रचनाएं भेजी हैं वो कृपया एक बार जांच लें कि उनको हमारे यहां से रचना प्राप्ति का संदेश मिल गया है या नही? अगर ऐसा नही हुआ है तो अविलंब खबर करें. बहुत बारीकी से जांचने के बाद भी, हो सकता है हमसे त्रुटी होगई हो तो उसे दुरुस्त किया जा सके.

आभार सहित

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी



वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री राजेंद्र स्वर्णकार

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं. अब एक सप्ताह से भी कम समय बचा है.

आज श्री राजेन्द्र स्वर्णकार की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम : राजेन्द्र स्वर्णकार
जन्म : 21 सितंबर
पिता का नाम : स्वर्गीय श्री शंकरलालजी
माता का नाम : श्रीमती भंवरीदेवी
स्थायी पता : गिराणी सोनारों का मौहल्ला ,
बीकानेर 334001 ( राजस्थान )
मोबाइल नं : 9314682626
फोन नं : 0151 2203369
ईमेल : swarnkarrajendra@gmail.com
ब्लॉग : http://shabdswarrang.blogspot.com
सृजन :
--- काव्य की सभी विधाओं , रंगों-रसों में
राजस्थानी, हिंदी और उर्दू में ( ब्रज, भोजपुरी और अंग्रेजी में भी ) मुख्यतः छंदबद्ध काव्य- सृजन
--- लगभग ढाई हज़ार से अधिक गीत, ग़ज़ल, नवगीत , कवित्त, सवैयों, कुंडलियों सहित दोहों, सोरठों, कविताओं का सृजन…
सरस्वती की अनवरत कृपा
--- लगभग ढाईसौ से भी अधिक स्वयं की मौलिक धुनों का निर्माण
--- मंच के मीठे गीतकार और लोकप्रिय ग़ज़लकार के रूप में लगभग चालीस शहरों, कस्बों, गावों में
कवि सम्मेलन, मुशायरों में ससम्मान काव्यपाठ
--- आकाशवाणी से भी निरंतर रचनाओं का प्रसारण
--- देश भर में लगभग सवा सौ पत्र-पत्रिकाओं में एक हज़ार से अधिक रचनाएं ससम्मान प्रकाशित
--- अनेक महत्वपूर्ण संकलनों में परिचय और रचनाएं संकलित
--- गीत ग़ज़ल के शीर्षस्थ हस्ताक्षरों द्वारा मेरे कृतित्व की प्रशंसा
--- अब तक दो पुस्तकें प्रकाशित
1 रूई मांयी सूई { राजस्थानी ग़ज़ल संग्रह/ प्रकाशन वर्ष 2002 }
2 आईनों में देखिए { हिंदी ग़ज़ल संग्रह/ प्रकाशन वर्ष 2004 }
--- राजस्थानी भाषा में दो पद्य नाटकों सहित, राजस्थानी और हिंदी में दो-दो ग़ज़ल संग्रह और गीत-नवगीत संग्रह, दोहा संग्रह और बाल कविता संग्रह प्रकाशनार्थ तैयार
--- स्वयं के गीत ग़ज़ल , स्वयं की धुन, स्वयं के स्वर में ध्वन्यांकन का वृहद् विराट कार्य प्रगति पर
--- चित्रकारी, रंगकर्म, संगीत, गायन और मीनाकारी में भी श्रेष्ठ कार्य
--- DXing और Short Wave Listening करते हुए अनेक देशों से निबंध लेखन, संगीत, चित्रकला और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं में लगभग सौ बार पुरस्कृत होकर बीकानेर और समूचे राजस्थान के यश, मान और गौरव वृद्धि में तुच्छ सहयोग
/ डॉयट्शे वैले पर दो बार मेरे निबंध एशिया में प्रथम स्थान पर रहे
/ एक बार चीनी दूतावास, नई दिल्ली में CRI China द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित किया गया
--- अभी सफ़र जारी है …

ग़za

***************

बड़ा confuse करते हैं

मेरे talent से impressed , मुझको choose करते हैं

familiar वो मेरे होकर , मुझे misuse करते हैं

mother मेरी , मेरे favour में sympathy रखेगी क्या

करें continuous drama , बड़ा confuse करते हैं

बढ़ूं मैं selfconfidence , willpower से आगे ; तब

मेरी राहों के candle - bulb सारे , fuse करते हैं

मिलाते poison ... daily , वो मेरी चाय - कॉफ़ी में

उन्हें बदले में something दूं , तो motion loose करते हैं

करें certainly वादाख़िलाफ़ी , fraud वो मुझसे

दिखा' पाज़ेब , देते वक़्त आगे shoes करते हैं

करूं adjust , bye god ... anyhow मैं उनसे

वो कब honestly राजेन्द्र , why - whose करते हैं

राजेन्द्र स्वर्णकार

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री राम त्यागी

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज श्री राम त्यागी की रचना पढिये.


लेखक परिचय
नाम : राम त्यागी
Location: Chicago (Native - Morena) : IL (Native - MP) : United States
ब्लाग : मेरी आवाज

मुरैना , ग्वालियर और मध्य प्रदेश के विभिन्न गावों और शहरों में बचपन और विद्यार्थी जीवन के अनमोल वर्ष गुजारने के बाद, दिल्ली , सिंगापुर जैसे अन्य महानगरो और देशो से गुजरते हुए आजकल अमेरिका के चिकागो के पास के एक कस्बे में कुछ सालो से डेरा डाले हुआ हूँ. मेरी नौकरी को मेहनत और लगन से कर रहा हूँ पर मेरा मन कहता है की जल्दी से छोड़ो कुछ और शार्थक करो, स्वच्छ राजनीतिक जीवन जीने का सपना है और लोगो के बीच रहकर उनके लिए काम कराने की तमन्ना है, लिखने और पड़ने में (विशेषकर भारत के बारे में) बहुत लगाव है, इसलिए ब्लॉग की दुनिया में आपके साथ हूँ. संयुक्त परिवार से आता हूँ, हिन्दी, हिंदुस्तान और भारतीय संस्कृति मेरे अभिन्न अंग है.


अरे भाई क्यों गाली देते हो ?

दुनिया वालों को भारत के सरकारी तंत्र से इतना शिकायत क्यों है , हम लोग हमेशा अपने मंत्री और संत्री लोगो को गाली देते रहते है, पर क्या कभी सोचा है उनकी मेहनत के बारे में ? इस बात को मेने तब अनुभव किया जब एक बहुत ही विद्वान दोस्त ने मेरी आँखों पर पड़े परदे को हटाकर मुझे वास्तविकता से परिचय कराया, में मूर्ख बहस करने बैठ गया कि अगर कोई चोरी से या भ्रष्ट होकर पैसा कमाए तो ऐसा करके देश के विकास से खिलवाड़ है , पर अब में ये नहीं कह सकता , अरे भाई उनको भी तो सुनो जो ऐसा करके निम्नलिखित रूप से देश की अर्थव्यवस्था को प्रगति के सोपान दे रहे है -

१। अगर ये दो नंबर की कमी न करेंगे तो इनके बच्च्चे और बीबी (यां) मल्टीप्लेक्स में जाकर कैसे सामान खरीदेंगे ? गाँव में कोई मल्टीप्लेक्स क्यों नहीं खोलता ? हर कोई वही क्यों खोल रहा है जहाँ पर ऐसे लोग रहते है ? इसका मतलब ये लोग आज की प्रगति के सच्चे जिम्मेदार लोग है.

२। शादियाँ इतनी रंगीन और आलिशान कैसे होंगी फिर ? आजकल शादियाँ इतनी आलिशान इसलिए ही है क्यूंकि हमारा प्रजातंत्र बहुत योजनाये लेकर आ रहा है, और जितनी योजनाये , उतना ही बचत सरकारी कर्मचारियों के लिए २ नंबर की कमाई से, और उतना ही पैसा शादी के खर्च में लगा सकते है, जिससे अर्थव्यवस्था का चक्र चलता रहता है. नहीं तो बैंड की और हलवाई की दुकाने ही बंद हो जायेंगी.

३। पेमेंट वाली सीटो के कॉलेज खुल रहे है क्यूंकि दो नंबर का पैसा है तो क्या टेंशन है बच्चा पढे या नहीं, कही न कही तो जुगाड़ हो ही जायेगी. कॉलेज खुलेंगे तो आसपास के क्षेत्र का भी विकास होगा, इसका मतलब इन लोगो का ये योगदान भी अभूतपूर्व है.

४। रिश्वत की कमाई के लिए इन लोगो को भी बहुत कुछ करना पङता है, जैसे फाइलो में हेराफेरी , साईट पर जाओ तो कर्मचारियों या फिर सामान की संख्या में हेराफेरी, बॉस की कमीशन की जुगाड़, आदि आदि , ये सब करने में भी मेहनत लगता है.

५। शायद हम इसलिए इन लोगो की बुराई करते है क्यूंकि हम इस काबिल ही नहीं की ऐसी चतुराई से काम कर सकें -)

इन सब कारणों को देखते हुए, ये सत्य है ये लोग भी आज के तथाकतित प्रगतिशील भारत के विकास में जिम्मेदार है। पर ये इससे भी बड़ा सत्य है भारत की ७० प्रतिशत जनता अभी भी प्रगति से अछूते उन गांवों में रहती है जहाँ बिजली आती कभी कभी है , जाती तो हर समय है, जहाँ पर रोड कभी पूरी बन नहीं पाती, पुल टूटे ही पढे रहते है, ५० प्रतिशत जनता के लिए अच्छे अस्पताल और विद्यालय नहीं है. जहाँ आज भी लोग हर साल हर कोने में भूख से आत्महत्या कर रहे है और फिर भी वोट डाले जा रहे है उन निकम्मे लोगो को जो सिर्फ देश सेवा और जन सेवा के नाम पर परिवार सेवा को ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते है और जिन्होंने इमानदारी और देश प्रगति की बातो को सिर्फ फाइलो की सुन्दरता का अभिप्राय बना रखा है.
जय हिंद को हमने नारा तो बना दिया पर जीवन का सिद्धांत बनाना भूल गए. 'नर हो न निराश करो मन को' के भरोसे हम जैसे लोग भी बस गाली देते रहते है और सर्कस देखते रहते है, करते कुछ नहीं. एक साक्षात्कार में हमारे राजदीप सरदेसाई जी बोलते है कि "जिस दिन कही विस्फोट हो जाए और आप उस शहर में तो इससे बड़ा दिन पत्रकार के लिए कुछ नहीं" ...कैसी मानसिकता है ये ?

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : श्री निलेश माथुर

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज श्री निलेश माथुर की रचना पढिये.

लेखक
परिचय -
नाम- निलेश माथुर
पेशा - व्यवसाय
मूल रूप से बीकानेर, राजस्थान का रहने वाला हूँ, अब गुवाहाटी, असम में रहता हूँ , पढने का बहुत शौक है साथ ही थोडा बहुत लिख भी लेता हूँ, पत्र पत्रिकाओं में अक्सर मेरी कविताएँ प्रकाशित होती हैं!


शीर्षक- श्री मति जी

एक बार हमने
अपनी श्री मति जी के
रौद्र रूप पर
चार लाइनें लिख दी,
और बिना परिणाम सोचे
श्री मति जी को सुना दी
श्री मति जी ने सुनते ही
रौद्र रूप धारण किया
उसके बाद हम पिट रहे थे
और हमारे पडौसी
छत पर खड़े होकर
मुफ्त का मज़ा लूट रहे थे,
हमने पिटते हुए ही
हाथ जोड़कर क्षमा याचना की
और उनसे
पिटाई बंद करने का
नम्र निवेदन किया,
तब जाकर उन्होंने
हमारी पिटाई बंद की और कहा .....
माना की तुम
सड़े से कवि हो
पर ये क्यों भूलते हो
कि किसके पति हो
फिर ये जुर्रत की
तो कान के नीचे एक लगाऊँगी
और तुम्हारा कविता का भूत भगाऊंगी !

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री तेज प्रताप सिंह

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं. अब एक सप्ताह से भी कम समय बचा है.

आज श्री तेज प्रताप सिंह की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम-तेज प्रताप सिंह
शिक्षा-एम एस सी (जैवरसायन), पी एच डी (मोलीकुलर मेडिसिन, ऑस्ट्रिया; जारी)
निवास-गोंडा, उत्तर प्रदेश
ब्लाग : साहित्य योग

साहित्य में बचपन से ही लगाव रहा है। पहली रचना "समाज का दाग" मैंने उस समय लिखी जब मैं १० वीं का छात्र था। मेरा मानना है लिखने के लिए शब्द नहीं बल्कि भावना की जरुरत होती है.


शौचालय का दर्द

एक दिन शौचालय भी हंस कर बोल पड़ा

मैं तो एक हूँ पर लोग क्यों अनेक हैं

किसी का मोटा, किसी का पतला

कोई गोरा तो कोई काला................

सब अपनी तशरीफ़ रखते हैं

खुद तो पकवान खाते हैं

मुझे सडा-गला बचा हुआ खिलाते हैं

हर दिन कुछ नया मिलता है

कभी सानिया-मलिक के निकाह

के खाने की खुसबू मिलती .......

तो कभी आयशा सिद्दीक़ी के

तलाक के बाद का लिया गया निवाला

राजनीतिक खुसबू की तो बात ही निराली

संसद के अन्दर-बाहर जितनी भी रोटियां पकती

देर-सबेर हमें उसकी खुसबू मिल ही जाती

राहुल और माया के तशरीफ़ का स्वाद भी मिलता

पर दलित तडके के कारण एक जैसा ही लगता

फ़िल्मी सितारों की महक आज-कल थोडा सड़ी है

क्योंकि आईपीएल से बॉक्स ऑफिस की हवा उडी है

बाबा राम देव ने लगता है कुछ खाया नहीं

योग शक्ति के डर से कुछ भी बाहर आया नहीं

शशि थरूर ना अपना हाजमा खुद खराब किया

जो बिना हाजमोले के मोदी से दो-दो हाथ किया

अमर तो लखनऊ में मेरा दरवाजा ही खोलना भूल गए

दिल्ली में रहते हैं हमेशा जमें जबसे मुलायम से दूर गए

राज ठाकरे जब कभी मौसम बे मौसम आते हैं

तो हमेशा मराठी मानुस की याद दिलाते हैं

कवी महोदय तो अब आते नहीं

लगता है वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के

चक्कर में कुछ खाते नहीं......

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री दीपक चौरसिया 'मशाल'

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं. अब एक सप्ताह से भी कम समय बचा है.

आज श्री दीपक मशाल की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम : दीपक चौरसिया 'मशाल'
माता- श्रीमति विजयलक्ष्मी
पिता- श्री लोकेश कुमार चौरसिया
जन्म- २४ सितम्बर १९८०, उरई(उत्तर प्रदेश)
प्रारंभिक शिक्षा- कोंच(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- जैवप्रौद्योगिकी में परास्नातक, पी एच डी(शोधार्थी)
संस्थान- क्वीन'स विश्वविद्यालय, बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैण्ड, संयुक्त गणराज्य

१४ वर्ष की आयु से साहित्य रचना प्रारंभ की, प्रारंभ में सिर्फ लघु कथाओं, व्यंग्य एवं निबंध लिखने का प्रयास किया। कुछ अभिन्न मित्रों से प्रेरित और प्रोत्साहित होके धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी, कहानियां लिखनी प्रारंभ कीं. अब तक देश व क्षेत्र की कुछ ख्यातिलब्ध पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा का प्रकाशन, रचनाकार एवं शब्दकार में कुछ ग़ज़ल एवं कविताओं को स्थान मिला. श्रोताओं की तालियाँ, प्रेम एवं आशीर्वचनरूपी सम्मान व पुरस्कार प्राप्त किया.

हाल ही में प्रथम काव्य संग्रह 'अनुभूतियाँ' का शिवना प्रकाशन सीहोर से प्रकाशन.
रुचियाँ- साहित्य के अलावा चित्रकारी, अभिनय, पाककला, समीक्षा, निर्देशन, संगीत सुनने में खास रूचि।
ब्लॉग- मसि कागद(http://swarnimpal.blogspot.com)
email: mashal.com@gmail.com
संपर्क- +४४ ७५१५४७४९०९


खामोश!!!नेताजी दौरे पर हैं....

आज नेता जी को दौरे पर जाना है. सारी तैयारियों का जायजा लिया जा रहा है, असल में है क्या कि आज के छवि-सुधार शिड्यूल में नेता जी को श्रमदान करना है, पैदल चलना है, रस्ते में कार रोक समोसे खरीदकर खाना है और सबसे बाद में एक हरिज़न के यहाँ खाना खाना और सोना है. पहले से तैयारियों के चलते अफसरों की एक टीम पहले ही गाँव की तरफ गई हुई है. एक सेक्रेटरी सब व्यवस्थाओं का पुनरीक्षण कर रहा है.

नेता जी के खासमखास ''आदमी' ने एक चमचे को बुला कर कहा- ''देखो, मीडिया वालों को खबर कर के बुला लो और उनकी जम के खातिरदारी करना और समझा देना कि अपने खबरियों को कह दें कि ये खबर तब तक लीक नहीं होनी चाहिए.. जब तक कि दौरा पूरा ना हो जाए. हाँ दौरे के बाद ये समाचार बनाना कि नेता जी ने अचानक दौरा किया और सत्तारूढ़ पार्टी के राज में प्रशासन इतना चुस्त-दुरुस्त है कि देश का इतना बड़ा युवा नेता दौरा करके चला गया और किसी को कानो-कान खबर भी ना लगी.''
कहकर वापस अन्दर नेता जी को सजाने-संवारने के लिए अन्दर जाने लगे तो अचानक कुछ और ध्यान आया... पलट कर आये और बोले-
''अरे सुनो, उधर प्रशासन के सभी बड़े अफसरान के घर मिठाई के डब्बे भिजवा कर उन्हें भी बतला देना कि तरक्की चाहते हों तो थोड़ा सा अपमान सहें और दौरे के बाद ही अपनी गाड़ियां 'मुकम्मल' स्थान की तरफ दौडाएं. ''
कार्यालय के दूसरे कमरे में एक दूसरे खास आदमी जी लिस्ट मिला रहे हैं-
''प्लास्टिक का तसला ले लिया, थर्माकोल के बने रंगे हुए पत्थर ले लिए, नेता जी के कुरते को मजदूर के कुरते का लुक देने के लिए मटमैला चन्दन ले लिया, जिन मजदूर युवतियों के साथ नेता जी मिट्टी ढोएंगे उनका चयन खूबसूरती के आधार पर हो गया है और उन्हें हिदायत दे दी गई कि अच्छे से नेताजी द्वारा भिजवाये गए खुशबूदार साबुन से मल-मल कर नहा कर आयें और ढेर सारा डियोद्रेंट और परफ्यूम लगाना ना भूलें, वगैरहवगैरह...''

नेता जी का कारवाँ सज चुका है और जेड प्लस प्लस प्लस सुरक्षा के अतिरिक्त २ अन्य गाड़ियां, जो कि निजी कंपनियों के सुरक्षाकर्मियों से भरी थीं काफिले के आगे पीछे लगा दी गई हैं. एक गाडी में नहाने और पीने के लिए मिनरल वाटर भर लिया गया है. इस तरह नेता जी जिंदाबाद के नारे के साथ सभी १८-२० गाड़ियों का 'छोटा' सा काफिला बीहड़ के एक गाँव की तरफ रवाना हो गया. नेता जी ने रास्ते में पोलेराइड ग्लास वाला काला चश्मा लगा लिया है और सेक्रेटरी को गाँव के बाहर ही चश्मा उतारने की याद दिलाने के लिए भी कह दिया जिससे कि उन पर हाई-फाई बनने का इलज़ाम ना लगे.
नेता जी एक दूरदर्शी 'इंसान' हैं इसलिए रास्ते में ही अपने ख़ासमख़ास से पूछ लिया कि- ''समोसे वाले के यहाँ अपने रसोइये भेज कर हाइजीनिक समोसे बनवा के रखे या नहीं?''
जवाब से संतुष्ट ना हुए और खुद ही रसोइये से बात कर उसपर उपकार किया. उसको बोला कि- ''किसी तरह की गड़बड़ नहीं होनी चाहिए समोसे खाकर, कल एक और दौरे पर जाना है ना. तुम्हारे साथ फोटो भी निकलवा लेंगे अगर अच्छे बने तो.''
असल में वे अपने बेशकीमती जीवन के साथ कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे.
गाँव पहुँचते ही चश्मा उतारा गया, नेता जी गाँव के बड़े-बुजुर्गों से मिले और फिर श्रमदान स्थल पर पहुंच गए. लेकिन ये क्या उफ्फ्फ आज धूप इतनी कम.... खैर उसका भी इंतज़ाम हो गया मिनरल वाटर से नेताजी के कपड़ों और चेहरे पर पसीने का मेकअप किया गया(आखिर मेकअप वोमेन को साथ में लाना व्यर्थ नहीं गया).

नेता जी के आगे-पीछे मजदूर और बीच में नेता जी. अब मिट्टी डालने का शुभकार्य प्रारंभ हो गया और मीडिया जो कि घंटों से इस ऐतिहासिक क्षण की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी जल्दी जल्दी नेता जी के कई कोणों से पोज लेने में लग गई.
वहाँ से निपटकर काफिला आगे बढ़ा और 'सुनिश्चित' समोसे की दुकान पर 'अचानक' रुका. लेकिन हाय किसी ने ध्यान ही नहीं दिया उनकी तरफ... सिवाए समोसे वाले के, जिसे पहले से सब ज्ञात था. काफिले में से ही एक चमचा चिल्लाया- ''अरे इतना बड़ा नेता इतनी छोटी और 'अनहाइजीनिक' दुकान पर समोसे खा रहा है, कितने बड़े दिलवाला है, हमारा सच्चा हितैषी है. हमारी ही तरह का है.'' और जिंदाबाद के नारे लगने शुरू हो गए.
मीडिया तो पहले ही पीछे लगी हुई थी. वहाँ भी २-३०० फोटो निकाल डाले.

अब शाम को दलित बस्ती के एक सबसे साफ़ मगर फिर भी डेटोल से ४ बार धोये गए घर में नेता जी पहुंचे. परिवार की धुली-पुंछी वयोवृद्ध मुखिया के साथ फोटोशेसन चला. शाम को पास के ही पञ्च सितारा होटल से मंगवाया गया खाना साफ़ से बर्तनों में उड़ेल कर बाहर लाया गया और मीडिया के सामने किसी ने पीछे से कहा- ''देखिये दलितों के घर का खाना खा रहे हैं, क्या देवता स्वरुप आदमी हैं!!'' नेता जी फिर जिंदाबाद हुए.
इसी तरह रात में सारे काफिले और मीडिया के साथ उसी परिवार के साथ रात गुजारी.
सुबह तडके काफिला वापस कार्यालय की तरफ रवाना हो गया. कुछ देर में एस.पी. और डी.एम्. की गाड़ियां उस हरिजन के घर पहुँची जहाँ नेता जी रुके थे. सब ठीक तरह से संपन्न हो गया.

आज के अधिकाँश अखबार तो उनकी तारीफों में रंगे हुए थे. लेकिन पता नहीं क्यों मीडिया का एक वर्ग नाराज़ हो गया, जिसने कि उनके श्रमदान में कमियाँ निकालते हुए तस्वीर निकाल दी. बेवजह खबर को उछाला और कहा गया कि श्रमिक के हाथ में लोहे का तसला था और नेता जी के में प्लास्टिक का, श्रमिक के तसले में ऊपर तक पत्थर-मिट्टी भरी थी जबकि नेता जी का खाली था. यही तुलना उनके स्पोर्ट्स शूज और मजदूर की चप्पलों में हुई. हद हो गई शराफत की.. बेचारेनेताजी ने इतना सब किया इस बेदर्द जनता के लिए और नतीजा क्या मिला?'' खैर नेता जी ने तुरत-फुरत अगले कार्यक्रम के लिए नया तसला, जो कि प्लास्टिक का हो लेकिन दिखने में लोहे का लगे, बनवाने का ऑर्डर दे दिया साथ ही कुछ और थर्माकोल के रंगीन पत्थर जो असली से कहीं कमतर ना हों. आखिर में उस अखबार के हेड आफिस फोन लगा कर उसके चीफ को नेता जी के साथ डिनर पर आमंत्रित किया गया.

दीपक 'मशाल'

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. अब सिर्फ़ एक सप्ताह का समय ही शेष बचा है आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री विजय कुमार सप्पत्ति

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज श्री विजय कुमार सप्पत्ति की रचना पढिये.


लेखक परिचय : खुद लेखक के शब्दों में.
नाम : विजय कुमार सप्पत्ति
स्थान : FLAT NO.402, FIFTH FLOOR,
PRAMILA RESIDENCY; HOUSE NO. 36-110/402,
DEFENCE COLONY, SAINIKPURI
POST, SECUNDERABAD- 500 094 [A.P.]

Sr.GM- Marketing (हैद्राबाद) के पद पर कार्यरत हूं.

Mobile no : +91 9849746500
email ID : vksappatti@gmail.com

मैं कविताये लिखता हूँ और मेरा कविताओ का ब्लॉग भी है http://poemsofvijay.blogspot.com/ . मुझे कविताये लिखने का शौक है , तथा मैंने करीब २५० कवितायें, नज्में लिखी है .



दोस्तों ,ज़िन्दगी की आपाधापी में अगर आपको कुछ आनंद चाहिए तो इन्हे अवश्य आजमायें .और मुझे अवश्य बताये कि क्या ये great ideas कैसे है ?

[१] स्कूटर कि डिक्की में दो स्टील के ग्लास और एक थाली , थोड़ा सा सेव - चिवडा , एक पानी की bottle , और एक अपना मनपसंद पौव्वा ..... लेकर अपने अजीज दोस्त के साथ , शहर को बाहर जाती हुई सड़क पकड़ ले .. १५-२० KM जाने के बाद , मैदान और खेत दिखेंगे .. वहां भीतर चले जाएँ और दोनों दोस्त बैठकर " मित्रां दी मेला करे, तुम्बा तुम्बा दारु पिए , और झूम झूम भांगडा करें ............"

[२] दोस्तों के साथ बैठकर कंठ तक पिये , लडाई झगडा करें ,गाली गलोज करे.. और दूसरे दिन कहे.. " यार , साले ,कल कुछ ज्यादा हो गई थी . चल बे , आज फिर वही मिलते है रात को ......"

[३] दोस्त की शादी में " नाग - सपेरे " का और "पतंग बाज़ी " का dance करे [ पहले दो घूँट जरुर लगा ले ]

[ ४] गर्मी के दिनों में घर की छत पर या घर के आँगन में निवाड वाली खटिया डाले ,उस पर नरम चादर डाले , मच्छर अगरबत्ती जलाएं , portable radio on करें , विविधभारती में छायागीत लगाए, पुराने गाने सुनते सुनते सुहानी नींद में सो जाए...

[५] खुली वाली जीप में दोस्तों के साथ बैठे , खूब जोरो से music बजाये , ट्रैफिक वाले का चालान भरे .. २ km चुप चाप चले , फिर तेज़ music play करें , फिर चालान भरे .. फिर २ km चले , और देखे की कौन सा दोस्त पहले बोलता है की " यार जरा आवाज बढाओ बे ... " उसकी धुलाई कर दे ...

[ ६] सारे दोस्त मिलकर एक सिगरेट जला ले , बारी बारी कश ले ... जो दोस्त सिंगल कश में डबल कश ले , उसकी धुलाई कर दे...

[ ७] सारे दोस्त मिले और बैठकर , 10th class की कोई लड़की की याद करें और किसी दोस्त का नाम लेकर जोर से ठठाकर हँसे ...

[८ ] यूँ ही दोस्त मिलकर पागलो की तरह हँसे .. एक दूसरे के गंजे सर , बड़ी हुई तोंद और आते हुए बुढापा को लेकर भद्दे मजाक करे और हँसे ...

[९] कुछ दोस्त मिल जाएँ , एक सस्ता सा guitar और डफली ख़रीदे.. और एक beach पर जाएँ , वहां पर टॉवेल बिछाएं और काले चश्में पहन कर एक बाटली के साथ बैठ जाएँ .. [ बाटली की choices - पानी , कोल्ड ड्रिंक , देसी दारु, कच्ची दारु, महुए की दारु, व्हिस्की, रम , जिन, बियर, या इन सब का मिश्रण ] दो -तीन घूँट भीतर जाने के बाद आप ऐसा guitar और डफली बजायेंगे की बस पूछिए मत.. थोड़े देर के बार आस पास कुछ लोग जमा हो जाएँ तो एक दोस्त टोपी उलटी कर के सबसे पैसे मांग ले .. [ अब चूंकि वहां कोई आपको जानता नही है , इसलिए पैसे मांगने में कोई हर्ज़ नही है ] शाम को उन्ही पैसे से आपकी रात गुलज़ार हो जाएँगी .. दो चार दिन अलग अलग beches में ये आजमाते रहिये .. हो सकता है आपको कोई band या rock group अल्बम के लिए offer कर दे......

[१०] कुछ दोस्त मिल कर horror movie देखने जाएँ , रात का आखरी शो. !! जब भी भूत आयें तो सीट के नीचे मुंह डाल कर अजीब आवाजे निकाले , इस से आपका डर भाग जायेगा और बाकि दर्शको को और डर लगेंगा .

[ ११] कभी कभी साइकिल पर यूँ ही डोलते डोलते , नुक्कड़ तक चले जाईयें , वहां किसी ठेले पर खड़े हो कर कप और बस्सी में चाय पीजिये और ५ रुपये के समोसे खाईये और फिर साइकिल पर डोलते डोलते अपने घर आ जाईये ...

[ १२ ] तन्खवाह की तारीख के पाँचवे दिन , काम से लौटते हुए शहर के किसी अनजाने बार में अकेले चले जाईये , किसी कोने वाली मेज़-कुर्सी पर चले जाईये , वहां बैठकर पहले अपना मोबाइल switch off करें , जूतों को खोलिए .. , शर्ट की कुछ बटने खोल दीजिये , और सबसे बेहतरीन व्हिस्की को सोडे के साथ आर्डर करिए.. साथ में फिश फ्राय या काजू फ्राय मंगा लीजिये . और सिर्फ़ दो पैग पीजिये - दो घंटे में ... न ज्यादा न कम !!!!... और फिर गाने सुनते हुए घर आ जाईये ...

[ १३ ] किसी नदी या नहर के पास चले जाईये . किनारे बैठेये .अपना मोबाइल switch off करें , जूतों को खोलिए .. पैंट को घुटनों तक उठाकर , पैरों को पानी में डाल दीजिये , बहते पानी के साथ अपनी यादों को भी साथ ले आईये .. थोडी देर बाद , अपनी आँखों में ठहरे आंसुओं को पोछें फिर अपने घर चले आईये ..

[ १४ ] कभी कभी रातों को उठ कर किसी पुराने दोस्त को फ़ोन करिए

[ १५ ] स्कूल बस में बैठे बच्चो को देखकर हाथ हिलाएं

[ १६ ] जो कुछ भी आपको मिला है , उसमे ही खुशी ढूँढिये ....

[ १७ ] कुछ यादों को कभी भी नही भूले ..

[ १८ ] इस दुनिया में बहुत कम “अच्छा “ है , आप की जरुरत है इस दुनिया को .. कुछ अच्छा कर जाएँ ...

[ १९ ] ईश्वर को न भूले. उससे और अपने आप से अवश्य डरें ... क्योंकि अक्सर "circle of life " repeat होता है ..

[20 ] और अब ; अपने सारें दोस्तों को ये sms करें " तबियत ठीक नही लग रही थी ...एक तांत्रिक को दिखाया ..तांत्रिक बोला की , भूत का साया है , किसी घोर पापी को sms करों , ठीक हो जओंगे... !!! तुझे sms भेजा है , अब अच्छा महसूस कर रहा हूँ ....... "


May God bless you all.

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- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : सुश्री आकांक्षा यादव

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

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आज सुश्री आकांक्षा यादव की रचना पढिये.

लेखिका परिचय :
नाम- आकांक्षा यादव
जन्म - 30 जुलाई 1982, सैदपुर, गाजीपुर (उ0 प्र0)
शिक्षा- एम0 ए0 (संस्कृत)
विधा- कविता, लेख, व्यंग्य व लघु कथा।
प्रकाशन- इण्डिया टुडे, कादम्बिनी, साहित्य अमृत, दैनिक जागरण, अमर उजाला, आजकल, उत्तर प्रदेश, युगतेवर, इण्डिया न्यूज, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, राजस्थान पत्रिका, आज, गोलकोेण्डा दर्पण, युद्धरत आम आदमी, अरावली उद्घोष, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा सहित शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। दो दर्जन से अधिक स्तरीय संकलनों में कविताएं संकलित। सम्पादन- ’’क्रान्ति यज्ञ: 1857-1947 की गाथा’’ पुस्तक में सम्पादन सहयोग।
सम्मान- साहित्य गौरव, काव्य मर्मज्ञ, साहित्य श्री, साहित्य मनीषी, शब्द माधुरी, भारत गौरव, साहित्य सेवा सम्मान, महिमा साहित्य भूषण, देवभूमि साहित्य रत्न, ब्रज-शिरोमणि, उजास सम्मान, काव्य कुमुद, सरस्वती रत्न इत्यादि सम्मानों से अलंकृत। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’’भारती ज्योति’’ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘‘।
विशेष-‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ (सं0-डा0 राष्ट्रबन्धु, कानपुर नवम्बर 2009) द्वारा बाल-साहित्य पर विशेषांक प्रकाशन।
रुचियाँ- रचनात्मक अध्ययन व लेखन। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रुचि।
सम्प्रति-प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज, नरवल, कानपुर (उ0प्र0)- 209401
सम्पर्क- द्वारा- श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101

ई-मेलः kk_akanksha@yahoo.com
ब्लाग : शब्द-शिखर और उत्सव के रंग


नेताजी का अरमान

नेता-अभिनेता दोनों
हो गए एक समान
मंचों पर बैठकर गायें
एक दूजे का गान।

चिकनी चुपडी़ बातें करें
खूब करें अपना बखान
जनता का धन खूब लूटें
गायें मेरा भारत महान।

मँहगाई, बेरोजगारी खूब फैले
नेताजी सोते चद्दर तान
खुद खाएं मुर्ग मुसल्लम
जनता भुखमरी से परेशान।

कभी आंतक, कभी नक्सलवाद
ये लेते सबकी जान
नेताजी बस भाषण देते
शहीद होते जाबांज जवान।

चुनाव आया तो लंबे भाषण
खडे़ हो गए सबके कान
वायदों की पोटली से
जनता हो रही हैरान ।

संसद में पहुँच नेताजी
बघारते अपना ज्ञान
अगला चुनाव कैसे जीतें
बस यही रहता अरमान ।

Akanksha



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- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री विवेक रस्तोगी

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज श्री विवेक रस्तोगी की रचना पढिये.

लेखक परिचय :
नाम : विवेक रस्तोगी
पेशे से बैंकिग क्षैत्र में तकनीकी विशेषज्ञ हूँ,
और अपने अंदर के कवि को ढूँढ़ रहा हूँ,
शब्दों को गढ़ता रहता हूँ जब कभी शब्द मुखर हो उठते हैं,
लिख देता हूँ।
ब्लाग : कल्पनाओं का वृक्ष


नये और अशिक्षित कम्पयूटर उपयोगकर्ताओं के कारनामे

नये और अशिक्षित (so called trained computer operateor) कम्पयूटर उपयोगकर्ता क्या कारनामे करते हैं, उन्हें क्या कहो और वो क्या करते हैं । उसकी कुछ बानगियाँ आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ |

ये की तो कीबोर्ड पर मिलती ही नहीं है।
एक महाशय का फोन आया कि विवेक भाई एक की तो कीबोर्ड पर मिलती ही नहीं है कम से कम दसियों बार कीबोर्ड देख चुका हूँ और आपका साफ्टवेयर आदेश कर रहा है कि वही की दबानी है, मैंने उनसे पूछा सर बताओ तो सही कि कौन सी की दबाने का आदेश आपको मेरा साफ्टवेयर दे रहा है, तब वो महाशय बोले "प्रेस एनी की टू कन्टीनयू" "Press any key to continue"।

माऊस का उपयोग
एक नये क्लाईंट ने हमारा साफ्टवेयर उपयोग करना शुरु किया हमारी टीम ने पूरे स्टाफ को साफ्टवेयर उपयोग करने संबंधित जानकारी दी और उसके बाद केवल फोन पर तकनीकी सहयोग देते हैं एक बार हमारे पास फोन आया कि फाईल सेव हो गई है अब उसे देखेंगे कैसे, तो हमने उनसे कहा कि सर् "माई कम्प्यूटर" ( My Computer) पर माऊस ले जाकर डबल क्लिक करें, वो बोले ठीक है फिर
उसके बाद, हमने कहा पहले क्लिक तो कीजिये और बताइये स्क्रीन पर क्या दिख रहा है तो वो बोले कि बस एक मिनिट ...... और हम उनके एक मिनिट का इंतजार करने लगे जब पाँच मिनिट से ऊपर हो गये तो हमने पूछा क्या हुआ, तो जबाब आया ये "माई कम्प्यूटर" ( My Computer) कहाँ मिलेगा, हमने कहा सामने डेस्कटाप पर उल्टे हाथ की तरफ मिलेगा तो वे बोले ह‍ मिल गया हमने कहा अब डबल क्लिक करें वे बोले ठीक हैं फिर १ मिनिट २ मिनिट ... ६ मिनिट हो गये तो फिर हमने पूछा अब क्या हुआ, उनका जबाब आया "कुछ हो नहीं रहा है" हमने कहा ऐसा तो हो ही नहीं सकता वो बोले नहीं नहीं वाकई में कुछ नहीं हो रहा है। फिर हमने पूछा आपने क्या करा बोले जैसा आपने कहा "माई कम्प्यूटर" ( My Computer) पर माऊस ले जाकर डबल क्लिक करें" तो हम परेशान कि ऐसा कैसे हो सकता है मैने पूछा माऊस कहाँ रखा है वो बोले स्क्रीन पर डेस्कटाप पर "माई कम्प्यूटर" ( My Computer) के ऊपर रख कर क्लिक कर रहा हूँ।...... हा हा हा हा हा हा ...

जरा बाहर आकर अंदर जाइये
हमारे पास फोन आया कि कुछ समस्या हो गई है हमारे सोफ्टवेयर में तो सामान्यत:हम कहते हैं कि कृपया बाहर आकर अंदर जाइये इसका मतलब होता है कि लाँग आउट होकर लोगिन करें यही समाधान हमने दे दिया पर हमारे वो ग्यानवान यूजर कर ही नहीं पा रहे, हम भी परेशान कि बाहर आकर अंदर नहीं जा पा रहे हैं क्या बात है, तब हमारे सब्र का बाँध टूटा ओर हम खुद ही पहँच गये व कहा अब हमारे सामने जरा बाहर आकर अंदर जाइये तो भाई लोगों मेरे को चक्कर आने लगे क्योंकि वो साहब मेन गेट के शटर से बाहर जाकर अंदर आये और बोले देखो अब भी नहीं हो रहा है !!!

४ ही तो दबा रहा हूँ

एक दिन फोन आया कि विवेक भाई आपके साफ्टवेयर में एक अकाउँट की इनक्वायरी करनी है पर कुछ समस्या आ रही है, हमने कहा तो हम जैसा बताते हैं वैसा आप करते जाइये, हम बताते गये वो करते गये बस एक जगह अटक गये, हम कह रहे थे कि ४ दबाओ (Press 4) और वो कहते हाँ दबा दिया पर कुछ हो नहीं रहा जब १५ ‍- २० मिनिट हो गये तो हमने पूछा कि सर एक बात बताओ ये बारबार मुझे फोन पर बटन दबाने की आवाज आ रही है ये कैसे आ रही है क्या कोई रिडायल कर रहा है, वो बड़ी मासूमियत से बोले आप ही तो कह रहे हैं कि ४ दबाओ ....................... ::

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सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : सुश्री वाणी शर्मा

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज सुश्री वाणी शर्मा की रचना पढिये.

लेखिका परिचय ....
नाम : वाणी शर्मा
शिक्षा : एम . ए .(इतिहास ), एम . ए प्रिविअस (हिंदी )
साधारण गृहिणी ...पढने का अत्यधिक शौक और कभी कभी लिख लेने का प्रयास हिंदी ब्लोगिंग तक ले आया है ...
ब्लाग : ज्ञानवाणी

ये बेचारे पति ....

हरी अनंत... हरी कथा अनंता की तरह पतियों की अपार महिमा को महज दस पॉइंट्स में प्रस्तुत करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है...मगर फिर भी कोशिश कर रही हूँ कि कुछ लिख सकूँ ....
बात पति की हो और खाने से शुरुआत ना हो ....

पत्नी के हाथ का बना भारतीय, चायनीज , कांटिनेंटल ...हर तरह का खाना अपनी अंगुलिया चाट कर खाने के बाद पेट पर हाथ फेरते पतियों के मुंह से यही सुनने को मिलेगा ...खाना तो हमारी मां बनाती थी ...(वो चाहे जिंदगी भर पुए पकौड़ी बना कर ही खिलाती रही हों )......

2 किलोमीटर जोगिंग कर के आये पत्नी और बच्चों के साथ बैडमिन्टन खेलते हुए अगर पिताजी का फ़ोन आ जाये तो फिर देखिये ....दुनिया जहां की दुःख तकलीफ एक साथ उनकी आवाज में समां जायेगी ....बरसों पहले पाँव की टूटी हड्डी का दर्द उभर कर सामने आ जाता है ....

और इन पतियों के टेनिस प्रेम का तो कहना ही क्या ...विशेषकर जब विलियम्स बहने खेल रही हों ...शर्त लगा ले ...अगर ज्यादातर पतियों को टेबल टेनिस और लोन टेनिस का अंतर भी मालूम हो तो... टकटकी लगाये इन टेनिस प्रेमियों से कोई पूछे तो कि इनके सात पुश्त में भी किसी ने टेनिस खेली थी ....और तो और जिन दिनों विम्बल्डन (महिला ) मैच आ रहे हो ...अपने सर्वाधिक प्रिय खेल क्रिकेट का त्याग भी बड़ी ख़ुशी ख़ुशी कर देते हैं ...

टीवी पर उद्घोषिकाओं के ओजस्वी बोल्ड वचनों और वादविवाद से प्रभावित इन पतियों को अक्सर पत्नियों से ये कहते सुना जा सकता है..." मुंह बंद नहीं रख सकती हो ...जरुरी है हर बात का जवाब देना "

टीवी चैनल पर कार्यक्रम को खोजते हुए रिमोट पर इनकी अंगुलिया किस कदर दौड़ती हैं कि मजाल है कोई भी कार्यक्रम ढंग से और पूरा देखा जा सके और जिन चैनल्स पर जा कर रूकती हैं ...ये नाक मुंह भौं सब सिकोड़ते हुए मिल जायेंगे ..." कैसे कैसे कार्यक्रम दिखाते हैं ये लोग भी " ....मगर मजाल है जो कम से कम दस मिनट से पहले रिमोट पर इनकी अंगुली आगे बढ़ सके ...

घर से बाहर घूमने , खाना खाने , मूवी देखने जाने पर दूसरे नव विवाहित जोड़ो (या बिना विवाहित भी ) को देखकर भीतर ही भीतर ठंडी आंहे भरते उन जोड़ो को कोसते नजर आ जायेंगे ...." क्या जमाना आ गया है " ...अब ऐसे में कोई उनके बीते ज़माने याद दिला दे तो ...

फिल्मे बकवास होती है ..क्या कहानी होती है ...फालतू समय की बर्बादी ....मगर माशूका या पत्नी के गम में इन पतियों को पास बैठी पत्नियों को बिसराते शाहरुख के साथ आंसू बहते अक्सर देखा जा सकता है ...कोई गम सालता है इन्हें भी ...कि जुदाई का गम कैसे महसूस करे... ये कही जाती ही नहीं ...

पत्नी की लाई अच्छी से अच्छी शर्ट भी इन्हें तभी पसंद आती है जब बाहर से उनकी तारीफ सुन कर आयें ...

उम्र बढ़ने के साथ इनकी खूबसूरती बढती जाती है...और पत्नी की कम (खुद इन पतियों की नजरों में )

और बार बार टूटा दिल तो ये अपनी जेब में लेकर चलते हैं...चेहरे की रंगत बताती है जितनी बार टूटा उतना अधिक फायदा ...अलग- अलग टुकड़े अलग- अलग सुन्दरियों को एक साथ देने के काम आ जाते हैं

कितना क्या लिखूं ...अनगिनत पुराण लिखे जा सकते हैं ....मगर कही जाकर तो रुकना होता है ...एक साथ इतने झटके झेल नहीं सकते ....बाकि फिर कभी ...

जरुरी सूचना :-

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वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : डा. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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आज डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम- डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
पिता का नाम- श्री महेन्द्र सिंह सेंगर
माता का नाम- श्रीमती किशोरी देवी सेंगर
शिक्षा- पी-एच0डी0, एम0एम0 राजनीतिविज्ञान, हिन्दी साहित्य, अर्थशास्त्र, पत्रकारिता में डिप्लोमा
साहित्य लेखन 8 वर्ष की उम्र से।
कार्यानुभव- स्वतन्त्र पत्रकारिता (अद्यतन), चुनावसर्वे और चुनाव विश्लेषण में महारत
विशेष- आलोचक, समीक्षक, चुनाव विश्लेषक, शोध निदेशक
सम्प्रति- प्रवक्ता, हिन्दी, गाँधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)
सम्पादक- स्पंदन
निदेशक- सूचना का अधिकार का राष्ट्रीय अभियान
संयोजक- पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन
ब्लाग : रायटोक्रेट कुमारेंद्र और शब्दकार

व्यंग्य
आफत के मारे, हम बेचारे!
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर


सुबह-सुबह घड़ी का अलार्म घनघना उठा। घनघनाहट इतनी तेज थी कि आँख खुल गई, वैसे भी आज के जमाने में चैन की नींद आती भी कहाँ है। कुछ सोच पाते उससे पूर्व श्रीमती जी पलंग पर पड़े-पड़े ही चिल्ला उठीं-‘‘क्या घोड़े बेच कर सो रहे हो, उठना नहीं है?’’

हिम्मत तो नहीं थी कि यह पूछते कि बात क्या है? क्यों उठाया जा रहा है? गृहमंत्री जो ठहरे.....अरे भाई हम नहीं....हमारी श्रीमती जी। किसी तरह मन मारकर उठे तो श्रीमती जी ने वहीं पड़े-पड़े सामने की अलमारी की तरफ इशारा करते हुए आदेशात्मक रूप में अपनी जुबान खोली-‘‘अलमारी से गैस वाली किताब और साथ में रखे छह सौ रुपये उठाकर सिलेण्डर लेने चले जाओ।’’

हमने अपनी जीभ को भी लपलपाने का मौका दिया.....‘‘इतनी सुबह? अभी कौन सा सिलेण्डर मिल रहा होगा?’’ बस भैया.....यहीं गलती हो गई। श्रीमती जी आपे से बाहर होकर पूरी ताकत से रिश्तेदारी निभाने लगी। ‘‘तुम्हारे कक्का की एजेंसी है कि जब पहुँचे तभी सिलेण्डर हाजिर।

श्रीमती जी इतने पर भी नहीं थमीं-‘‘हे भगवान! किस आदमी से पाला पड़ा है?... पता नहीं मेरे बाप को क्या दिखा था इसमें?’’ रिश्तेदारी निभाने में श्रीमतीजी दोनों पक्षों का सम्मान करतीं हैं।

व्यवस्था को कोसते हुए गैस की बुकिंग बुक, रुपये उठाये और फिर खाली सिलेण्डर संभालने को रसोई की ओर मुड़ गये।

‘‘कहाँ चले जा रहे जो मुँह उठाये, सिलेण्डर बाहर रखा है, बरामदे में.... किचन में न तलाशो.....अभी कुछ पटक दोगे तो बस।’’ श्रीमती जी की तीव्रतम ध्वनि से हड़बड़ाकर रसोई के दरवाजे से अपना सिर टकरा बैठे। बिना किसी प्रकार की चूँ-चपाड़ करे अपने सिर को मलते हुए खूँटी पर टँगी पुरानी शर्ट उठायी, अपने तन पर लटकाई और सिलेण्डर उठाकर बाहर आ गया।

खाली सिलेण्डर को साइकिल के कैरियर पर लगाने के प्रयास में दो बार साइकिल और सिलेण्डर ही पटक दिये। अबकी तीसरी बार पूरी दम लगा कर सिलेण्डर को किसी तरह साइकिल के कैरियर पर लादा। अभी दरवाजा खोलकर बाहर कदम निकाला ही था कि बगल वाले महाशय ने पीछे से आवाज के सहारे पकड़ लिया-‘‘क्यों भाई साहब, कहाँ भागे जा रहे.... सुबह-सुबह?’’

‘‘कहीं नहीं भाई साहब, सिलेण्डर को मार्निग वॉक पर ले जा रहे हैं।’’ हमने खीझकर जवाब दिया।
‘‘हें....हें....हें.....मेरा मतलब ये नहीं था....मेरा मतलब था कि क्या गैस भरवाने जा रहे हैं?’’ वे श्रीमान् जी अपनी आदत से बाज नहीं आये।

‘‘नहीं भाई साहब, गैस तो ज्यादा ही भरी हुई है। अभी अभी एजेंसी से फोन आया था, वहाँ गैस खतम हो गई है। उन्हीं को थोड़ी सी गैस देने जा रहे हैं।’’

वे महाशय समझ गये कि हम उनकी बातों के चक्कर में आने के मूड़ में नहीं हैं। सो बिना और कोई सवाल किये अपनी साइकिल पोंछने लगे।

हम इस डर से कि देरी के चक्कर में लम्बी लाइन का शिकार न हो जाना पड़े, हालांकि मन में यह विश्वास था कि इस समय लगभग चाढ़े पाँच बजे सुबह लाइन नहीं होगी, तेजी से साइकिल चलाते गैस एजेंसी की तरफ भागे जा रहे थे। रास्ते में दो-तीन कर्तव्यनिष्ठ पति और मिले जो हमारे साथ भाग रहे थे।

‘हे भगवान! ये क्या?’ मुँह से हल्की सी आह निकल गई। एजेंसी के सामने विशाल जन समुदाय..... एक लम्बी लाइन लगी थी। पहले पूरी लाइन का मौका-मुआयना किया कि कोई ऐसा परिचित मिल जाये जो अपने साथ ही हमारी गैस बुक और सिलेण्डर ले ले। थोड़ी सी इधर उधर की निगाहबाजी के बाद एक दो लोग परिचित दिखे। पहले तो उन्होंने ही अनदेखा सा किया, बाद में हमने ही जबरदस्ती घुसपैठ की तो दुआ सलाम हो गई। वे शायद हमारी मंशा ताड़ चुके थे। सो नियम, एजेंसी मालिक, लोगों का बहाना मारने लगे। कुछ आनाकानी के बाद वे सज्जन हमारी बात मान गये। इससे पहले कि लाइन में हम लोग आपसी स्थानान्तरण कर पाते शेष जनसमुदाय असंतुष्ट विध्ाायकों की तरह शोरगुल मचाने लगा। ‘लाइन में आओ....‘हम सब बेवकूफ हैं क्या?’.....‘सुबह से हम भी लगे हैं’....‘कोई लाट साहब हो क्या?.....‘एक तमाचा लगाओ, मान जायेगा’.....वगैरह-वगैरह के विविध लघु वाक्य हमारे कानों में प्रवेश कर डरवा रहे थे।

डर के मारे, चाहे वो पिटने का रहा हो अथवा खाली सिलेण्डर गुम जाने का, हमने अपना रुख चुपचाप लाइन में पीछे की ओर कर दिया। लगा कि देश की सरकार इसी कारण विपक्ष के दबाव में काम नहीं कर पाती है। जैस-तैसे तो कोई एक मौका आता है काम करने का पर वो भी कुछ लोगों के कारण पूरा नहीं हो पाता है। बहरहाल रोते-घिसटते, लोगों को कोसते-कोसते लाइन के आखिर तक आ गये। लाइन के एक साथी के हवाले खाली सिलेण्डर को छोड़ साइकिल को किनारे टिकाया।

कुछ देर तो खड़े-खड़े समय काटा और जब पैरों ने भी समर्थन बापस लेने जैसा रंग-ढंग दिखाया तो तशरीफ सिलेण्डर के ऊपरी हिस्से पर टिकाई, पैर-पैंट ऊपर सिकोड़े और बन गये राजा साहब। बैठे-बिठाये सोचा कि पता तो करें कि हम किस नम्बर पर होनहारपन दिखा रहे हैं। गिनना शुरू किया तो पता लगा...पूरे बासठ....साठ से भी दो ज्यादा यानि कि सठियाने से अधिक।

तभी कुछ हलचल सी हुई, घड़ी देखी तो अभी सवा सात के आसपास हो रहा था। सोचा कि फिर हलचल क्यों? हलचल की तरफ देखा तो चाय वाले की झलक दिखाई दी। चाय के कप लोगों के हाथों में देख तलब ने एकदम तेजी से उभार मारा। चाय वाले को चिल्ला कर आवाज़ दी तो वह भी उससे अधिक तेजी से चिल्लाया-‘‘यहीं आकर ले जाओ।’’ अब फिर फँस गये, चाय पीनी है तो यह जगह छोड़नी होगी। जगह छोड़ी तो गया सिलेण्डर..... दिमाग इधर-उधर दौड़ाया......सिलेण्डर से उतर खड़े होकर हाथ-पैर खींच कर थकान भगाई। आसपास का कोई और चाय का शौकीन समझ में नहीं आ रहा था। एक-दो पल इधर उधर ताका फिर जब कुछ न सूझा तो अपने पीछे वाले से पूछा-‘‘क्या साहब, आपको चाय तो नहीं पीना है?’’ आवाज में अतिरिक्त मधुरता घोली कि शायद काम बन जाये।

‘‘पीता तो नहीं हूँ, पर आप पिलाओ तो पी लूँगा।’’ वे सज्जन खीसें निपोर कर बोले। अब चाय तो पीनी थी......जेब से एक दस रुपये का नोट निकाला। उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा-‘‘लीजिये साहब, दो कप ले आइए।’’ वे सज्जन तो बड़े काइयाँ निकले। सिर खुजाते हुए बोले-‘‘चाय आप पिलवा रहे हो.....नौकर हमें समझ रखा है। अरे पिलाना ही है तो जाओ और लेकर आओ।’’ मेरी चुप और कुछ संशय को देख वे ही आगे बोले-‘‘घबराइये नहीं, सिलेण्डर मैं देखे रहूँगा। कोई मेरे रहते नहीं चुरा सकेगा।’’

मरता क्या न करता, चाय तो पीनी थी सो खाली सिलेण्डर को एक अपरिचित के विश्वास पर छोड़ कर डरते-डरते चाय वाले की तरफ बढ़ चले। चाय की ठिलिया के चारों ओर भी मारा-मारी इस तरह से मची थी मानो वह फ्री में पिला रहा हो। दो-चार मिनट बाद भीड़ कुछ छँटी। चाय लेते ही एकदम से ध्यान आया कि सिलेण्डर तो किसी अपरिचित के भरोसे छोड़कर आये हैं ‘चोरी न हो गया हो’ के भय ने कदमों में तेजी ला दी। दूर से ही दिख गये वे सज्जन और उनके सामने सीना तान कर खड़ा हमारा सिलेण्डर। जान में जान आ गई। एक कप चाय महाशय को दी। वे मुस्कराकर चाय सुड़कने लगे।

भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। कुछ न कुछ बतियाना भी चल रहा था। कोई क्रिकेट पर, कोई फिल्म पर, कोई राजनीति पर तो कोई आने वाले चुनाव की आहट पर अपने-अपने स्पेशल कमेंट दे रहा था। शांतिपूर्ण माहौल में अचानक संसद-सत्र जैसा हंगामा शुरू हो गया। शोर होने लगा कि किसी का सिलेण्डर चोरी हो गया। अपने सिलेण्डर को पूरी तरह अपने कब्जे में लेकर हंगामे की ओर दिमाग दौड़ाया। देखा तो महाशय एक-दूसरे का कॉलर/गिरेबान पकड़े सांसदों/विधायकों की याद ताजा करवा रहे थे। कभी-कभी तो लगता है कि इस गिरेबान पकड़’ को तो राष्ट्रीय खेल बना देना चाहिए, जिसे देखो वही एक दूसरे की कॉलर पकड़ मैदान में खड़ा हो जाता है।

थोड़ी सी गाली गलौज, थोड़ी सी मारपीट के बाद पता चला कि मामला शांत हो गया। सिलेण्डर नहीं मिला और उसके मालिक साहब सिसियाए से घूम रहे हैं। हमें लगा कि कैसे आदमी अपनी चीज के प्रति अनजान बना रहता है?

इस दौरान हुआ तो बहुत कुछ। जो घर के सताये थे वह यहाँ लोगों को सता रहे थे। कुछ रंगीन मिजाज लोग महिलाओं की लाइन पर लगीं कुछ महिलाओं को विविध्ा दृष्टिकोणों से नापे जा रहे थे। लगभग पौने दस बजे के आसपास एजेंसी खुलने का उपक्रम हुआ। खामोश सी, निष्क्रिय सी भीड़ में ताजगी और उत्साह का संचार हुआ। कुछ कागज और एक दो रजिस्टर पकड़े एक महाशय भीतर से बाहर पधारे और ‘‘आज केवल पचास लोगों को सिलेण्डर मिल सकेंगे। बाकी लोग घर जायें....यहाँ भीड़ न लगायें’’ का ब्रह्मवाक्य बोल भीतर घुस गये।

लाइन में लगे लोगों में खलबली मच गई। हमारी तो हालत खराब थी पर देखा कि इक्यावन नम्बर वाले की स्थिति तो और भी बदतर हो रही थी। अब पहले पचास को छोड़ शेष किसी न किसी जुगाड़ में लग गये। जुगाड़ संस्कृति का ख्याल हमारे भी मन में आया पर कहाँ से लायें जुगाड़। यहाँ तो किसी से परिचय भी नहीं। सिलेण्डर न मिल पाने का दुःख तो हो रहा था पर सबसे बड़ा डर लग रहा था श्रीमतीजी के चिल्लाने का।

सिलेण्डर बँटने शुरू हो गये थे। जिन्हें मिल रहे थे वे ऐसे चल रहे थे मानो किसी जागीर के जागीदार हो गये थे। अपना कोई समाधान होता न देख खाली सिलेण्डर को घसीटना शुरू किया और चाय वाले के पास आकर खड़े हो गये। एक कप चाय का सूखा सा आर्डर कर उसी सिलेण्डर पर बैठ गये।

चाय वाला हमारी दशा को देख समझ गया कि हम हारे हुए प्रत्याशी हैं। हमारी दशा देख बोला-‘‘क्या बाबू जी, सिलेण्डर नहीं मिला?’’ उसने चाय का कप पकड़ाते हुए पूछा। चाय गुटकते-गुटकते उसके सामने सिलेण्डर प्रकट करवाने की गुहार लगायी। चाय वाले ने भी पर्याप्त खुशामद करवाने के बाद मुँह खोला कि ‘‘दो सौ रुपये ऊपर से लगेंगे और पचास हमारे......तैयार हो तो बताइये।’’

चाय का कप अधर में लटका रह गया। इधर-उधर का हिसाब लगा कर, आने-जाने का हिसाब जोड़कर, अपने आफिस की छुट्टी की स्थिति टटोल कर लगा कि ढाई सौ रुपये की सुविधा स्थिति बुरी नहीं है। मुँह में भरी चाय को गले से नीचे उतार चाय वाले को ’हाँ’ कर दिया। गैस-बुक और रुपये चाय वाले को थमाये। उसने अतिरिक्त फुर्ती दिखाते हुए खाली सिलेण्डर लेकर एजंेसी की तरफ भागा।

कुछ पलों के हसीन इंतजार के बाद चाय वाला भरे हुए सिलेण्डर के साथ प्रकट हुआ। हमें भी उस समय सुकून की परमानुभूति हुई, परमानन्द की प्राप्ति हुई। लाल रंग से भरा हुआ सिलेण्डर किसी लाल बत्ती से कम समझ नहीं आ रहा था। चाय वाले से उसे देखते रहने को कह साइकिल लेने को बढ़े कि चाय वाले की रूखी आवाज सुनाई दी-‘‘सिलेण्डर ले के जाओ। इसकी सुरक्षा की कोई गारण्टी नहीं।’’

भरे सिलेण्डर को कमजोर हाथों से उठाने का प्रयास किया पर बेकार रहा। अंततः बिना शारीरिक दमखम दिखाये सिलेण्डर को लुड़का कर ले जाने में भी भलाई समझी। पसीना बहाते, लातों-हाथों से धकियाते उस स्थान तक पहुँचे जहाँ साइकिल टिकाई थी। इस बीच मन में श्रीमती जी का उत्साह, घर की गरमागरम चाय और हमारी मेहनत का सुफल निकलने के सुन्दर-सुन्दर विचार बनते रहे पर उस स्थान को देख विचार चकनाचूर हो गये। साइकिल वहाँ थी ही नहीं.....नदारद। समझ नहीं आया कि हो क्या गया? यहाँ खड़ी साइकिल कहाँ गई? पास की पान की दुकान वाले पूछा। ‘‘यदि यहाँ नहीं है तो चोरी हो गई समझो।’’

उफ! सिलेण्डर पा लेने की सारी खुशी गैस की तरह ही उड़ गई। अब इस सिलेण्डर को छोड़कर जाया भी नहीं जा सकता था। समझ नहीं आ रहा था कि करें क्या? दुःख हो रहा था, खीझ भी हो रही थी कि दिमाग से साइकिल का ध्यान कैसे निकल गया? कोई चारा न देख चुपचाप खड़े हो गये। आँख भर-भर आ रही थी, आवाज भर्रा जा रही थी; यह सब इस बात से कम कि साइकिल चोरी हो गई थी इस बात से अधिक हो रहा था कि घर पहुँच कर अब छीछालेदर होनी है। सिलेण्डर मिल जाने की उपलब्धि इस चोरी के पीछे दब चुकी थी। मन में अपने गृहमंत्री-श्रीमती जी की कर्कश फटकार का खौफ लिए घर जाने के लिए रिक्शे वाले को रोकने की कोशिश में लग गये।

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
प्रवक्ता हिन्दी विभाग
गाँधी महाविद्यालय, उरई
सम्पादक-स्पंदन

जरुरी सूचना :-


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आज सुश्री अनामिका (सुनीता) की रचना पढिये.

लेखिका परिचय
नाम : अनामिका (सुनीता)
जन्म : ५ जनवरी, १९६९
निवास : फरीदाबाद (हरियाणा)
शिक्षा : बी.ए , बी.एड.
व्यवसाय : नौकरी
शौक : कुछः टूटा-फूटा लिख लेना, पुराने गाने सुनना

ब्लोग्स : अनामिका की सदाये और ' अभिव्यक्तियां '



व्यंग्य रचना ...दहेज के लोभी

आलू-प्याज़ बना दो दूल्हे को..
मंडी मे बिठवा वा दो मुंडे को..
बली के बकरे सा उसे पाल-पोस लो..
तराज़ू मे फिर रख-रख उसे फिर तोल लो..
जितना मोटा हो जाए , फिर बोली बोल दो..

दहेज़ के दानव देखो चिल्ला रहे...
मूह खोल के अपनी कीमत लगा रहे..
ग़रीब की बेटी देखो बूढया गयी..
एक दूल्हे की आस रीती जा रही..

चार बच्चो के अमीर बाप को देखो..
कल दहेज की खातिर जिसने दुल्हन जलाई थी..
पुलिस भी नोटो की चमक से दूंम दबाई थी..
वो आज एक कुंवारी दुल्हन ले आया है..
पवित्र अग्नि की सप्तपदी को नोटो से सजवाया है..!!

धू-धू दहेज की ज्वाला बढ़ती जा रही..
हम तो देखो विवेक की लंगोटी पकड़े बैठे है.
जलती है दुल्हने..बस आँखे नॅम कर लेते है..
समाज मे रहते है
और अच्छे नागरिक बनते रहते है..
चुप चाप रहते है
ना दंगा फ़साद करते है..
वरना इतिहास के पन्नो मे..
हम आ जाएँगे..
दहेज के लोभी नही तो
गुंडे कहलाएँगे..

कितने विवश..
कितने दब्बु..
हम हो गये..
हाए...हम
कितने ...
संवेदन-हीन हो गये...!!

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री सोनल रस्तोगी

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

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आज पढिये सुश्री सोनल रस्तोगी की यह रचना.

लेखिका परिचय
नाम-सोनल रस्तोगी
जन्मस्थान -फर्रुखाबाद
शिक्षा - पी.जी ,पत्रकारिता डिप्लोमा
शौक -नाटक,कविता कहानिया पढ़ना और लिखना
सारांश- महादेवी वर्मा की जन्मस्थली में साहित्य प्रेम के कीड़े ने काट खाया, बचपन से पढ़ लिख रहे है,बालसाहित्यकार के तौर पर कुछ रचनाये प्रकाशित.जीवन में computar के प्रवेश ने दिशा बदल दी ...पहले पढ़ा फिर पढ़ाया पिछले ५ सालों से गुडगाँव में इसी की कमाई खा रहे है.



बड़ी दर्द भरी कहानी है हमारी ,ऐसा युद्ध लड़ा है जैसा ..पूछो मत .ताई जी के बेटे की शादी का कार्ड देखकर ..कितने पकवानों के थाल आँखों के सामने घूम गए थे ..आँखे इमरती..तो दिल में रसगुल्ले फूट रहे थे ..कचोरी और आलू की सब्जी की खुशबू तो मनो निगोड़ी नाक को कहा से आने लगी थी ...पिछली बार माठ नहीं चख पाई थी,इस बार तो सारी कसर निकालूंगी , मरे शहर की शादियों में देसी चीज़ों को तरस ही जाओ ..हमें नहीं भाता कांटिनेंटल,
पतिदेव को भी समझा दिया जाने का इरादा बता दिया.. हवाई टिकेट करवाए तो बजट का बाजा बजना ही था ..
नई साड़ी का प्लान छोड़ कर अपनी अलमारी में से कुछ पहने का सोचा ...भाई साब यही तो हो गया लोचा..पता नहीं चोली कुछ छोटी सी लगी सोचा नाप के देखते हैं ..भाई वो तो बिगड़ गई कोहनी पर जा कर अड़ गई ..हमको स्थिति का आभास तो था पर इतने बुरे हालात होंगे इसका अंदाज़ ना था....एक एक करके सब नाप डाले ..पर ....
पतिदेव रात को आये तो बिस्तर पर बिखरे कपडे देख कर घबराए "कोई चोरी हो गई क्या ".
हमने आँखों में आंसू भर कर पूछा आपने बताया क्यों नहीं , वो मुस्कुरा कर बोले

" प्रिये माना तुम कामिनी से गजगामिनी के पथ पर अग्रसर हो
पर मेरे प्रेम को कोई कमी नहीं पाओगी
बहुत बड़ा है दिल मेरा
हर साइज़ में फिट हो जाओगी "

हमने भी मन में ठान लिया बात में छिपे व्यंग को पहचान लिया ,स्लिम्मिंग सेंटर के चक्कर लगा रहे है लौकी पी रहे है लौकी खा रहे है,
अब हम मोह माया से ऊपर उठ गए है ,तुच्छ मिठाई ,भठूरे,पूरी ,टिक्की पाव भाजी सब हमको सिर्फ कैलोरी मात्र नज़र आते है,पर देखते है ये संन्यास हम कबतलक निभाते है,जितनी मंद गति से हमारा वजन घट रहा है उससे १०० गुना तीव्र गति से पतिदेव के बटुए से नोट.
पर ये सब हमारा उत्साह नहीं घटा पायेंगे ..शादी में तो हम वही साडी पहन कर जायेंगे ,जो नई फोटू खिचवायेंगे ब्लॉग पर लगायेंगे ...आप सब को दिखाएँगे

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : कृष्ण कुमार यादव

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री कृष्ण कुमार यादव की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखक परिचय :
नाम : कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
जीवन-वृत्त कृष्ण कुमार यादव
जन्म : 10 अगस्त 1977, तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0)
शिक्षा : एम0 ए0 (राजनीति शास्त्र), इलाहाबाद विश्वविद्यालय
लेखन विधा : कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, व्यंग्य एवं बाल कविताएं।
कृतियाँ : अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट- 150 ग्लोरियस इयर्स (अंगे्रजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ: 1857-1947 की गाथा (2007)।

विशेष : शोधार्थियों हेतु व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ डा0 दुर्गा चरण मिश्र द्वारा संपादित एवं इलाहाबाद से प्रकाशित। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’(सितम्बर 2007) एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ‘गुफ्तगू‘ (मार्च 2008) द्वारा व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित।

प्रकाशन : शताधिक प्रतिष्ठित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। चार दर्जन से अधिक स्तरीय संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन। इण्टरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं-सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, काव्यांजलि, रचनाकार, हिन्दीनेस्ट, स्वर्गविभा, कथाव्यथा, युगमानस, वांग्मय पत्रिका, कलायन, ई-हिन्दी साहित्य इत्यादि में रचनाओं की प्रस्तुति।

प्रसारण आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर से रचनाओं, वार्ता और परिचर्चाओं का प्रसारण।

सम्मान विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र, प्यारे मोहन स्मृति सम्मान, भारती-रत्न, विवेकानन्द सम्मान,महिमा साहित्य भूषण सम्मान, भाषा भारती रत्न एवं महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत।

अभिरूचियाँ रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, नेट-सर्फिंग, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन, सामाजिक व साहित्यिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी, बौद्धिक चर्चाओ में भाग लेना।

सम्प्रति/सम्पर्कः कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101 मो0-09476046232 ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com

ब्लॉग- शब्द सृजन की ओर एवम डाकिया डाक लाया


सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री

मोहन बाबू हमारे पड़ोसी ही नहीं अभिन्न मित्र भी हैं। कहने को तो वे सरकारी विभाग में क्लर्क हैं पर सामान्यता क्लर्क की जो इमेज होती है, उससे काफी अलग हैं.... एकदम ईमानदार टाइप के। कभी-कभी तो महीना खत्म होने से पहले ही उधारी की नौबत आ जाती। उनकी बीबी रोज ताना देती- श्क्या ईमानदारी का अचार डालोगे? अपनेे साथ के लोगों को देखो। हर किसी ने निजी मकान बनवा लिया है, गाड़ी खरीद ली है, बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और तो और उनकी बीबियाँ कितने शानो-शौकत से रहती हंै और एक तुम हो जो साड़ियाँ खरीदने के नाम पर ही तुनक जाते हो। मुझे तो याद भी नहीं कि अन्तिम बार तुमने मुझे कब साड़ी खरीद कर दी थी। वो तो मैं अगर तुम्हारी जेब से रोज कुछ न कुछ गायब न करूँ तो रिश्तेदारी में भी जाना मुश्किल हो जाय।श् इधर मोहन बाबू की बीबी ने एक नई रट लगा रखी थी- मोबाइल फोन खरीदने की।

हुआ यूँ कि पिछले दिनों मोहन बाबू की बीबी अपने मायके गयीं और वहाँ अपनी भाभी के हाथ में मोबाइल फोन देखा। जब तक उनके भैया के पास मोबाइल फोन था, तब तक तो ठीक था पर अब भाभी ही नहीं उनके बच्चों के पास भी मोबाइल फोन है। ऐसा नहीं कि उनके भैया किसी बहुत बड़े पद पर हैं, वरन् पी0 डब्ल्यू0 डी0 मंे एक मामूली क्लर्क हैं। भाभी के मुँह से भैया के रूतबे के किस्से उन्होंने खूब सुन रखे हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे ठेकेदार और नेता उनके सामने पानी भरते हंै। जिस समय मोहन बाबू से उनकी शादी हुयी, उस समय तक भैया को नौकरी नहीं मिली थी, पर नौकरी मिलने के दस साल के अन्दर ही उनके ठाठ-बाट साहबों वाले हो गए। मोहल्ले में अपना रूतबा झाड़ने के लिए उन्होंने एक सेकेण्ड हैण्ड मारूति कार खरीद ली और गेट पर एक झबरे बालों वाला कुत्ता बाँध लिया, जो भाभी की नजर में साहब लोगों की विशिष्ट पहचान होती है। एक बार भाभी के मुँह से कुत्ते के लिए कुत्ता शब्द निकल गया तो भैया झल्ला उठे थे- श्जिन्दगी भर गँवार ही रह जाओगी। अरे! कुत्ता उसे कहते हैं जो सड़कों पर आवारा फिरते हैं। इसे तो टाॅमी कहते हैं।श् फिर क्या था, तब से झबरे बालों वाला कुत्ता टाॅमी हो गया। टाॅमी जितनी बार पड़ोसियों को देखकर भौंकता, भाभी उतनी बार अपने पति की साहबी पर गुमान करतीं।

मोहन बाबू भी दिल से चाहते हैं कि एक मोबाइल फोन उनके पास हो जाय तो काफी सुविधा होगी। लैण्डलाइन फोन में वैसे भी कई समस्यायें आती हैं, मसलन- महीने में दस दिन तो डेड ही पड़ा रहता, उस पर से फोन का बिल इतना आता कि मानो आस-पड़ोस के लोगांे का भी बिल उसमें जोड़ दिया गया हो। फिर फोन का बिल सही करवाने के लिए टेलीफोन-विभाग का चक्कर काटो। एक तो बिना रिश्वत दिए वे बिल ठीक नहीं करते और उस पर से उस दिन के लिए दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ती है।

जब मोहन बाबू ने अपनी बीबी से मोबाइल फोन लेने की चर्चा की तो मानो उनको मुँहमाँगी मुराद मिल गयी हो। एक लम्बे अर्से बाद उस दिन मोहन बाबू की बीबी ने खूब मन से खाना बनाया और प्यार भरे हाथों से उन्हें खिलाया। मोहन बाबू की बीबी उस रात को सपने में देख रही थीं कि उनके घर में भी मोबाइल फोन आ गया है और जैसे ही मोबाइल फोन की घण्टी बजी, उन्होंने पहले से तैयार आरती की थाली को उस पर घुमाया और फिर मोबाइल फोन को स्टाइल में कानों के पास लगाकर बोलीं-हलो! ऊधर से आवाज आयी-कौन बोल रही हैं?.... मैं मिसेज मोहन बोल रही हूँ, किससे बात करनी है आपको? जी, मुझे शर्मिला से बात करनी है.... कौन शर्मिला..... अच्छा तो आवाज बदलकर पूछ रही हो, कौन शर्मिला! मेरी प्यारी बीबी शर्मिला, आई लव यू ..... दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा, दूसरों की बीबी को आई लव यू बोलते हो। अभी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराती हूँ....... साॅरी मैडम! लगता है रांग नम्बर लग गया। सपने के साथ ही मोहन बाबू की बीबी की नींद भी खुल गयी। वे प्रसन्न थीं कि सपने में मोबाइल फोन आया अर्थात घर में मोबाइल फोन आ जाएगा। रांग नम्बर तो आते रहते हैं, उनकी क्या चिन्ता करना।

सुबह होते ही मोहन बाबू को उनकी बीबी ने याद दिलाया कि आज मोबाइल फोन लाना है। आज नहीं, कल लाना है....... पर ऐसा क्यों.... अरे! आज तो मुझे टेलीफोन विभाग के दफ्तर जाकर इस लैण्डलाइन फोन को डिसकनेक्ट करवाने के लिए आवदेन देना होगा। पर मोबाइल का इस लैण्डलाइन फोन से क्या मतलब.... अरे तुम नहीं समझोगी? जब बिल भरना पड़ता तो पता चलता। मेरी अनुपस्थिति में घण्टों बैठकर तुम अपने मायके वालों के साथ गप्पें मारती हो, क्या मुझे नहीं पता है? अब ये लैण्डलाइन फोन कटवा कर मोबाइल फोन खरीदूँगा और उसे हमेशा अपने पास रखूँगा। ..... तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है। लैण्डलाइन फोन कटवाकर मोबाइल फोन खरीदोगे तो लोग सोचेंगे कि मोबाइल फोन खरीदने की औकात नहीं है सो उसे कटवाकर मोबाइल फोन खरीदा है। और फिर मोबाइल फोन अगर तुम अपने पास रखोगे तो मैं अपने मायके वालों से बातें कैसे करूँगी!.... तो फिर अपने मायके वालों को ही बोल दो न कि तुम्हें एक मोबाइल फोन खरीदकर दे दें। हाँ... हाँ... जरूर बोल दूँगी। मेरे मायके में तो सभी के पास मोबाइल फोन हंै, यहाँ तक कि बच्चों के पास भी। पर तुम किस मर्ज की दवा हो...... इतना दहेज देकर मेरे पापा ने इसलिए तुमसे शादी नहीं की, कि शादी के बाद भी मंै उनके सामने हाथ फैलाऊँ। वो तो मेरी गलती थी जो फोटो में तुम्हारे घुँघराले बाल और मासूम चेहरा देखकर रीझ गयी, नहीं तो आज मैं किसी घर में रानी की तरह रह रही होती।

मोहन बाबू की बीबी जब गुस्सा होतीं तो वे शान्तिपूर्वक वहाँ से खिसक लेने में ही भलाई समझते और मुझसे अच्छा उनका मित्र कौन हो सकता है। सुबह-सुबह अपने दरवाजे पर मोहन बाबू को देखकर मैं पूछ उठा- श्अरे मोहन बाबू!सब ठीक तो है। कोई प्राॅब्लम तो नहीं है।श् प्राॅब्लम है, तभी तो आया हूँ आपके पास। अच्छा-अच्छा! पहले आप आराम से बैठकर गर्मा-गर्म चाय और पकौडो़ं का मजा लीजिए और उसके बाद मैं आपकी प्राॅब्लम हल करता हूँ। फिर मोहन बाबू ने चाय व पकौड़ों के साथ टेपरिकार्डर की तरह अपनी सारी प्राॅब्लम मेरे सामने रख दी। चूँंकि मैं मोहन बाबू की ईमानदारी से परिचित हूँ सो उनकी प्राॅब्लम अच्छी तरह समझता हूँ पर उनकी बीबी भी जमाने के हिसाब से गलत नहीं हैं।.... अचानक मेरी निगाह अखबार मे छपे एक विज्ञापन पर पड़ी- श्हमारे मोबाइल फोन खरीदिए और एक साल तक इनकमिंग फ्री पाईये।श् मैंने मोहन बाबू को विज्ञापन दिखाया तो वे काफी खुश हुए और हँसते हुए बोले- श्लगता है इन मोबाइल फोन वालों को मेरे जैसों का भी ख्याल है।श् मैंने उन्हें सलाह देते हुए कहा- श्मोहन बाबू मोबाइल फोन खरीदने के लिए कुछ दिन तक इन्तजार कर लीजिए तो कम्पटीशन में अन्य मोबाइल कम्पनियाँ सम्भवतः और भी आकर्षक प्लान के साथ आयें।श् खैर मोहन बाबू को मेरी बात जँची और अखबार का विज्ञापन वाला पेज उठाते हुए बोले- श्अगर बुरा न मानें तो, ये मैं अपने साथ लेते जाऊँ। आपकी भाभी को दिखाऊँगा तो शायद उसका गुस्सा कुछ ठण्डा हो जाय।श्

मोहन बाबू उस दिन के बाद से रोज सुबह ही सुबह मेरे दरवाजे पर आ टपकते हंै। चाय और पकौडों के साथ अखबार देखते हैं और ऐसे खुश होते हैं मानो भगवान ने उनकी सुन ली हो। पहले एक साल, दो साल, तीन साल, पाँच साल, और फिर आजीवन इनकमिंग फ्री वाले मोबाइल कम्पनियों के विज्ञापन आये पर मोहन बाबू मोबाइल खरीदने के लिए उस दिन का इन्तजार कर रहे हैं जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए ओर अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री पाइये।श् पर अब मंै मोहन बाबू से परेशान हो गया हूँ क्योंकि वे हर सुबह मेरे घर आकर चाय व पकौडों का मजा लेते हैं और फिर विज्ञापन के बहाने पूरा का पूरा अखबार लेकर चले जाते हैं। मुझे तो डर लगता है कि कहीं अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री वाला विज्ञापन किसी मोबाइल कम्पनी ने दे भी दिया तो मोहन बाबू यह न कह उठें कि अब मैं मोबाइल फोन उसी दिन खरीदूँगा जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए और अगले जन्म ही नहीं वरन् सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री पाइये।

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