वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : डा. रूपचंद्र शाश्त्री "मयंक"

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज डा.रुपचंद्र शाश्त्री "मयंक, की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
जन्म- 4 फरवरी, 1951 (नजीबाबाद-उत्तरप्रदेश)
1975 से खटीमा (उत्तराखण्ड) में स्थायी निवास।
राजनीति- काँग्रेस सेवादल से राजनीति में कदम रखा।
केवल काँग्रेस से जुड़ाव रहा और नगर से लेकर
जिला तथा प्रदेश के विभिन्न पदों पर कार्य किया।
शिक्षा
- एम.ए.(हिन्दी-संस्कृत)
तकनीकी शिक्षाः आयुर्वेद स्नातक
सदस्य
- अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,उत्तराखंड सरकार,
(सन् 2005 से 2008 तक)
उच्चारण पत्रिका का सम्पादन
(सन् 1996 से 2004 तक)
साहित्यिक अभिरुचियाँ-
1965 से लिखना प्रारम्भ किया जो आज तक जारी है।
व्यवसाय- समस्त वात-रोगों की आयुर्वेदिक पद्धति से चिकित्सा करता हूँ।
1984 से खटीमा में निजी विद्यालय का संचालक/प्रबन्धक हूँ।
फोन/फैक्स: 05943-250207
मोबाइल: 0936849921, 09997996437, 09456383898 

ए-के सैंतालीस, अस्त्र-शस्त्र, बेकार सभी हो जायेंगे।

अणु और परमाणु-बम्ब भी, सफल नही हो पायेंगे।।

सागर में डुबो फेंक दो अब, तलवार तोप और भालों को।

सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को।।

शासन से कह दो अब, करना सेना का निर्माण नही।

छाँट-छाँट कर वीर-सजीले, भरती करना ज्वान नही।।

फौजों का निर्माण, शान्त उपवन में आग लगा देगा।

उज्जवल धवल पताका में, यह काला दाग लगा देगा।

नही चाहिए युद्ध-भूमि में, कुछ भी सैन्य सामान हमें।

युद्ध-क्षेत्र में, कर्म-क्षेत्र में, करना है आराम हमें।।

शत्रु नही भयभीत कदापि, तोप, टैंक और गोलों से।

इनको भय लगता है केवल, नेताओं के बोलों से।।

रण-भूमि में कुछ कारीगर, मंच बनाने वाले हों।

लाउड-स्पीकर शत्रु के दिल को दहलाने वाले हों।।

सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे।

सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे।

गोलों की गति से जब नेता, भाषण ज्वाला उगलेंगे।

तरस बुढ़ापे पर खाकर, शत्रु के दिल भी पिघलेंगे।।

मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।

भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।

सेना में इन बुड्ढों को, जौहर दिखलाना भायेगा।

युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों का जमाना आयेगा।।




--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
फोनः05943-250207, 09368499921

11 comments:

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

3 April 2010 at 06:53

वाह क्या कविता है!
अमरीका का तो दिवाला निकाल देगी। उन के हथियारों के कारखाने?

  Suman

3 April 2010 at 06:58

nice

  विनोद कुमार पांडेय

3 April 2010 at 07:19

बढ़िया रचना...पर सरकार की समझ में ही नही आ रहा है..वैसे शास्त्री जी रचना पूरी जोश भर देने वाली है केवल बुढ्ढों में ही नही युवको में भी..बधाई हो

  श्यामल सुमन

3 April 2010 at 07:22

रचना के माध्यम से इस "भूतपूर्व युवक" के जो "अभूतपूर्व" जज्बात सामने आये हैं - प्रशंसनीय हैं।

इस अनोखे सम्मान के लिए शास्त्री जी को बधाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

  Udan Tashtari

3 April 2010 at 09:16

बेहतरीन रचना! आनन्द आ गया!

  sangeeta swarup

3 April 2010 at 11:37

बहुत बढ़िया कटाक्ष है..... बेहतरीन रचना

  KK Yadava

3 April 2010 at 18:08

लाजवाब रचना...आनंद आ गया. मयंक जी को बधाई.

  अविनाश वाचस्पति

3 April 2010 at 19:49

खूब कही

वीर धार बही।

  वन्दना

3 April 2010 at 20:28

yahi to shastri ji ki khoobi hai sabmein josh bhar dete hain..........behad sundar kavita.

  पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

3 April 2010 at 22:27

सेना में इन बुड्ढों को, जौहर दिखलाना भायेगा।
युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों का जमाना आयेगा।।

वाह्! शास्त्री जी, क्या धारधार कविता लिखी है..
आनन्द आ गया पढकर...
आभार्!

  M VERMA

16 April 2010 at 17:01

सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे।
सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे।
शास्त्री जी! आपके वस्त्र और टोपी भी ऐसा ही है (क्षमा करें)
बेहतरीन व्यंग्य रचना

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