वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : श्री मनोज कुमार

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री मनोजकुमार की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखक परिचय :-
नाम : मनोज कुमार, जन्म 1962, ग्राम – रेवाड़ी, ज़िला – समस्तीपुर, बिहार शिक्षा – स्नातकोत्तर जन्तुविज्ञान (एमएससी जूऑलजी) पत्र पत्रिकाओं में लेखन, कादम्बिनी, मिलाप, राजस्थान पत्रिका आदि में लेख, कहानी, आकाशवाणी हैदराबाद पर कविताएं प्रकाशित। पेशे से भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय, कार्यरत।
ब्लॉग : http://manojiofs.blogspot.com


बिखरी चीज़ें

वैसे तो प्रायः कम ही होता है, फिर भी कभी-कभार रविवार की सुबह नौ बजे के पहले उठना हुआ तो मुझे सूर्य की किरणें मेरा मुंह चिढ़ाती प्रतीत होती हैं। आज भी ऐसा ही हुआ। चूंकि आज का क्रिकेट मैच साढ़े आठ बजे से ही था इसलिए सुबह ज़ल्दी ही उठना पड़ा। पर पहले ही ओवर में दो विकेट गिर जाने के बाद सूर्य की पीली किरणों की तरह टीवी स्क्रीन पर मचल रहे पीली जर्सी वाले भी मेरा मुंह चिढ़ाते प्रतीत हो रहे थे। मैंने टीवी बन्द कर दिया। तभी मेरी नज़र टीवी पर चढ़ आयी धूल की परतों पर पड़ी। वहीं ड्राइंग रूम की सेंटर टेबल पर मेरा रूमाल पड़ा था। उससे मैंने धूल झाड़ दी। फिर सोचा इस तरह का मैच देखकर दिन-भर कुढ़ते रहने से अच्छा है कि अपने ब्लॉग के लिए “फुर्सत के क्षणों में ...” स्तम्भ के लिए ही कुछ रच डालूं।

प्रति रविवार ऐसा ही होता है जब मैं “फुर्सत के क्षणों में ...” स्तम्भ के लिए क्या लिखूं – क्या रचूं की कोशिश में प्रयास रत होता हूं तो अपने बिस्तर पर डायरियां, फाईलें, पुस्तकें आदि इधर-उधर बिखराकर रखना मेरी पहली पसंद हैं, और मेरी यह पसंद, मेरी श्रीमती जी को बिल्कुल ना-पसंद है। अभी मेरी विचार मंथन की प्रक्रिया शुरु ही हुई थी कि गृहस्वामिनी का चिरपरिचित स्वर सुनाई दिया, “ये रूमाल टीवी पर किसने रख दिया?”
विजेता की मुद्रा मे मैंने जवाब दिया, “मैंने।”
मेरे इस उत्तर पर कुछ भ्रमित और चकित मेरी संगिनी बिगड़ गई और बोलीं, “क्यों?”
मैंने सफाई दी, “अब रूमाल से उस टीवी पर की धूल झाड़ रहा था, वहीं रह गया।”
अब तक मेरी परिणीता के सब्र का बांध टूट चुका था, “तुम कोई चीज़ तरतीब से नहीं रख सकते?”
मैंने क्षमायाचना की मुद्रा अपनाते हुए कहा, “रखा तो है, ... तुम्हें।”

ये तरतीब शब्द बनाने वाले सख़्श पर मुझे परम क्रोध आता है। जब किसी के यहां मैं चीज़ों को तरतीब से रखी देखता हूं, तो मेरा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। उनकी वे सारी चीज़ें हाथ बढ़ा-बढ़ा कर मेरा गला घोंट रहीं होती हैं। और अगर ख़ुदा-न-ख़ास्ता मेरी उत्तमांग भी साथ हुईं तो उनकी नज़रें मुझसे शिकायतें कर रहीं होती हैं, मुझ पर भाले-बरछियां चला रहीं होती हैं।
मुझे वे घर जहां हर चीज़ों के लिए निर्धारित जगह और हर चीज़ें अपनी जगह पर होती हैं बड़ा दमघोटू लगता है। ऐसे घर में पहुंचते ही मुझे पाक़ीज़ा फिल्म का वह डायलॉग “पांव जमीन पर मत रखना मैले हो जाएंगे” स्मरण हो जाता है। ... चीज़ों को हाथ मत लगाना, गंदी हो जाएंगी !!!

अरे ! चीज़ों को बिखराकर रखिए तो पता चलेगा इसमें कितना आनंद है ! जैसै अबोध बच्चा अपना पहला डग भर रहा हो ! जब बच्चा पहला डग भरने की कोशिश करता हुआ कभी इधर, कभी उधर पैर रखता है, तो प्राणेश्वरी, क्या आप उसे डांटती हैं। नहीं न। फिर मुझे क्यों? ये इधर-उधर रखी चीज़ें, भटकती-सी, भूली-सी, चीज़ें कितनी आत्मीयता से आपको ताकती रहती हैं। उन्हें आप उठाकर, उन पर पड़ी धूल-गर्द झाड़ कर, किसी खास जगह पर रख दीजिए, देखिए कितना आनंद मिलेगा, कितना सुकून मिलेगा। पर जो पहले से ही व्यवस्थित ढ़ंग से खड़ी हैं, आंखें फाड़-फाड़ कर घूरती रहती हैं। लगता है घर में आपातकाल आ गया हो। संपूर्ण रूप-से व्यवस्थित घर मुझे कर्फ्यू ग्रस्त जगह की तरह प्रतीत होता है।

अख़बार को ही लीजिए। हॉकर नीचे से ही उसे अपनी पूरी जोर से मेरे तीसरे तले के मकान की बालकनी में फेंक देता है। फिर उस पर घर के सभी सदस्य महाभारत करते हैं, कभी सोफे पर, कभी कुर्सी पर, कभी बिस्तर पर, तो कभी डायनिंग टेवुल पर, फिर भी वह मुस्कुराता नज़र आता है। कभी-कभी तो उधर भी पहुंच जाता है जहां हम नित्य क्रिया करते हैं। और जब मैं रविवार की अलसाई सुबह, जो मेरे लिए प्रायः नौ बजे ही होती है, उसे खोजते-खोजते परेशान-सा किचन की फ्रीज के ऊपर पाता हूं तो मुझे एवरेस्ट चढ़ जाने का चैन मिलता है। अब वही अख़बार अगर ड्राईमरूम की सेंटर टेबुल पर व्यवस्थित पड़ा होता तो पढ़ने का यह मज़ा आता क्या?

मेरे शयन कक्ष का तो जवाब ही नहीं। हर चीज़ किसी उदण्ड बच्चे की तरह पथभ्रष्ट होकर इधर-उधर बिखरी पड़ी होती हैं। उनकी मासूमियत देखने लायक होती है, जैसे भूले-भटके लोग आपस में बतिया रहें हों। हर वस्तु मदमस्त, अल्हड़ता-से, इठलाते, मचलते, हंसते, खेलते, कूदते होते हैं। किसी सैनिक की परेड के कदम-ताल करते सिपाहियों के सावधान की मुद्रा में अनुशासित चीज़ों वाले घर में रहना मुझे बिल्कुल नहीं भाता। इसमें मुझे रैम्प पर की मॉडल के कैटवॉक की सुनियोजित स्टेप्स की तरह की कृत्रिमता झलकती है। मैं जब मेरी बिखरी चीज़ों को देखता हूं तो लगता है, वे किसी छोटे से मंच पर भांगड़ा कर रहें हों। और इस भांगड़े में तो मौज़ा-ही-मौज़ा है....!!!
मनोज

15 comments:

  आलोक सिंह "साहिल"

4 April 2010 at 04:55

आए तो थे ताऊ जी से दुआ सलाम करने...लेकिन मनोज जी आप से मुलाकात हो गई...अच्छी बात य है कि मुलाकात सुखद रही...
आपको पढ़कर मौजा ही मौजा हो गया...

आलोक साहिल

  M VERMA

4 April 2010 at 05:09

वाह क्या कहने! बड़े तरतीब से रखा बेतरतीब से रखी चीजों को.
बहुत खूब

  श्यामल सुमन

4 April 2010 at 07:05

जीने का यह अंदाज भी अनोखा है मनोज भाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

  Suman

4 April 2010 at 07:22

nice

  संजय भास्कर

4 April 2010 at 07:38

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

  ललित शर्मा

4 April 2010 at 08:13

बहुत बढिया आलेख
मनोज जी को बधाई।

संडे स्पेशल

  विनोद कुमार पांडेय

4 April 2010 at 08:18

मौजा ही मौजा ..आज भी रविवार ही है मनोज जी..
एक बढ़िया रचना....शुभकामनाएँ..

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

4 April 2010 at 09:07

मनोज कुमार जी के रोचक लोख को प्रकाशित करने के लिए ताऊ को धन्यवाद!
मनोज कुमार जी को बधाई!

  sangeeta swarup

4 April 2010 at 11:39

बहुत रोचक लेख.....यदि सारी चीज़ें आप ही व्यवस्थित कर देंगे तो श्रीमती जी के प्रेम भरे उलहाने से भी तो वंचित हो जायेंगे.....

जब तक पत्नियों कि सुमधुर कर्कश ध्वनि ना सुन लें तब तक पतियों कि कहाँ होती है मौजा ही मौजा ...:):)

  अविनाश वाचस्पति

4 April 2010 at 20:22

पहले तो मनोज जी आप यह बतलाइये कि मेरे घर कब आये थे, पूरा किस्‍सा मेरे घर का रच डाला है और पुरस्‍कार आप ले उड़ेंगे पर मुझे तो तब भी जचेंगे।

  मनोज कुमार

4 April 2010 at 20:34

मैं तो यहां चर्चा हिन्दी चिट्ठों की के लिंक से पहुंच गया। तो पूरा आलेख इस लिए पढ़ गया कि देखूं तो अविनाश जी का घर कैसा है?!
चलिए जैसा है मेरे ही घर जैसा है!!

  मनोज कुमार

4 April 2010 at 20:42

@ संगीता जी की टिप्प्णी पर कॉलेज के दिनों की एक बात याद आ गई।
कॉलेज के दिनों में प्रायः हर बुरी आदतें लग ही जाती हैं। फिर हम उन्हें धीरे-धीरे छोड़ते हैं एक-एक करके, एक-के-बाद एक। ऐसा ही मेरे साथ हुआ। सारी गंदी आदतें छोड़ता गया। पर सिगरेट पीने की आदत नहीं छोड़ा। तो एक दोस्त ने पूछा, इसे क्यों नहीं छोड़ते। मैंने उसे समझाया, कुछ तो ऐसी आदत होनी चाहिए जिसे देख कर "वो" कहें तुम्हें मेरी क़सम, इसे छोड़ दो। उनके आ जाने से सिग्रेट तो छूट गई पर ये कहां पता था कि बे-तरतीब रहना भी बुरी आदत है, और कमबख़्त सिगरेट और शराब के नशे से भी ख़तरनाक -- छूटती ही नहीं।

  Ram Krishna Gautam

5 April 2010 at 00:47

Behatreen Prastuti Manoj ji... Badhai!!



"RAM"

  सम्वेदना के स्वर

4 September 2010 at 12:41

वाह! बहुत अच्छा लगा पढ़्कर !

इन बिखरी हुई चीज़ों को सजाने और फिर बिखराने में ही तो मकान घर बनता है,शायद!

  प्रेम सरोवर

4 September 2010 at 18:02

Ghar ke andar betartib se aur ghar ke bahar tartib se rahne ka FORMULA Aapnane se aap ki tarah main RELAX mahsoos kaarta hun -koi chij bikhar jati hai to use phir se sajaya ja sakta hai lekin dil ko nahi.lage raho saheb,mujhe asha hai ki blog ki duniya men AAP nayee uchchaiyon ko sparsh karne men avashya safal honge.

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