वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे सुश्री स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज सुश्री स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' की रचना पढिये.

लेखिका परिचय
पूरा नाम : स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'
शिक्षा : विज्ञानं में स्नातकोत्तर (जीव विज्ञान)
एम्.सी.ए (मास्टर इन कम्प्यूटर अप्लिकेशन)
स्थान : कनाडा
शौक़ : संगीत, नाटक, लेखन


दूर के ढोल...

दूर के ढोल सुहावन भैया

दिन रात येही गीत गावें हैं

फोरेन आकर तो भैया

हम बहुत बहुत पछतावे हैं



जब तक अपने देस रहे थे

बिदेस के सपने सजाये थे

जब हिंदी बोले की बारी थी

अंग्रेजी बहुत गिटगिटाये थे

कोई खीर जलेबी अमरती परोसे

तब पिजा हम फरमाए थे

वहाँ टीका सेंदूर, साड़ी छोड़

हरदम स्कर्ट ही भाए थे



वीजा जिस दिन मिला था हमको

कितना हम एंठाए थे

हमरे बाबा संस्कृति की बात किये

तो मोडरनाईजेसन हम बतियाये थे

दोस्त मित्र नाते रिश्ते

सब बधाई देने आये थे

सब कुछ छोड़ कर यहाँ आने को

हम बहुत बहुत हड़ाबड़ाए थे



पहिला धक्का लगा तब हमको

जब बरफ के दर्शन पाए थे

महीनों नौकरी नहीं मिली तो

सपने सारे चरमराये थे

तीस बरस की उम्र हुई थी

वानप्रस्थ हम पाए थे

वीक्स्टार्ट से वीकएंड की

दूरी ही तय कर पाए थे



क्लास वन का पोस्ट तो भैया

हम इंडिया में हथियाए थे

कैनेडियन एक्स्पेरीएंस की खातिर

हम महीनों तक बौराए थे

बात काबिलियत की यहाँ नहीं थी

नेट्वर्किंग ही काम आये थे

कौन हमारा साथ निभाता

हर इंडियन हमसे कतराए थे

लगता था हम कैनेडा नहीं

उनके ही घर रहने आये थे

हजारों इंडियन के बीच में भैया

ख़ुद को अकेला पाए थे



ऊपर वाले की दया से

हैण्ड टू माउथ तक आये हैं

डालर की तो बात ही छोड़ो

सेन्ट भी दाँत से दबाये हैं

मोर्टगेज और बिल की खातिर

ही तो हम कमाए हैं

अरे बड़े बड़े गधों को हम

अपना बॉस बनाये हैं

इनको सहने की हिम्मत

रात दिन ये ही मनाये हैं

ऐसे ही जीवन बीत जायेगा

येही जीवन हम अपनाए हैं



तो दूर के ढोल सुहावन भैया

दिन रात येही गीत गावे हैं

फोरेन आकर तो भैया हम

बहुत बहुत पछतावे हैं

18 comments:

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

5 April 2010 at 06:47

अदा जी की यह बहुत सुन्दर रचना है! यह तो वास्तव में वैशाखनन्दन प्रतियोगिता के काबिल है!

  Ashok Pandey

5 April 2010 at 06:47

''दूर के ढोल सुहावन भैया

दिन रात येही गीत गावें हैं

फोरेन आकर तो भैया

हम बहुत बहुत पछतावे हैं''


बहुत खूब। अदा जी की इस सुंदर रचना को पढ़वाने के लिए आभार।

  Suman

5 April 2010 at 08:07

nice

  खुशदीप सहगल

5 April 2010 at 08:36

सत्य वचन...

भारत से आप किसी को बाहर ले जा सकते हैं लेकिन भारत को किसी के दिल से कभी नहीं निकाल सकते...

प्रविष्टि में सर्वोच्च पुरुस्कारों में से एक झटकने के लिए पूरा दम है...

जय हिंद...

  विनोद कुमार पांडेय

5 April 2010 at 08:49

बढ़िया हास्य रचना..बधाई

  ललित शर्मा

5 April 2010 at 09:13

कौन हमारा साथ निभाता
हर इंडियन हमसे कतराए थे
लगता था हम कैनेडा नहीं
उनके ही घर रहने आये थे
हजारों इंडियन के बीच में भैया
ख़ुद को अकेला पाए थे


बहुत बढिया रचना-आभार

  sangeeta swarup

5 April 2010 at 11:17

बहुत सटीक खाका खींच दिया है विदेशों में रहने वाले भारतियों का....भाष्य रचना में प्रवासी भारतियों का दर्द छिपा हुआ ही...बहुत अच्छी रचना...बधाई

  Shekhar kumawat

5 April 2010 at 12:06

BAHUT ACHI RACHNA HE AAP KI YE DUR KE DOL KINTU AAP VIDESH ME RAHTE HUVE BHI APNI MAATI KI SUGANDH AATI HE AAP KI KAVITAO OR GAZALO ME

SHUBHKAMNAYE


SHKEHAR KUMAWAT

http://kavyawani.blogspot.com/

  Sonal Rastogi

5 April 2010 at 16:32

बेहतरीन रचना ..विदेश जाने की लालसा अवसर मिलने का गर्व और फिर भ्रम का टूटना तीनो बहुत सुन्दर तरीके से लिखा है

  संजय भास्कर

5 April 2010 at 17:47

बहुत खूब। अदा जी की इस सुंदर रचना को पढ़वाने के लिए आभार।

  श्यामल सुमन

5 April 2010 at 18:23

विदेश जाने की ललक - और अपनी माटी छूटने की कसक - एक जद्दोजहद का भाव - सुन्दर प्रवाह।

शुभकामनाएं

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

  rashmi ravija

5 April 2010 at 18:37

बहुत ही सुन्दर व्यंग रचना....दूर के सुहावने ढोल की अच्छी पोल खोली है...बहुत खूब

  मो सम कौन ?

5 April 2010 at 18:45

ताऊ राम राम।
हम तो इतना ही कहेंगे,
"बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर"
स्वप्न मंजूषा शैल अदा।



शानदार रचना।
आभार।

  डॉ टी एस दराल

5 April 2010 at 22:14

वाह , बहुत खूब लिखा है ।
लेकिन एक बार पैर जमा लिए तो फिर पूछियेगा क्या वापस आना चाहेंगे ।
यही तो विडम्बना है।

  अविनाश वाचस्पति

5 April 2010 at 22:18

इसे कहते हैं

हंसाते हंसाते

नीम चटाना।

  Udan Tashtari

6 April 2010 at 00:17

सटीक रचना. अब इसका मर्म हमसे बेहतर कौन समझ सकता है भला जो इसी नांव पर सवार हैं.

  mridula pradhan

6 April 2010 at 22:56

This comment has been removed by the author.
  कमलेश वर्मा

13 April 2010 at 21:35

LOGON KO AAPKI RCHNA KAVITA LAGTI HOGI LEKIN HAI YH ''ADA JI '' AK NASHIHAT UN LOGON KE LIYE JO VIDESH JANE KE LIYE KUCHH KARNE KO MARE JA RAHE HAIN ..BAHUT SUNDER MARMIK VYAKHYA...BADHAYEE...DIDI JI..

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