वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री पदम सिंह

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री प‌द्‌म सिंह की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखक परिचय :-
नाम- प‌द्‌म सिंह
शिक्षा- स्नातक
उम्र- ३७ वर्ष
व्यवसाय- सर्विस विद्युत विभाग
आरंभ-- पता नहीं कैसे कवि हो गया
शौक- थियेटर और नाटकों से जुडाव, संगीत मेर रूचि, बाइक और कार से लॉन्ग ड्राइव का शौक
स्थान- मूलतः इलाहाबाद से हूँ, वर्तमान में गाज़ियाबाद में पिछले दस सालों से
ब्लाग : पद्मावालि


लीजिए रचना प्रस्तुत है ---

मिलन की खुशबुओं को आज भी खोने नहीं देते
वही गंजी है सालों से मगर धोने नहीं देते

हमारे घर के मच्छर भी सनम से कितना मिलते हैं
जो दिन भर भुनभुनाते हैं तो शब सोने नहीं देते (शब=रात)

हवाएं धूप पानी बीज लेकर साथ फिरते हैं
मगर वो खेत वाले ही फसल बोने नहीं देते

अब उनसे हमारा झगड़ा मिटे भी तो भला कैसे
अमन की बात करते हैं मिलन होने नहीं देते

अब अपने दर्द का इज़हार भी कैसे करूँ यारों (इज़हार=अभिव्यक्ति)
वो थप्पड़ मारते भी हैं मगर रोने नहीं देते

न जाने कब गरीबी मुझे साबित करनी पड़ जाए
इसी खातिर तो राशन कार्ड हम खोने नहीं देते

ये पैसा मैल है हाथों का और हम हैं सफाईमंद
तभी रब हाथ मैला हमारा होने नहीं देते

बड़ी मेहनत से करते हैं तरक्की मुल्क की अपने
हुई औलाद दर्जन, मगर 'बस' होने नहीं देते

खसम तो आज हो बैठे हैं कुत्तों से कहीं बद्तर
बंधा रखते हैं थोड़ी हवा भी खाने नहीं देते

मोहोब्बत पाक है अपनी रिन्यू करते हैं रोज़ाना
अकेले ही किसी को खर्च हम ढोने नहीं देते

अजब दस्तूर है इस जहां में इन हुस्न वालों का
किसी को थाल मिलते हैं हमें दोने नहीं देते

हमारी उम्र में अक्सर जवानी कसमसाती है
वो जाना चाहती है और हम जाने नहीं देते


नहीं कर पाए साबित जल के परवाने वफा अपनी
'तवज्जो' शमा कहती है कि परवाने नहीं देते

14 comments:

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

7 April 2010 at 06:30

पद्मसिंह जी को बहुत-बहुत बधाई!

  ललित शर्मा

7 April 2010 at 07:07

अच्छी व्यंग्य रचना।
पदम जी को बधाई

  श्यामल सुमन

7 April 2010 at 08:04

हमारे घर के मच्छर भी सनम से कितना मिलते हैं
जो दिन भर भुनभुनाते हैं तो शब सोने नहीं देते

बहुत खूब पद्म सिंह जी। आपको इस अनोखे सम्मान के लिए आपको बधाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

  विनोद कुमार पांडेय

7 April 2010 at 08:14

वाह पद्दम जी ..खूबसूरत हास्य से सराबोर ग़ज़ल...बहुत बढ़िया लगी..बधाई

  seema gupta

7 April 2010 at 08:30

अब अपने दर्द का इज़हार भी कैसे करूँ यारों (इज़हार=अभिव्यक्ति)
वो थप्पड़ मारते भी हैं मगर रोने नहीं देते

पद्मसिंह जी को बहुत-बहुत बधाई
regards

  BrijmohanShrivastava

7 April 2010 at 13:03

बहुत बढिया रचना पढ्वाई इसलिये आपको धन्यबाद अब इनके ब्लोग पर जाकर कुछ और भी पढ्ते है

  अक्षिता (पाखी)

7 April 2010 at 14:56

बड़े मन से लिखा...सुन्दर है.


-----------------------------------
'पाखी की दुनिया' में जरुर देखें-'पाखी की हैवलॉक द्वीप यात्रा' और हाँ आपके कमेंट के बिना तो मेरी यात्रा अधूरी ही कही जाएगी !!

  Udan Tashtari

7 April 2010 at 20:32

पद्मसिंह जी को बहुत बधाई.

मजेदार रचना!

  sangeeta swarup

7 April 2010 at 23:06

बहुत बढ़िया कटाक्ष....बधाई

  अल्पना वर्मा

10 April 2010 at 16:29

न जाने कब गरीबी मुझे साबित करनी पड़ जाए
इसी खातिर तो राशन कार्ड हम खोने नहीं देते'
-बहुत सही ...
तीखे तेवर हैं आप की रचना में!
-अच्छा लिखते हैं,बधाई!

  AnitaSingh

12 April 2010 at 20:22

बहुत सुन्दर हज़ल .....
ये शेर हासिले गज़ल लगा
नहीं कर पाए साबित जल के परवाने वफा अपनी
'तवज्जो' शमा कहती है कि परवाने नहीं देते

  indu puri

12 April 2010 at 20:30

ये पैसा मैल है हाथों का और हम हैं सफाईमंद
तभी रब हाथ मैला हमारा होने नहीं देते...

अरे बेटा ... इतना हाथ साफ़ रखोगे तो बीवी घर से साफ़ कर देगी.... हा हा हा
बहुत सुन्दर...

  कमलेश वर्मा

8 May 2010 at 21:43

पद्म जी क्या बढिया कविता मे. चुटकियां फेविकोल से चिपकायी है....वाह मजा आ गय..बधाई

  manukavya

14 February 2011 at 01:03

हवाएं धूप पानी बीज लेकर साथ फिरते हैं
मगर वो खेत वाले ही फसल बोने नहीं देते

ये पैसा मैल है हाथों का और हम हैं सफाईमंद
तभी रब हाथ मैला हमारा होने नहीं देते

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं...इन पंक्तियों में भाव और भाषा और तरन्नुम सभी एक से बढ़ कर एक हैं..

Followers