वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री रविकांत पांडेय

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री रविकांत पांडेय की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखक परिचय :-
परिचय तो बस इतना है कि एक मुसाफ़िर जो खुद अपनी तलाश में है। फिलहाल आई. आई. टी. कानपुर में शोधरत। शेष कविवर प्रसाद के शब्दों में-

’छोटे से अपने जीवन की क्या बड़ी कथायें आज कहूं
क्या ये अच्छा नहीं, औरों की सुनता मैं मौन रहूं"


लैला-मजनूं जैसा गहरा आपस का याराना है
चोर पुलिस के प्यार का किस्सा सालों-साल पुराना है

लाश के टुकड़े करके बोटी बेच रहे धनवान मगर
कानूनों का काम गरीबों की गर्दन नपवाना है

आंखें खंजन चाल हिरण-सी बोली है कोयल जैसी
एक शब्द में कहूं अगर तो वो इक चिड़ियाखाना है

सब गुण आगर श्रेष्ठ मनुज का पाता है सम्मान वही
जो बहरा गूंगा लंगड़ा और एक आंख से काना है

भारत-पाकिस्तान सरीखा टूट गया वो टुकड़ों में
घर-बाहरवाली के चक्कर का इतना अफसाना है

बिना पैरवी और पैसों के अस्पताल तुम आये क्यों
डाक्टर है यमराज का भाई व्यर्थ उसे समझाना है

मेरी फ़कीरी पर हंसते हो तुम भी इतना याद रखो
धन-दौलत कुछ काम न देगा सबको इक दिन जाना है

-रविकांत पांडेय

10 comments:

  Udan Tashtari

9 April 2010 at 04:55

आंखें खंजन चाल हिरण-सी बोली है कोयल जैसी
एक शब्द में कहूं अगर तो वो इक चिड़ियाखाना है

-वाह!! रविकान्त जी को यहाँ देखकर और उनकी रचना बांच कर आनन्द आ गया.

  संजय भास्कर

9 April 2010 at 05:44

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

  Suman

9 April 2010 at 06:10

nice

  sangeeta swarup

9 April 2010 at 08:09

सब गुण आगर श्रेष्ठ मनुज का पाता है सम्मान वही
जो बहरा गूंगा लंगड़ा और एक आंख से काना है

बहुत सटीक बात...कत्क्ष करती बढ़िया गज़ल

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

9 April 2010 at 15:58

रविकान्त पाण्डेय जी को बधाई!

  M VERMA

9 April 2010 at 20:28

भारत-पाकिस्तान सरीखा टूट गया वो टुकड़ों में
घर-बाहरवाली के चक्कर का इतना अफसाना है
हश्र तो यही होना था
सुन्दर रचना

  विनोद कुमार पांडेय

9 April 2010 at 20:49

Ravikaant ji sachchai kavita hi nahi ek sachchaai bhi hai aapki yah rachana....badhai swikaare..

  अभिलाषा

10 April 2010 at 01:12

खूबसूरत प्रस्तुति...आपका ब्लॉग बेहतरीन है..शुभकामनायें.


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'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर हम प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटे रचनाओं को प्रस्तुत करने जा रहे हैं. यदि आप भी इसमें भागीदारी चाहते हैं तो अपनी 2 मौलिक रचनाएँ, जीवन वृत्त, फोटोग्राफ hindi.literature@yahoo.com पर मेल कर सकते हैं. रचनाएँ व जीवन वृत्त यूनिकोड फॉण्ट में ही हों.

  अल्पना वर्मा

10 April 2010 at 16:27

आंखें खंजन चाल हिरण-सी बोली है कोयल जैसी
एक शब्द में कहूं अगर तो वो इक चिड़ियाखाना है.

बहुत बढ़िया!
पहली बार आप को पढ़ा.
अच्छा लिखते हैं आप.

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

15 April 2010 at 07:32

Excellent! आनन्द आ गया!

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