वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री रश्मि रविजा

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिताके लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज सुश्री रश्मि रविजा की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखिका परिचय :-

नाम-- रश्मि रविजा

परिचय : राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर .विभिन्न पत्रिकाओं और अखबारों में आलेख प्रकाशित. मुंबई आकाशवाणी से कहानियों एवं वार्त्ताओं का नियमित प्रसारण .

ब्लॉग : अपनी, उनकी, सबकी बातें
मन का पाखी



आलेख --- ये, बेचारे आज के पति

पुरुषों के लिए, नौकरी मिलने से पति बनने तक के बीच के दिन बड़े सुनहरे होते हैं और फिर कभी लौट कर नहीं आते. सैकड़ों फोटो देखी जाती हैं,दावतें उडाई जाती हैं और चुन कर सुन्दर,स्मार्ट, पढ़ी लिखी लड़की शादी कर घर लाई जाती है .और बस उसके बाद , आँखों पर पड़ा रंगीन पर्दा हट जाता है और खुरदरी, यथार्थ की जमीन नज़र आने लगती है.

सुबह होती है,पति अखबार और चाय की तलाश में कमरे से बाहर आता है,देखता है ,पत्नी सामने टेबल पर पैर फैलाए,अखबार में नज़रें गडाए बैठी है. कोई सप्लीमेंट उठा चाय का आग्रह करता है,अब या तो वह इंतज़ार करे या खुद बना ले क्यूंकि पत्नी तो आर्टिकल पूरा कर के ही उठेगी.और नज़रों के सामने घूम जाता है,माँ का चेहरा,जिनके कान पिताजी के उठने की आहट पर ही लगे होते थे.बच्चों को सुबह से ही डांट पड़नी शुरू हो जाती थी,अख़बार इधर उधर मत रख दो,पापा को चाहिए होगी. और पापा फ्रेश होकर आए नहीं कि चाय और अखबार एक मुस्कान के साथ हाज़िर .बस साथ में एक ताजे फूलों के गुलदस्ते की कमी रहती.वरना पूरा होटल सर्विस ही लगता था.

पापा ने अखबार पढ़ते पढ़ते ही आवाज़ लगाई,जरा शेव का सामान और पानी दे जाना .और माँ नौकर के हाथों,बच्चों के हाथों या फिर खुद ही लिए हाज़िर हो जातीं.यहाँ एक तो बाथरूम में खड़े होकर शेव करो और अगर गलती से कह दिया,शेविंग क्रीम या आफ्टर शेव ख़त्म हो गया है तो तुरंत सुनने को मिल जायेगा, "अब इतना तो अपनी चीज़ों का ख़याल रख ही सकते हो" या "फ्रिज पर जो कागज़ चिपका है उसपर लिख दो, माँगा दूंगी" .अब पति बाथरूम से उसी अवस्था में निकल कर जाकर लिख आए या फिर वैसे ही काम चलाता रहें.

पापा नहा कर निकलते थे और उनकी कमीज़, पैंट, रूमाल निकाल कर रखी होती थी. आजकल अपनी अलग आलमारी होने से यह काम भी खुद ही करना होता है. एक दिन हलके हरे रंग की शर्ट में देख,कलीग मिस गुप्ता ने काम्प्लीमेंट दे दिया था,"यह रंग आपको बहुत सूट करता है " पति पूरा बाज़ार छान उस रंग की टीशर्ट खरीद कर लाता है. और खुश खुश अपना आलमीरा खोलता है...आज तो शनिवार है,टीशर्ट पहन सकता है और किसी बहाने मिस गुप्ता के टेबल के पास से गुजरने के मंसूबे भी बना रहा है.पर टीशर्ट तो मिल ही नहीं रही .पूछने पर पत्नी कहती है...'हाँ वो मैंने अपने लिए रख ली ,,इतना फेमिनिन कलर तुम पर अच्छा नहीं लगेगा."
"पर वो तो तुम्हे काफी लूज़ होगा "...पति एक क्षीण आशा रखता है,टीशर्ट की आलमारी में पुनः वापसी की .पर सुनना को मिलता है.,
"'ना, अब शादी के बाद काफी पुट ऑन कर लिया है..." पति सोचता रह जाता है..उसे तो हर बार यही कहना पड़ता है, 'इस ड्रेस में बड़ी स्लिम लग रही हो'. पर जब उसकी टीशर्ट मारने की बारी आई तो खुद ही सच्चाई मान ली.

खाने के टेबल पर भी पापा की थाली,नज़र के सामने आ जाती है.इतनी सारी कटोरियाँ होती थीं. मसाले तेल से भरपूर,कितने स्वाद वाली.उसपर माँ , सैकड़ों काम छोड़ पंखा झले ना झलें (वो शायद दादी झलती होंगी) पास जरूर बैठी होती थीं. और थाली पर ध्यान जरूर रखती थीं,ये तो खाया ही नहीं, ये तो छूट ही गया, ये और चाहिए?. यहाँ अगर पति कह दे,खाना कितना ब्लैंड है, नमक मिर्च का पता नहीं,पत्नी का रेडीमेड जबाब होता है, इतनी सीडेन्ट्री लाइफ स्टाइल है.वाक पे जाते नहीं,एक्सरसाइज़ करते नहीं.कम से कम खाना तो परहेजी खाया करो.

यहाँ अगर पत्नी गृहणी है तो टेबल पर खाना लगा, घर के बचे कामो में उलझी होगी क्यूंकि इसके बाद का समय उसका अपना है, टी.वी. देखे,फ़ोन पर गप्पे मारे,शॉपिंग करे या फिर नेट पर जाए .पर उस समय में कोई कटौती नहीं होगी.और अगर पत्नी नौकरी पर जाती है तब तो सौ हिदायतें और मिल जाएँगी.कैसरोल का ढक्कन बंद करना मत भूलना,सब्जी फ्रिज में रख देना, और दूध ठंढी हो जाए तो वो भी फ्रिज में रख देना और हाँ,पानी पीकर खाली बोतल वापस फ्रिज में मत रखना,भरी हुई बोतल ,उठाकर रख देना.और पति एक एक कर सारी हिदायतें याद करता रहता है.

शादी के पहले ऑफिस जाते समय पत्नी को बाय करने के अलग अलग अंदाज़ के सपने देख रखे थे.पर वे सपने ही क्या जो पूरे हो जाएँ. गृहणी है तो उसके सौ काम राह देख रहें होंगे और अब ऑटोमेटिक दरवाजे ने दरवाजा बंद करने की जहमत से भी मुक्ति दे दी कि दरवाजा बंद करने के बहाने ही पत्नी,दरवाजे तक छोड़ने तो आए.
अगर नौकरी वाली हो तो पति भले ही बाय कहने की राह देखता रहें .पर पत्नी सैंडल,पर्स,मोबाइल,गौगल्स में ही उलझी होती है,किस हाथ में क्या क्या और कैसे संभाले.

पति का पुराना मित्र उसके शहर आया है.पति उसे गर्मजोशी से कहता है, "ऑफिस के बाद तुम्हे पिक करता हूँ और फिर सारा शहर घुमाता हूँ". मन ही मन खुश हो रहा है, मित्र कॉम्पिटिशन में निकल तुरंत अच्छी सरकारी नौकरी में लग गया तो क्या,उसके पास तो सरकारी जीप ही है,ना. उसे काफी संघर्ष करना पड़ा पर अब तो अपनी होंडा सिटी,उसकी ए.सी. की जबरदस्त कूलिंग,उसका स्टीरियो,आरामदायक सीट सब दिखायेगा मित्र को. पर निकलते समय पत्नी कहती है, आज कार छोड़ ऑटो या टैक्सी से चले जाओ,मुझे कार चाहिए, आज सहेलियों के साथ लंच है.
"तुम ऑटो से चली जाओ मुझे अपने फ्रेंड को घुमाना है"
"कैसी बातें करते हो,ऑटो या टैक्सी में बालों का क्या हाल होता है,पता भी है.तुम ही आज चले जाओ टैक्सी या ऑटो से,तुम्हे क्या फर्क पड़ेगा, वैसे भी बाल ही कितने बचे है." और पति सब भूल, आईना में अपने बाल निहारने लगता है,हेयर थेरेपी ले ही ली जाए क्या??. एक ख्याल पत्नी को एक दूसरी गाड़ी खरीद कर देने का भी होता है,नैनो ही सही.पर पार्किंग की विकराल समस्या मुहँ बाए खड़ी होती है. बिल्डिंग वालों से झगडा मोल लेने से तो अच्छा है,मित्र को टैक्सी में ही घुमा दिया जाए.

ऑफिस जा कर भी चैन नहीं अगर दिन में तीन बार फोन नहीं किया तो उलाहने सुनने को मिलेंगे, सुबह से सर में दर्द था,एक बार हाल भी नहीं पूछा, या बेटे/बेटी का रिज़ल्ट नहीं पूछा, बेटे/बेटी के हॉकी/फूटबाल के मैच का हाल नहीं पूछा. यह टेलीफोन ईजाद ही क्यूँ हुआ.और ईजाद हुआ भी तो इतना आम क्यूँ हुआ? पिताजी को तो ये समस्याएं नहीं आयीं कभीं.

रात में पिता हमेशा समाचार सुनते या देखते हुए खाना खाते थे. पर यहाँ तो टेबल पर खाना लगा, टी.वी.पर फैशन शो की झलकी आने ही वाली है कि पत्नीश्री रिमोट का बटन दबा देती हैं और किसी उद्घोषक की तरह अनाउंस करती हैं. "डिनर टाइम-- नो टी.वी." अब पति अगर चुपचाप खाए तो उलाहना मिलेगा सिर्फ इसी समय तो सारे परिवारजन एक साथ बैठते हैं, दिनभर की गतिविधियों पर बातचीत होनी चाहिए,अगर बातों में उलझा रहें तो सुनेगा, इतनी मेहनत से "पनीर पसंदा" बनाया है और तुम्हारा ध्यान भी नहीं. पति का मन होता है, कहे, " किसने कहा इस एक्सपेरिमेंट के लिए? उसे तो पर्मप्रिक आलू गोभी ही पसंद है."और अब वह सोच सोच के बच्चों से सवाल पूछता रहता है,वरना चुप हुआ कि सुनने को मिलेगा, अमुक के पति ने डायमंड रिंग गिफ्ट किया एनिवर्सरी पे,अमुक सिंगापूर जा रहें हैं वेकेशन में ,अमुक ने इम्पोर्टेड कार ली है. और तुर्रा ये कि ये सब शिकायत नहीं बस सूचना है.

बच्चों के बर्थडे पार्टी में हाजिरी जरूरी है,वरना नकारा बाप होने के तमगे से नवाज़ दिया जायेगा. पर अपने घर की पार्टी में ही बिन बुलाये मेहमान सा डोलना पड़ता है,ना तो बच्चों के दोस्त , उसे पहचानते हैं. ना ही बच्चों को खिलाये जाने वाले तरह तरह के गेम्स की कोई जानकारी है उसे. पत्नी कैमरा थमा देती है. पर बाद में फोटो में भी हज़ार मीनमेख एक भी फोटो सही नहीं है. पर फोटो ली कैसे जाए,बच्चे स्थिर रहते हैं क्या, एक मिनट भी?.याद आता है,पापा के हाथों में कैमरा देखते ही वे सब कैसे फ्रीज़ हो जाते थे,सांस लेना नहीं भूलते थे यही क्या कम है.

पति सोचता है,चलो घर के अंदर ये हाल हैं,ऑफिस की पार्टी में तो उसकी इतनी सुन्दर स्मार्ट,वाक्पटु बीवी को देख सब जल कर राख हो जाएंगे.पर पता चलता है, यह जलने की प्रक्रिया उसके हिस्से ही आती है. उसके सारे कलीग्स यहाँ तक कि बॉस भी उसकी पत्नी का अटेंशन पाने को आतुर हैं .वह तो बिलकुल साइड लाइन कर दिया गया है.

उसकी माँ आनेवाली है,खुश होता है,चलो अब थोड़ा माँ शायद बहू की आलोचना करे तो उसे संतुष्टि होगी. पर माँ पर तो आदर्श सास बनने का भूत सवार है. बहू की तारीफ़ करती नहीं अघाती. "बहू घर का,बच्चों का पूरा ख्याल रखती हैं यहाँ तक कि हमें भी गाड़ी में बिठा शहर घुमा आती है.बेटे को तो फुर्सत ही नहीं." जाते वक़्त पत्नी उन्हें डेढ़ हज़ार की साड़ी गिफ्ट कर के उसकी सारी उम्मीद ही खतम कर देती है मन होता है कहे, माँ मैं तीन हज़ार की साड़ी ला दूंगा,तुम एक बार पारंपरिक सास बन, बहू को सता कर तो देखो.

और बेचारा पति उफ्फ्फ भी नहीं कर सकता. वरना उसके उदार विचारों वाले, स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधर, नारी का सम्मान करने वाले इमेज को जबरदस्त ठेस पहुंचेगी

सोचता है, काश वह किसी गाँव की गोरी को शादी कर ले आता.जिसकी सारी दुनिया बस ,वह ही होता.उसे किसी के स्वामी बनने के अहम् को कुछ तो संतुष्टि मिलती .

36 comments:

  वाणी गीत

13 April 2010 at 05:57

क्या बात है आज तो रश्मि ने भी आजकल के पतियों पर लिख दिया है ...
बहुत बधाई ...!!

  Suman

13 April 2010 at 06:01

nice

  'अदा'

13 April 2010 at 06:23

रश्मि को ढेर सारी बधाई...
और तस्वीर तो बहुत ही सुन्दर लगी है मुझे...
सच्ची..!

  संजय भास्कर

13 April 2010 at 06:37

बहुत खूब, लाजबाब !

  खुशदीप सहगल

13 April 2010 at 06:49

सत्यवादिता की शब्द-शब्द में दुहाई देता ये लेख इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज़ किया जाएगा...

सोच रहा हूं अखिल भारतीय पति महासभा की ओर से रश्मि बहना का सम्मान कराया जाए...

जय हिंद...

  Udan Tashtari

13 April 2010 at 06:59

बेचारा पति...हा हा!! बहुत बेहतरीन रचना!! बधाई रश्मि जी को वैशाखनंदन समारोह में सम्मलित होने का.

  अविनाश वाचस्पति

13 April 2010 at 07:11

सुनने में यह भी आया है कि इस पर फिल्‍म की कास्टिंग चल रही है। इसमें हिट होने की संभावना देखते हुए फाइनेंसर करोड़ों रूपये लेकर लेखिका से संपर्क साधने के प्रयास में हैं, परन्‍तु मोबाइल है कि मिलता ही नहीं। विभिन्‍न ब्‍लॉगों पर विज्ञापन दिए गए हैं और अनेक तकनीकी और गैर तकनीकी लोगों की तलाश की जा रही है और आवेदन मांगे गए हैं। पतियों ने इस संबंध में एक यूनियन बनाने का भी ऐलान कर दिया है।

  mukti

13 April 2010 at 07:26

हा हा हा हा!!! क्या व्यंग्य है. बेचारे पति. लेकिन, सोचिये तो पत्नियाँ ये सब सदियों से झेलती आ रही हैं और आज जब पतियों को झेलना पड़ रहा है, तो ये व्यंग्य हो गया. अभी क्या ? हमारे बाद वाली पीढ़ी और जाने क्या-क्या करवायेगी? और इन्हें करना पड़ेगा. लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है, शादी के लिये लड़की ही नहीं मिलेगी, तो झक मारकर इन्हें सारे नखरे उठाने पड़ेंगे.

  Kulwant Happy

13 April 2010 at 08:19

विषय बेहद अच्छा........

  शरद कोकास

13 April 2010 at 08:41

गज़ब का ऑब्ज़रवेशन है भाई. ..हर नौकरीपेशा मध्यवर्गीय पति यह समझेगा कि उसकी ही कथा लिखी जा रही है..... आखिर वैशाख़नन्दन तो वही बनता है ..बेचारा ।

  seema gupta

13 April 2010 at 08:51

रश्मि जी की हार्दिक बधाई...सुन्दर व्यंग्य

regards

  sangeeta swarup

13 April 2010 at 09:36

आज तो रश्मि ने उलटी गंगा बहा दी है....वैसे ये नजरिया भी होना चाहिए....आज कल के पतियों को बहुत सुकून मिला होगा...रश्मि को बधाई पति की पीड़ा को उजागर करने के लिए....सार्थक और सटीक लेख....:):)

अच्छा लगा...

  विनोद कुमार पांडेय

13 April 2010 at 09:54

सपनों में खो जाने वाले कई नौजवान लोगों के दिल की बात कह गई आप तो और वो भी बेहतरीन मजेदार अंदाज में..
बहुत बढ़िया रचना....बढ़िया लगी....रश्मि जी बहुत बहुत बधाई..

  रेखा श्रीवास्तव

13 April 2010 at 10:31

ये माँ और अपने ज़माने की तस्वीर बहुत सुंदर ढंग से खींची है, है तो वही सब कुछ हो हम देख रहे हैं या फिर कर रहे हैं , वैसे मैं इस श्रेणी में नहीं आती हूँ, क्योंकि माँ वाला न सही लेकिन उसके बाद वाले ज़माने की हूँ, इस लिए संतुलन चल रहा है. पर जो तस्वीर है एकदम यथार्थ है. आखिर उसको पेश किसने किया है?तूलिका और कलम दोनों में महारत हासिल करने वाली हस्ती ने.

  रेखा श्रीवास्तव

13 April 2010 at 10:32

ये माँ और अपने ज़माने की तस्वीर बहुत सुंदर ढंग से खींची है, है तो वही सब कुछ हो हम देख रहे हैं या फिर कर रहे हैं , वैसे मैं इस श्रेणी में नहीं आती हूँ, क्योंकि माँ वाला न सही लेकिन उसके बाद वाले ज़माने की हूँ, इस लिए संतुलन चल रहा है. पर जो तस्वीर है एकदम यथार्थ है. आखिर उसको पेश किसने किया है?तूलिका और कलम दोनों में महारत हासिल करने वाली हस्ती ने.

  रेखा श्रीवास्तव

13 April 2010 at 10:42

ये माँ और अपने ज़माने की तस्वीर बहुत सुंदर ढंग से खींची है, है तो वही सब कुछ हो हम देख रहे हैं या फिर कर रहे हैं , वैसे मैं इस श्रेणी में नहीं आती हूँ, क्योंकि माँ वाला न सही लेकिन उसके बाद वाले ज़माने की हूँ, इस लिए संतुलन चल रहा है. पर जो तस्वीर है एकदम यथार्थ है. आखिर उसको पेश किसने किया है? तूलिका और कलम दोनों में महारत हासिल करने वाली हस्ती ने.

  वाणी गीत

13 April 2010 at 11:12

अब जाकर ठीक से पढ़ा है ...ये वाली पति तो सचमुच ही सहानुभूति के पात्र हैं ...बेचारे ...
साहब को दिखाना पड़ेगा ये लेख ...:):)

  rashmi ravija

13 April 2010 at 11:36

Thank god...मेरी सहेलियां नाराज़ नहीं हैं मुझसे और उन्होंने सही स्पिरिट में लिया है...:)
और पुरुषों का क्या, उन्हें तो अच्छा ही लगेगा...वैसे शुक्रिया सबका...

  शेफाली पाण्डे

13 April 2010 at 12:10

bahut badhiya vyangya....badhai rashmi

  Vijay Kumar Sappatti

13 April 2010 at 13:01

aaaaaaaaaaaaaaaah rashmi ji .......ye mere dil ka haal hai ......................ya saare hi patiyo ka hai ....kamal likha hai ji ....aapki shaili ka jawaab nahi .... hmmm ....ab jyaada kuch kahne ka nahi ,balki koi to hai jo hum patiyo ke baare me sochta hai ...isi baat par aapko " patni pidit patiyo " ki mahasabha ka adhyakch banane ki iccha rakhta hoon...

hahaha .. well written rashmi ..kudos...

aabhar

vijay
- pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

  aarkay

13 April 2010 at 13:14

रश्मि जी आप ही बताएं कि सशक्ति करण किसका आवश्यक है ? पुरुष का या स्त्री का !
सुंदर लेख के लिए बहुत बहुत बधाई

  डाकिया बाबू

13 April 2010 at 13:29

खूब रही ये तो...उम्दा !!

  anjana

13 April 2010 at 14:07

बहुत खूब,सुन्दर व्यंग्य ...

  मनोज कुमार

13 April 2010 at 15:03

बेहतरीन!

  Sonal Rastogi

13 April 2010 at 16:19

बहुत खूब दिल खुश कर दिया keyboard तोड़ कर लिखा है, आज की नारी सब पर भारी

  arun pandey

13 April 2010 at 18:05

हा हा हा हा मजा आ गया ,कमाल तो यह है कि यह कोई लेखक नहीं बल्कि
एक लेखिका कि प्रस्तुति है , अगर मई इसे अनुभव के आधार पर प्रस्तुति
समझूँ ,शायद अतिश्योक्ति है ?
हा हा हा सच कहूँ तो इतना मजेदार लगा कि शब्दों में व्यक्त करना कम से कम
मेरे लिए तो मुश्किल है ,
वेचारे पति है कि ऐसा सेवक जो खुद खर्च कर सेवा में लगे हुए है ,
क्या २ सपने पाले रहते है करीब २ सभी भावी पति ,लेकिन सौभाग्य है ऐसे पतिदेव
का जिन्हें इतनी सुशिल , मोडर्न ,स्मार्ट पत्नी नसीब होती है ,
वेचारा थक हारकर अपनी ही तुष्टि के लिए तरस रहा है ,माँ भी बहु कि ही तारीफ
ओह्ह्ह , अब ये पतिदेव कि व्यथा पर तो मुझे जब हंसने से फुर्सत मिले तभी कुछ व्यक्त कर पाऊ.
लेकिन एक रोचक बात मेरे दिमाग में हडकंप मचाये हुए है कि लेखिका को इतनी सटीक अनुभव कैसे प्राप्त हुआ जी ,
यह सिर्फ कहानी तो लगता नहीं , हा हा हा हा
इतनी खुबसूरत और रोचक प्रस्तुति के लिए बहुत-२ धन्यवाद
साथ ही यह उम्मीद करूँगा कि समय-२ पर ऐसी प्रस्तुति जरुर हो कि पढ़कर ताजगी आ जाये .

  arun pandey

13 April 2010 at 18:08

This comment has been removed by the author.
  अनामिका की सदाये......

13 April 2010 at 19:08

chalo aur kuchh nahi to aaj purusho (patiyo) ki balle balle ho gayi aur kuware bhi saawdhan ho jaye....(ha.ha.ha.) bahut badhiya prastuti...aur kuchh to sacchayi he hi.

  प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी)

13 April 2010 at 20:38

kyaa baat hai rshami ji ab to shaadi ka irada hi tyagna padega
hahahahhahahah
saadar
praveen pathik 3
9971969084

  अजय कुमार झा

13 April 2010 at 21:29

हा हा हा हा हा हा

बताईये इसके बाद भी सब कह रहे हैं कि शचि आई एम स्टिल वेटिंग फ़ौर यू .......एक बार शादी होने दीजीए फ़िर शचि के पति देव की भी यही हालत होगी ....सच्ची मुच्ची जी । अब इसे दोबारा पढने जा रहा हूं अबकि बार ......मिलान करो ......करके देखता हूं ..कितने प्वाईंट्स मिलते हैं ...बहुत खूब रश्मि जी ..और हां फ़ोटो ये वाली सबसे बेहतरीन है आपकी अब तक की ..हम भी अदा जी के पीछे पीछे हैं जी

  कमलेश वर्मा

13 April 2010 at 21:40

UTTAM...!!!

  वन्दना अवस्थी दुबे

14 April 2010 at 00:02

हर जगह लेट पहुंचती हूं :( अब जब इतनी तारीफ़ें मिल गईं हैं, तब हम क्या कहने आये हैं? यही न, कि आप तो व्यंग्य की विधा में भी पारंगत हैं. निरन्तरता बनाये रखें, व्यंग्य लेखन में भी. बहुत-बहुत बधाई.

  Vivek Rastogi

14 April 2010 at 19:35

आज पढ़ पायें हैं यह पोस्ट जबरदस्त लिखा है, बहुत कुछ याद हो आया, और बहुत से प्रश्न जेहन में कौंध रहे हैं, कि क्या से क्या हो गया :(

बेहतरीन विषय

  Deepak Shukla

14 April 2010 at 19:42

Hi..
Patni peedit pation ki jo vytha katha batlayi hai..
Dil se aah si nikli hai par, hansi labon par aayi hai..

Wah ji, sach main kabhi dil main awashya aata hai..ki humne bhi us jamane main janm liya hota..paaon dharmpatni se dabwaate aur Vahida Rahman aur Asha Parekh ko dekh sard aahen bharte..

Haha..
DEEPAK..

  Deepak Shukla

14 April 2010 at 19:43

Hi..
Patni peedit pation ki jo vytha katha batlayi hai..
Dil se aah si nikli hai par, hansi labon par aayi hai..

Wah ji, sach main kabhi dil main awashya aata hai..ki humne bhi us jamane main janm liya hota..paaon dharmpatni se dabwaate aur Vahida Rahman aur Asha Parekh ko dekh sard aahen bharte..

Haha..
DEEPAK..

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

15 April 2010 at 07:30

बहुत खूब!
बेचारा आधुनिक पति... बहुत नाइंसाफी है.

Followers