वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : कृष्ण कुमार यादव

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री कृष्ण कुमार यादव की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखक परिचय :
नाम : कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
जीवन-वृत्त कृष्ण कुमार यादव
जन्म : 10 अगस्त 1977, तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0)
शिक्षा : एम0 ए0 (राजनीति शास्त्र), इलाहाबाद विश्वविद्यालय
लेखन विधा : कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, व्यंग्य एवं बाल कविताएं।
कृतियाँ : अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट- 150 ग्लोरियस इयर्स (अंगे्रजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ: 1857-1947 की गाथा (2007)।

विशेष : शोधार्थियों हेतु व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ डा0 दुर्गा चरण मिश्र द्वारा संपादित एवं इलाहाबाद से प्रकाशित। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’(सितम्बर 2007) एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ‘गुफ्तगू‘ (मार्च 2008) द्वारा व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित।

प्रकाशन : शताधिक प्रतिष्ठित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। चार दर्जन से अधिक स्तरीय संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन। इण्टरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं-सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, काव्यांजलि, रचनाकार, हिन्दीनेस्ट, स्वर्गविभा, कथाव्यथा, युगमानस, वांग्मय पत्रिका, कलायन, ई-हिन्दी साहित्य इत्यादि में रचनाओं की प्रस्तुति।

प्रसारण आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर से रचनाओं, वार्ता और परिचर्चाओं का प्रसारण।

सम्मान विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र, प्यारे मोहन स्मृति सम्मान, भारती-रत्न, विवेकानन्द सम्मान,महिमा साहित्य भूषण सम्मान, भाषा भारती रत्न एवं महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत।

अभिरूचियाँ रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, नेट-सर्फिंग, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन, सामाजिक व साहित्यिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी, बौद्धिक चर्चाओ में भाग लेना।

सम्प्रति/सम्पर्कः कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101 मो0-09476046232 ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com

ब्लॉग- शब्द सृजन की ओर एवम डाकिया डाक लाया


सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री

मोहन बाबू हमारे पड़ोसी ही नहीं अभिन्न मित्र भी हैं। कहने को तो वे सरकारी विभाग में क्लर्क हैं पर सामान्यता क्लर्क की जो इमेज होती है, उससे काफी अलग हैं.... एकदम ईमानदार टाइप के। कभी-कभी तो महीना खत्म होने से पहले ही उधारी की नौबत आ जाती। उनकी बीबी रोज ताना देती- श्क्या ईमानदारी का अचार डालोगे? अपनेे साथ के लोगों को देखो। हर किसी ने निजी मकान बनवा लिया है, गाड़ी खरीद ली है, बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और तो और उनकी बीबियाँ कितने शानो-शौकत से रहती हंै और एक तुम हो जो साड़ियाँ खरीदने के नाम पर ही तुनक जाते हो। मुझे तो याद भी नहीं कि अन्तिम बार तुमने मुझे कब साड़ी खरीद कर दी थी। वो तो मैं अगर तुम्हारी जेब से रोज कुछ न कुछ गायब न करूँ तो रिश्तेदारी में भी जाना मुश्किल हो जाय।श् इधर मोहन बाबू की बीबी ने एक नई रट लगा रखी थी- मोबाइल फोन खरीदने की।

हुआ यूँ कि पिछले दिनों मोहन बाबू की बीबी अपने मायके गयीं और वहाँ अपनी भाभी के हाथ में मोबाइल फोन देखा। जब तक उनके भैया के पास मोबाइल फोन था, तब तक तो ठीक था पर अब भाभी ही नहीं उनके बच्चों के पास भी मोबाइल फोन है। ऐसा नहीं कि उनके भैया किसी बहुत बड़े पद पर हैं, वरन् पी0 डब्ल्यू0 डी0 मंे एक मामूली क्लर्क हैं। भाभी के मुँह से भैया के रूतबे के किस्से उन्होंने खूब सुन रखे हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे ठेकेदार और नेता उनके सामने पानी भरते हंै। जिस समय मोहन बाबू से उनकी शादी हुयी, उस समय तक भैया को नौकरी नहीं मिली थी, पर नौकरी मिलने के दस साल के अन्दर ही उनके ठाठ-बाट साहबों वाले हो गए। मोहल्ले में अपना रूतबा झाड़ने के लिए उन्होंने एक सेकेण्ड हैण्ड मारूति कार खरीद ली और गेट पर एक झबरे बालों वाला कुत्ता बाँध लिया, जो भाभी की नजर में साहब लोगों की विशिष्ट पहचान होती है। एक बार भाभी के मुँह से कुत्ते के लिए कुत्ता शब्द निकल गया तो भैया झल्ला उठे थे- श्जिन्दगी भर गँवार ही रह जाओगी। अरे! कुत्ता उसे कहते हैं जो सड़कों पर आवारा फिरते हैं। इसे तो टाॅमी कहते हैं।श् फिर क्या था, तब से झबरे बालों वाला कुत्ता टाॅमी हो गया। टाॅमी जितनी बार पड़ोसियों को देखकर भौंकता, भाभी उतनी बार अपने पति की साहबी पर गुमान करतीं।

मोहन बाबू भी दिल से चाहते हैं कि एक मोबाइल फोन उनके पास हो जाय तो काफी सुविधा होगी। लैण्डलाइन फोन में वैसे भी कई समस्यायें आती हैं, मसलन- महीने में दस दिन तो डेड ही पड़ा रहता, उस पर से फोन का बिल इतना आता कि मानो आस-पड़ोस के लोगांे का भी बिल उसमें जोड़ दिया गया हो। फिर फोन का बिल सही करवाने के लिए टेलीफोन-विभाग का चक्कर काटो। एक तो बिना रिश्वत दिए वे बिल ठीक नहीं करते और उस पर से उस दिन के लिए दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ती है।

जब मोहन बाबू ने अपनी बीबी से मोबाइल फोन लेने की चर्चा की तो मानो उनको मुँहमाँगी मुराद मिल गयी हो। एक लम्बे अर्से बाद उस दिन मोहन बाबू की बीबी ने खूब मन से खाना बनाया और प्यार भरे हाथों से उन्हें खिलाया। मोहन बाबू की बीबी उस रात को सपने में देख रही थीं कि उनके घर में भी मोबाइल फोन आ गया है और जैसे ही मोबाइल फोन की घण्टी बजी, उन्होंने पहले से तैयार आरती की थाली को उस पर घुमाया और फिर मोबाइल फोन को स्टाइल में कानों के पास लगाकर बोलीं-हलो! ऊधर से आवाज आयी-कौन बोल रही हैं?.... मैं मिसेज मोहन बोल रही हूँ, किससे बात करनी है आपको? जी, मुझे शर्मिला से बात करनी है.... कौन शर्मिला..... अच्छा तो आवाज बदलकर पूछ रही हो, कौन शर्मिला! मेरी प्यारी बीबी शर्मिला, आई लव यू ..... दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा, दूसरों की बीबी को आई लव यू बोलते हो। अभी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराती हूँ....... साॅरी मैडम! लगता है रांग नम्बर लग गया। सपने के साथ ही मोहन बाबू की बीबी की नींद भी खुल गयी। वे प्रसन्न थीं कि सपने में मोबाइल फोन आया अर्थात घर में मोबाइल फोन आ जाएगा। रांग नम्बर तो आते रहते हैं, उनकी क्या चिन्ता करना।

सुबह होते ही मोहन बाबू को उनकी बीबी ने याद दिलाया कि आज मोबाइल फोन लाना है। आज नहीं, कल लाना है....... पर ऐसा क्यों.... अरे! आज तो मुझे टेलीफोन विभाग के दफ्तर जाकर इस लैण्डलाइन फोन को डिसकनेक्ट करवाने के लिए आवदेन देना होगा। पर मोबाइल का इस लैण्डलाइन फोन से क्या मतलब.... अरे तुम नहीं समझोगी? जब बिल भरना पड़ता तो पता चलता। मेरी अनुपस्थिति में घण्टों बैठकर तुम अपने मायके वालों के साथ गप्पें मारती हो, क्या मुझे नहीं पता है? अब ये लैण्डलाइन फोन कटवा कर मोबाइल फोन खरीदूँगा और उसे हमेशा अपने पास रखूँगा। ..... तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है। लैण्डलाइन फोन कटवाकर मोबाइल फोन खरीदोगे तो लोग सोचेंगे कि मोबाइल फोन खरीदने की औकात नहीं है सो उसे कटवाकर मोबाइल फोन खरीदा है। और फिर मोबाइल फोन अगर तुम अपने पास रखोगे तो मैं अपने मायके वालों से बातें कैसे करूँगी!.... तो फिर अपने मायके वालों को ही बोल दो न कि तुम्हें एक मोबाइल फोन खरीदकर दे दें। हाँ... हाँ... जरूर बोल दूँगी। मेरे मायके में तो सभी के पास मोबाइल फोन हंै, यहाँ तक कि बच्चों के पास भी। पर तुम किस मर्ज की दवा हो...... इतना दहेज देकर मेरे पापा ने इसलिए तुमसे शादी नहीं की, कि शादी के बाद भी मंै उनके सामने हाथ फैलाऊँ। वो तो मेरी गलती थी जो फोटो में तुम्हारे घुँघराले बाल और मासूम चेहरा देखकर रीझ गयी, नहीं तो आज मैं किसी घर में रानी की तरह रह रही होती।

मोहन बाबू की बीबी जब गुस्सा होतीं तो वे शान्तिपूर्वक वहाँ से खिसक लेने में ही भलाई समझते और मुझसे अच्छा उनका मित्र कौन हो सकता है। सुबह-सुबह अपने दरवाजे पर मोहन बाबू को देखकर मैं पूछ उठा- श्अरे मोहन बाबू!सब ठीक तो है। कोई प्राॅब्लम तो नहीं है।श् प्राॅब्लम है, तभी तो आया हूँ आपके पास। अच्छा-अच्छा! पहले आप आराम से बैठकर गर्मा-गर्म चाय और पकौडो़ं का मजा लीजिए और उसके बाद मैं आपकी प्राॅब्लम हल करता हूँ। फिर मोहन बाबू ने चाय व पकौड़ों के साथ टेपरिकार्डर की तरह अपनी सारी प्राॅब्लम मेरे सामने रख दी। चूँंकि मैं मोहन बाबू की ईमानदारी से परिचित हूँ सो उनकी प्राॅब्लम अच्छी तरह समझता हूँ पर उनकी बीबी भी जमाने के हिसाब से गलत नहीं हैं।.... अचानक मेरी निगाह अखबार मे छपे एक विज्ञापन पर पड़ी- श्हमारे मोबाइल फोन खरीदिए और एक साल तक इनकमिंग फ्री पाईये।श् मैंने मोहन बाबू को विज्ञापन दिखाया तो वे काफी खुश हुए और हँसते हुए बोले- श्लगता है इन मोबाइल फोन वालों को मेरे जैसों का भी ख्याल है।श् मैंने उन्हें सलाह देते हुए कहा- श्मोहन बाबू मोबाइल फोन खरीदने के लिए कुछ दिन तक इन्तजार कर लीजिए तो कम्पटीशन में अन्य मोबाइल कम्पनियाँ सम्भवतः और भी आकर्षक प्लान के साथ आयें।श् खैर मोहन बाबू को मेरी बात जँची और अखबार का विज्ञापन वाला पेज उठाते हुए बोले- श्अगर बुरा न मानें तो, ये मैं अपने साथ लेते जाऊँ। आपकी भाभी को दिखाऊँगा तो शायद उसका गुस्सा कुछ ठण्डा हो जाय।श्

मोहन बाबू उस दिन के बाद से रोज सुबह ही सुबह मेरे दरवाजे पर आ टपकते हंै। चाय और पकौडों के साथ अखबार देखते हैं और ऐसे खुश होते हैं मानो भगवान ने उनकी सुन ली हो। पहले एक साल, दो साल, तीन साल, पाँच साल, और फिर आजीवन इनकमिंग फ्री वाले मोबाइल कम्पनियों के विज्ञापन आये पर मोहन बाबू मोबाइल खरीदने के लिए उस दिन का इन्तजार कर रहे हैं जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए ओर अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री पाइये।श् पर अब मंै मोहन बाबू से परेशान हो गया हूँ क्योंकि वे हर सुबह मेरे घर आकर चाय व पकौडों का मजा लेते हैं और फिर विज्ञापन के बहाने पूरा का पूरा अखबार लेकर चले जाते हैं। मुझे तो डर लगता है कि कहीं अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री वाला विज्ञापन किसी मोबाइल कम्पनी ने दे भी दिया तो मोहन बाबू यह न कह उठें कि अब मैं मोबाइल फोन उसी दिन खरीदूँगा जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए और अगले जन्म ही नहीं वरन् सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री पाइये।

32 comments:

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

17 April 2010 at 05:18

श्री के.के. यादव जी को बहुत-बहुत बधाई!

  Udan Tashtari

17 April 2010 at 05:53

बहुत बेहतरीन.

के के यादव जी का स्वागत है वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में..बधाई.

  Suman

17 April 2010 at 05:59

nice

  P.N. Subramanian

17 April 2010 at 07:28

घर घर की कहानी है

  संजय भास्कर

17 April 2010 at 07:34

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

  विनोद कुमार पांडेय

17 April 2010 at 07:39

रोज तो तरह तरह के स्कीम आते रहते है हो सकता है की मोहन बाबू का सपना सच हो जाय...मोहन बाबू की पत्नी जैसी हाल तो कइयों की होती है मोबाइल अब कोई बड़ी बात तो है नही ऐसी हालत में जब पास में ना हो तो खटकता है....बहुत बढ़िया रचना...कृष्ण कुमार जी बहुत बधाई इस सुंदर मजेदार रचना के लिए..

  बवाल

17 April 2010 at 11:46

हा हा बहुत मज़ेदार लेख है जी और बहुत बेहतरीन तंज़ भी है लेखक जी का। ताऊ, आपका यह आयोजन बहुत अच्छा लगा जी। बहुत सराहनीय प्रयास है यह आपका। आभार और नमस्कार।

  Ghanshyam

17 April 2010 at 11:48

खूब कही कृष्ण कुमार जी ने..मजा आ गया..हार्दिक बधाई.

  Ratnesh

17 April 2010 at 11:51

प्रशासनिक दायित्वों के साथ साहित्य सृजन के.के. साहब की विशेषता है. यहाँ उनकी रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा. व्यंग्य के माध्यम से के.के. जी ने समाज की नब्ज़ पर हाथ रखा है.

  Bhanwar Singh

17 April 2010 at 11:53

हा..हा..हा..मजेदार व्यंग्य. कभी मेरी भी तमन्ना कुछ ऐसी ही थी.

  Akanksha~आकांक्षा

17 April 2010 at 11:56

सुन्दर विश्लेषण. मोबाईल कम्पनियाँ इसी तरह तो लोगों को बेवकूफ बना रही हैं. कृष्ण कुमार जी को साधुवाद इस अनुपम प्रस्तुति के लिए.

  Shahroz

17 April 2010 at 12:00

अजी क्या कहने. इसे कहते हैं नहले पर दहला. प्रशासन में बैठकर कृष्ण जी इन चीजों को ज्यादा नजदीक से जानते होंगे. बेबाकी से सच्चा व्यंग्य लिखा..मुबारकवाद !

  Dr. Brajesh Swaroop

17 April 2010 at 12:05

यह सिर्फ व्यंग्य नहीं सच्चाई है. जिस तरह से मोबाईल कम्पनियाँ अपने ग्राहकों को झांसा दे रही हैं, वह ऐसा ही कुछ है. एक सार्थक व्यंग्य लेख के लिए के. के. यादव जी बधाई के पात्र हैं.

  Shekhar kumawat

17 April 2010 at 12:08

krishan kumar ji ko badhai is ke liye



shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com

  SR Bharti

17 April 2010 at 12:12

मुझे तो याद भी नहीं कि अन्तिम बार तुमने मुझे कब साड़ी खरीद कर दी थी। वो तो मैं अगर तुम्हारी जेब से रोज कुछ न कुछ गायब न करूँ तो रिश्तेदारी में भी जाना मुश्किल हो जाय....
_______________
काहे को लोगों की पोल खोल रहे हैं भाई जी.और इसी बहाने बीबियों को नुस्खे भी दे रहे हैं...जबरदस्त लिखा आपने..डबल बधाई ताऊ जी और कृष्ण कुमार यादव जी को.

  Amit Kumar

17 April 2010 at 12:17

क्या खूब लिखा. पढ़कर दिल खुश हो गया. वैशाखनंद सम्मान प्रतियोगिता में इस विलक्षण प्रस्तुति के लिए कृष्ण जी को बधाई. ताऊ जी तो आजकल पूरा हास्य व्यंग्य का माहौल बनाये हुए हैं.

  Ram Shiv Murti Yadav

17 April 2010 at 12:20

अनुपम हास्य-व्यंग्य रचना, शुभकामनायें. आयोजकों का भी आभार.

  Ram Shiv Murti Yadav

17 April 2010 at 12:27

अनुपम हास्य-व्यंग्य रचना, शुभकामनायें. आयोजकों का भी आभार.

  raghav

17 April 2010 at 12:32

मोबाईल मीनिया जिस तरह से समाज मैं फ़ैल चुका है, उसे कृष्ण कुमार जी ने बेहतरीन शब्दों में उकेरा है. एक प्रशासनिक अधिकारी की कलम से ऐसी बेहतरीन रचना पढना सुखद लगा.

  ersymops

17 April 2010 at 13:00

कई बार व्यंग्य के माध्यम से भी सार्थक बातें उभरकर सामने आती हैं. के. के. यादव का यह व्यंग्य मोबाईल कंपनियों के ऐसे प्रयोजनों से लोगों को सावधान करता है.

  Rashmi Singh

17 April 2010 at 13:15

अब मैं मोबाइल फोन उसी दिन खरीदूँगा जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए और अगले जन्म ही नहीं वरन् सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री पाइये।

*********************
मोबाईल वार और लोगों की मनोस्थितियों का चित्रण करती एक विलक्षण रचना.सरकारी सेवा में उच्च पद पर रहकर लेखन कार्य करने वाले कृष्ण कुमार जी को शुभकामनायें कि वो निरंतर ऊँचाइयों पर अग्रसर हों.

  KK Yadava

17 April 2010 at 13:21

वैशाखनंद सम्मान प्रतियोगिता में मेरी रचना प्रकाशन के लिए ताऊ जी का आभार.

  अक्षिता (पाखी)

17 April 2010 at 13:26

अले ये तो मेरे पापा की रचना है..बढ़िया है.

  अभिलाषा

17 April 2010 at 13:30

के.के. यादव जी लिख ही नहीं रहे हैं, बल्कि खूब लिख रहे हैं. एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ अपनी व्यस्तताओं के बीच साहित्य के लिए समय निकलना और विभिन्न विधाओं में लिखना आपकी विलक्षण प्रतिभा का ही परिचायक है. वैशाखनंद सम्मान प्रतियोगिता में आपकी यह व्यंग्य रचना पढ़कर मजा आ गया. एक कडवी सच्चाई को सुन्दर शब्दों में के. के. जी ने व्यक्त किया है..कोटिश: बधाई.

  अभिलाषा

17 April 2010 at 13:30

के.के. यादव जी लिख ही नहीं रहे हैं, बल्कि खूब लिख रहे हैं. एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ अपनी व्यस्तताओं के बीच साहित्य के लिए समय निकलना और विभिन्न विधाओं में लिखना आपकी विलक्षण प्रतिभा का ही परिचायक है. वैशाखनंद सम्मान प्रतियोगिता में आपकी यह व्यंग्य रचना पढ़कर मजा आ गया. एक कडवी सच्चाई को सुन्दर शब्दों में के. के. जी ने व्यक्त किया है..कोटिश: बधाई.

  शरद कुमार

17 April 2010 at 13:38

कृष्ण कुमार यादव जी की रचनाएँ अक्सर पढता रहता हूँ, आप एक विद्वान और यशस्वी रचनाकार है. 'सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री' व्यंग्य रचना उन्हीं भावनाओं को शब्द देती है, जिसे हम आपने आसपास रोज देखते हैं. आप जैसा व्यक्तित्व प्रशासन व साहित्य में निहित गुणों की खान है.
प्रभु आपको ऊंचाई दे.

  KK Yadava

17 April 2010 at 13:47

आप सभी के प्रोत्साहन के लिए आभार ! ताऊ जी का आभारी कि यहाँ इतने लोगों से रु-ब-रु हो सका !!

  संजय भास्कर

17 April 2010 at 17:32

कृष्ण कुमार यादव जी की रचनाएँ अक्सर पढता रहता हूँ

  अल्पना वर्मा

18 April 2010 at 00:25

बहुत बढ़िया लिखा है.
मज़ेदार!

  जयकृष्ण राय तुषार

22 April 2010 at 15:57

बहुत सुन्दर व्यंग्य रचना...कृष्ण कुमार जी को बधाई.

  जयकृष्ण राय तुषार

22 April 2010 at 15:58

कृष्ण कुमार यादव जी को इसलिए भी बधाई की आप एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी होते हुए भी बेहद संवेदनशील साहित्यकार हैं...मेरी शुभकामनायें.

  इम्तियाज़ गाज़ी : गुफ्तगू

14 May 2010 at 12:49

बहुत करार व्यंग्य के. के. जी ने रचा..हम भी ऐसे ही एक सज्जन को जानते हैं.

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