वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : डा. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम- डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
पिता का नाम- श्री महेन्द्र सिंह सेंगर
माता का नाम- श्रीमती किशोरी देवी सेंगर
शिक्षा- पी-एच0डी0, एम0एम0 राजनीतिविज्ञान, हिन्दी साहित्य, अर्थशास्त्र, पत्रकारिता में डिप्लोमा
साहित्य लेखन 8 वर्ष की उम्र से।
कार्यानुभव- स्वतन्त्र पत्रकारिता (अद्यतन), चुनावसर्वे और चुनाव विश्लेषण में महारत
विशेष- आलोचक, समीक्षक, चुनाव विश्लेषक, शोध निदेशक
सम्प्रति- प्रवक्ता, हिन्दी, गाँधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)
सम्पादक- स्पंदन
निदेशक- सूचना का अधिकार का राष्ट्रीय अभियान
संयोजक- पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन
ब्लाग : रायटोक्रेट कुमारेंद्र और शब्दकार

व्यंग्य
आफत के मारे, हम बेचारे!
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर


सुबह-सुबह घड़ी का अलार्म घनघना उठा। घनघनाहट इतनी तेज थी कि आँख खुल गई, वैसे भी आज के जमाने में चैन की नींद आती भी कहाँ है। कुछ सोच पाते उससे पूर्व श्रीमती जी पलंग पर पड़े-पड़े ही चिल्ला उठीं-‘‘क्या घोड़े बेच कर सो रहे हो, उठना नहीं है?’’

हिम्मत तो नहीं थी कि यह पूछते कि बात क्या है? क्यों उठाया जा रहा है? गृहमंत्री जो ठहरे.....अरे भाई हम नहीं....हमारी श्रीमती जी। किसी तरह मन मारकर उठे तो श्रीमती जी ने वहीं पड़े-पड़े सामने की अलमारी की तरफ इशारा करते हुए आदेशात्मक रूप में अपनी जुबान खोली-‘‘अलमारी से गैस वाली किताब और साथ में रखे छह सौ रुपये उठाकर सिलेण्डर लेने चले जाओ।’’

हमने अपनी जीभ को भी लपलपाने का मौका दिया.....‘‘इतनी सुबह? अभी कौन सा सिलेण्डर मिल रहा होगा?’’ बस भैया.....यहीं गलती हो गई। श्रीमती जी आपे से बाहर होकर पूरी ताकत से रिश्तेदारी निभाने लगी। ‘‘तुम्हारे कक्का की एजेंसी है कि जब पहुँचे तभी सिलेण्डर हाजिर।

श्रीमती जी इतने पर भी नहीं थमीं-‘‘हे भगवान! किस आदमी से पाला पड़ा है?... पता नहीं मेरे बाप को क्या दिखा था इसमें?’’ रिश्तेदारी निभाने में श्रीमतीजी दोनों पक्षों का सम्मान करतीं हैं।

व्यवस्था को कोसते हुए गैस की बुकिंग बुक, रुपये उठाये और फिर खाली सिलेण्डर संभालने को रसोई की ओर मुड़ गये।

‘‘कहाँ चले जा रहे जो मुँह उठाये, सिलेण्डर बाहर रखा है, बरामदे में.... किचन में न तलाशो.....अभी कुछ पटक दोगे तो बस।’’ श्रीमती जी की तीव्रतम ध्वनि से हड़बड़ाकर रसोई के दरवाजे से अपना सिर टकरा बैठे। बिना किसी प्रकार की चूँ-चपाड़ करे अपने सिर को मलते हुए खूँटी पर टँगी पुरानी शर्ट उठायी, अपने तन पर लटकाई और सिलेण्डर उठाकर बाहर आ गया।

खाली सिलेण्डर को साइकिल के कैरियर पर लगाने के प्रयास में दो बार साइकिल और सिलेण्डर ही पटक दिये। अबकी तीसरी बार पूरी दम लगा कर सिलेण्डर को किसी तरह साइकिल के कैरियर पर लादा। अभी दरवाजा खोलकर बाहर कदम निकाला ही था कि बगल वाले महाशय ने पीछे से आवाज के सहारे पकड़ लिया-‘‘क्यों भाई साहब, कहाँ भागे जा रहे.... सुबह-सुबह?’’

‘‘कहीं नहीं भाई साहब, सिलेण्डर को मार्निग वॉक पर ले जा रहे हैं।’’ हमने खीझकर जवाब दिया।
‘‘हें....हें....हें.....मेरा मतलब ये नहीं था....मेरा मतलब था कि क्या गैस भरवाने जा रहे हैं?’’ वे श्रीमान् जी अपनी आदत से बाज नहीं आये।

‘‘नहीं भाई साहब, गैस तो ज्यादा ही भरी हुई है। अभी अभी एजेंसी से फोन आया था, वहाँ गैस खतम हो गई है। उन्हीं को थोड़ी सी गैस देने जा रहे हैं।’’

वे महाशय समझ गये कि हम उनकी बातों के चक्कर में आने के मूड़ में नहीं हैं। सो बिना और कोई सवाल किये अपनी साइकिल पोंछने लगे।

हम इस डर से कि देरी के चक्कर में लम्बी लाइन का शिकार न हो जाना पड़े, हालांकि मन में यह विश्वास था कि इस समय लगभग चाढ़े पाँच बजे सुबह लाइन नहीं होगी, तेजी से साइकिल चलाते गैस एजेंसी की तरफ भागे जा रहे थे। रास्ते में दो-तीन कर्तव्यनिष्ठ पति और मिले जो हमारे साथ भाग रहे थे।

‘हे भगवान! ये क्या?’ मुँह से हल्की सी आह निकल गई। एजेंसी के सामने विशाल जन समुदाय..... एक लम्बी लाइन लगी थी। पहले पूरी लाइन का मौका-मुआयना किया कि कोई ऐसा परिचित मिल जाये जो अपने साथ ही हमारी गैस बुक और सिलेण्डर ले ले। थोड़ी सी इधर उधर की निगाहबाजी के बाद एक दो लोग परिचित दिखे। पहले तो उन्होंने ही अनदेखा सा किया, बाद में हमने ही जबरदस्ती घुसपैठ की तो दुआ सलाम हो गई। वे शायद हमारी मंशा ताड़ चुके थे। सो नियम, एजेंसी मालिक, लोगों का बहाना मारने लगे। कुछ आनाकानी के बाद वे सज्जन हमारी बात मान गये। इससे पहले कि लाइन में हम लोग आपसी स्थानान्तरण कर पाते शेष जनसमुदाय असंतुष्ट विध्ाायकों की तरह शोरगुल मचाने लगा। ‘लाइन में आओ....‘हम सब बेवकूफ हैं क्या?’.....‘सुबह से हम भी लगे हैं’....‘कोई लाट साहब हो क्या?.....‘एक तमाचा लगाओ, मान जायेगा’.....वगैरह-वगैरह के विविध लघु वाक्य हमारे कानों में प्रवेश कर डरवा रहे थे।

डर के मारे, चाहे वो पिटने का रहा हो अथवा खाली सिलेण्डर गुम जाने का, हमने अपना रुख चुपचाप लाइन में पीछे की ओर कर दिया। लगा कि देश की सरकार इसी कारण विपक्ष के दबाव में काम नहीं कर पाती है। जैस-तैसे तो कोई एक मौका आता है काम करने का पर वो भी कुछ लोगों के कारण पूरा नहीं हो पाता है। बहरहाल रोते-घिसटते, लोगों को कोसते-कोसते लाइन के आखिर तक आ गये। लाइन के एक साथी के हवाले खाली सिलेण्डर को छोड़ साइकिल को किनारे टिकाया।

कुछ देर तो खड़े-खड़े समय काटा और जब पैरों ने भी समर्थन बापस लेने जैसा रंग-ढंग दिखाया तो तशरीफ सिलेण्डर के ऊपरी हिस्से पर टिकाई, पैर-पैंट ऊपर सिकोड़े और बन गये राजा साहब। बैठे-बिठाये सोचा कि पता तो करें कि हम किस नम्बर पर होनहारपन दिखा रहे हैं। गिनना शुरू किया तो पता लगा...पूरे बासठ....साठ से भी दो ज्यादा यानि कि सठियाने से अधिक।

तभी कुछ हलचल सी हुई, घड़ी देखी तो अभी सवा सात के आसपास हो रहा था। सोचा कि फिर हलचल क्यों? हलचल की तरफ देखा तो चाय वाले की झलक दिखाई दी। चाय के कप लोगों के हाथों में देख तलब ने एकदम तेजी से उभार मारा। चाय वाले को चिल्ला कर आवाज़ दी तो वह भी उससे अधिक तेजी से चिल्लाया-‘‘यहीं आकर ले जाओ।’’ अब फिर फँस गये, चाय पीनी है तो यह जगह छोड़नी होगी। जगह छोड़ी तो गया सिलेण्डर..... दिमाग इधर-उधर दौड़ाया......सिलेण्डर से उतर खड़े होकर हाथ-पैर खींच कर थकान भगाई। आसपास का कोई और चाय का शौकीन समझ में नहीं आ रहा था। एक-दो पल इधर उधर ताका फिर जब कुछ न सूझा तो अपने पीछे वाले से पूछा-‘‘क्या साहब, आपको चाय तो नहीं पीना है?’’ आवाज में अतिरिक्त मधुरता घोली कि शायद काम बन जाये।

‘‘पीता तो नहीं हूँ, पर आप पिलाओ तो पी लूँगा।’’ वे सज्जन खीसें निपोर कर बोले। अब चाय तो पीनी थी......जेब से एक दस रुपये का नोट निकाला। उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा-‘‘लीजिये साहब, दो कप ले आइए।’’ वे सज्जन तो बड़े काइयाँ निकले। सिर खुजाते हुए बोले-‘‘चाय आप पिलवा रहे हो.....नौकर हमें समझ रखा है। अरे पिलाना ही है तो जाओ और लेकर आओ।’’ मेरी चुप और कुछ संशय को देख वे ही आगे बोले-‘‘घबराइये नहीं, सिलेण्डर मैं देखे रहूँगा। कोई मेरे रहते नहीं चुरा सकेगा।’’

मरता क्या न करता, चाय तो पीनी थी सो खाली सिलेण्डर को एक अपरिचित के विश्वास पर छोड़ कर डरते-डरते चाय वाले की तरफ बढ़ चले। चाय की ठिलिया के चारों ओर भी मारा-मारी इस तरह से मची थी मानो वह फ्री में पिला रहा हो। दो-चार मिनट बाद भीड़ कुछ छँटी। चाय लेते ही एकदम से ध्यान आया कि सिलेण्डर तो किसी अपरिचित के भरोसे छोड़कर आये हैं ‘चोरी न हो गया हो’ के भय ने कदमों में तेजी ला दी। दूर से ही दिख गये वे सज्जन और उनके सामने सीना तान कर खड़ा हमारा सिलेण्डर। जान में जान आ गई। एक कप चाय महाशय को दी। वे मुस्कराकर चाय सुड़कने लगे।

भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। कुछ न कुछ बतियाना भी चल रहा था। कोई क्रिकेट पर, कोई फिल्म पर, कोई राजनीति पर तो कोई आने वाले चुनाव की आहट पर अपने-अपने स्पेशल कमेंट दे रहा था। शांतिपूर्ण माहौल में अचानक संसद-सत्र जैसा हंगामा शुरू हो गया। शोर होने लगा कि किसी का सिलेण्डर चोरी हो गया। अपने सिलेण्डर को पूरी तरह अपने कब्जे में लेकर हंगामे की ओर दिमाग दौड़ाया। देखा तो महाशय एक-दूसरे का कॉलर/गिरेबान पकड़े सांसदों/विधायकों की याद ताजा करवा रहे थे। कभी-कभी तो लगता है कि इस गिरेबान पकड़’ को तो राष्ट्रीय खेल बना देना चाहिए, जिसे देखो वही एक दूसरे की कॉलर पकड़ मैदान में खड़ा हो जाता है।

थोड़ी सी गाली गलौज, थोड़ी सी मारपीट के बाद पता चला कि मामला शांत हो गया। सिलेण्डर नहीं मिला और उसके मालिक साहब सिसियाए से घूम रहे हैं। हमें लगा कि कैसे आदमी अपनी चीज के प्रति अनजान बना रहता है?

इस दौरान हुआ तो बहुत कुछ। जो घर के सताये थे वह यहाँ लोगों को सता रहे थे। कुछ रंगीन मिजाज लोग महिलाओं की लाइन पर लगीं कुछ महिलाओं को विविध्ा दृष्टिकोणों से नापे जा रहे थे। लगभग पौने दस बजे के आसपास एजेंसी खुलने का उपक्रम हुआ। खामोश सी, निष्क्रिय सी भीड़ में ताजगी और उत्साह का संचार हुआ। कुछ कागज और एक दो रजिस्टर पकड़े एक महाशय भीतर से बाहर पधारे और ‘‘आज केवल पचास लोगों को सिलेण्डर मिल सकेंगे। बाकी लोग घर जायें....यहाँ भीड़ न लगायें’’ का ब्रह्मवाक्य बोल भीतर घुस गये।

लाइन में लगे लोगों में खलबली मच गई। हमारी तो हालत खराब थी पर देखा कि इक्यावन नम्बर वाले की स्थिति तो और भी बदतर हो रही थी। अब पहले पचास को छोड़ शेष किसी न किसी जुगाड़ में लग गये। जुगाड़ संस्कृति का ख्याल हमारे भी मन में आया पर कहाँ से लायें जुगाड़। यहाँ तो किसी से परिचय भी नहीं। सिलेण्डर न मिल पाने का दुःख तो हो रहा था पर सबसे बड़ा डर लग रहा था श्रीमतीजी के चिल्लाने का।

सिलेण्डर बँटने शुरू हो गये थे। जिन्हें मिल रहे थे वे ऐसे चल रहे थे मानो किसी जागीर के जागीदार हो गये थे। अपना कोई समाधान होता न देख खाली सिलेण्डर को घसीटना शुरू किया और चाय वाले के पास आकर खड़े हो गये। एक कप चाय का सूखा सा आर्डर कर उसी सिलेण्डर पर बैठ गये।

चाय वाला हमारी दशा को देख समझ गया कि हम हारे हुए प्रत्याशी हैं। हमारी दशा देख बोला-‘‘क्या बाबू जी, सिलेण्डर नहीं मिला?’’ उसने चाय का कप पकड़ाते हुए पूछा। चाय गुटकते-गुटकते उसके सामने सिलेण्डर प्रकट करवाने की गुहार लगायी। चाय वाले ने भी पर्याप्त खुशामद करवाने के बाद मुँह खोला कि ‘‘दो सौ रुपये ऊपर से लगेंगे और पचास हमारे......तैयार हो तो बताइये।’’

चाय का कप अधर में लटका रह गया। इधर-उधर का हिसाब लगा कर, आने-जाने का हिसाब जोड़कर, अपने आफिस की छुट्टी की स्थिति टटोल कर लगा कि ढाई सौ रुपये की सुविधा स्थिति बुरी नहीं है। मुँह में भरी चाय को गले से नीचे उतार चाय वाले को ’हाँ’ कर दिया। गैस-बुक और रुपये चाय वाले को थमाये। उसने अतिरिक्त फुर्ती दिखाते हुए खाली सिलेण्डर लेकर एजंेसी की तरफ भागा।

कुछ पलों के हसीन इंतजार के बाद चाय वाला भरे हुए सिलेण्डर के साथ प्रकट हुआ। हमें भी उस समय सुकून की परमानुभूति हुई, परमानन्द की प्राप्ति हुई। लाल रंग से भरा हुआ सिलेण्डर किसी लाल बत्ती से कम समझ नहीं आ रहा था। चाय वाले से उसे देखते रहने को कह साइकिल लेने को बढ़े कि चाय वाले की रूखी आवाज सुनाई दी-‘‘सिलेण्डर ले के जाओ। इसकी सुरक्षा की कोई गारण्टी नहीं।’’

भरे सिलेण्डर को कमजोर हाथों से उठाने का प्रयास किया पर बेकार रहा। अंततः बिना शारीरिक दमखम दिखाये सिलेण्डर को लुड़का कर ले जाने में भी भलाई समझी। पसीना बहाते, लातों-हाथों से धकियाते उस स्थान तक पहुँचे जहाँ साइकिल टिकाई थी। इस बीच मन में श्रीमती जी का उत्साह, घर की गरमागरम चाय और हमारी मेहनत का सुफल निकलने के सुन्दर-सुन्दर विचार बनते रहे पर उस स्थान को देख विचार चकनाचूर हो गये। साइकिल वहाँ थी ही नहीं.....नदारद। समझ नहीं आया कि हो क्या गया? यहाँ खड़ी साइकिल कहाँ गई? पास की पान की दुकान वाले पूछा। ‘‘यदि यहाँ नहीं है तो चोरी हो गई समझो।’’

उफ! सिलेण्डर पा लेने की सारी खुशी गैस की तरह ही उड़ गई। अब इस सिलेण्डर को छोड़कर जाया भी नहीं जा सकता था। समझ नहीं आ रहा था कि करें क्या? दुःख हो रहा था, खीझ भी हो रही थी कि दिमाग से साइकिल का ध्यान कैसे निकल गया? कोई चारा न देख चुपचाप खड़े हो गये। आँख भर-भर आ रही थी, आवाज भर्रा जा रही थी; यह सब इस बात से कम कि साइकिल चोरी हो गई थी इस बात से अधिक हो रहा था कि घर पहुँच कर अब छीछालेदर होनी है। सिलेण्डर मिल जाने की उपलब्धि इस चोरी के पीछे दब चुकी थी। मन में अपने गृहमंत्री-श्रीमती जी की कर्कश फटकार का खौफ लिए घर जाने के लिए रिक्शे वाले को रोकने की कोशिश में लग गये।

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
प्रवक्ता हिन्दी विभाग
गाँधी महाविद्यालय, उरई
सम्पादक-स्पंदन

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

12 comments:

  Suman

20 April 2010 at 05:56

nice

  दीपक 'मशाल'

20 April 2010 at 05:58

तथाकथित छोटे शहरों और कस्बों में अदद एक गैस सिलेंडर के लिए होती मारामारी इस बार मैं भी भारत में देख कर आया हूँ और दुःख की बात ये कि सबको पता होते हुए भी कि ये एजेंसी वाले ६०% से ज्यादा सिलेंडर ब्लैक में निकलते हैं, इनके खिलाफ आवाज़ उठाने या शिकायत करने को कोई राज़ी नहीं होता. मैंने कोशिश कि तो किसी ने साथ नहीं दिया. आपने हालात का व्यंग्य के रूप में ही सही बहुत ही सुन्दर और सजीव चित्रण किया है. इन एजेंसी मालिकों को भी गैस माफिया कहें तो कुछ गलत नहीं होगा
ऊपर पैसा खिला कर ये दूसरी एजेंसी भी शहर में नहीं आने देते.. एक तो दुगुने दामों में मान-शान-रौब से और क़ानून से डरे बिना बेचटे हैं ऊपर से तुर्रा ये कि लेना हो तो लो वर्ना फूटो. जब पुलिस फिल्म टिकट ब्लैक करने वालों को पकड़ सकती है तो इन्हें क्यों नहीं? ताऊ का आभार. वैशाखनंदन प्रतियोगिता के लिए मैं कई दिनों से लिखने का सोच रहा हूँ पर कभी मूड नहीं बनता तो कभी समय नहीं मिलता.

  राजभाषा हिंदी

20 April 2010 at 06:59

बहुत सुंदर।

  Udan Tashtari

20 April 2010 at 07:37

बहुत सटीक/// भाई कुमारेन्द्र जी का स्वागत वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में स्वागत...बहुत बधाई इस प्रविष्टि के लिए.

  विनोद कुमार पांडेय

20 April 2010 at 07:57

बड़ी दुखमय गाथा हो जाती है बेचारे शादीशुदा लोगो की सिलेंडर लेकर सही सलामत आए तो साइकिल गायब पर गायब होने का उतना दुख नही जितना घर जाकर लेक्चर सुनने का...बढ़िया व्यंग....धन्यवाद

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

20 April 2010 at 09:22

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

  अल्पना वर्मा

20 April 2010 at 09:58

इतनी मारामारी गेस सिलिंडर के पीछे ! उस पर सिलेंडर मिला तो साईकिल चोरी!
दुखमय गाथा .बहुत बढ़िया व्यंग्य !

  anjana

20 April 2010 at 11:47

बढ़िया व्यंग्य !!!!

  sangeeta swarup

20 April 2010 at 12:03

बढ़िया व्यंग....

  प्रकाश गोविन्द

20 April 2010 at 14:48

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में प्रस्तुत यह पहली ऐसी रचना है जो सीधे तौर सरकारी व्यवस्था को दर्शाती है ! पढ़कर 'वागले की दुनिया' का स्मरण हो आया !
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आम आदमी की व्यथा को समेटे सुन्दर व्यंग !
लेखन बहुत अच्छा लगा
बधाई

  चिट्ठाचर्चा

20 April 2010 at 23:42

आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. आशा है हमारे चर्चा स्तम्भ से आपका हौसला बढेगा.

  Ratan Singh Shekhawat

21 April 2010 at 07:09

बहुत ही बढ़िया व्यंग्य

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