वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री दीपक चौरसिया 'मशाल'

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं. अब एक सप्ताह से भी कम समय बचा है.

आज श्री दीपक मशाल की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम : दीपक चौरसिया 'मशाल'
माता- श्रीमति विजयलक्ष्मी
पिता- श्री लोकेश कुमार चौरसिया
जन्म- २४ सितम्बर १९८०, उरई(उत्तर प्रदेश)
प्रारंभिक शिक्षा- कोंच(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- जैवप्रौद्योगिकी में परास्नातक, पी एच डी(शोधार्थी)
संस्थान- क्वीन'स विश्वविद्यालय, बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैण्ड, संयुक्त गणराज्य

१४ वर्ष की आयु से साहित्य रचना प्रारंभ की, प्रारंभ में सिर्फ लघु कथाओं, व्यंग्य एवं निबंध लिखने का प्रयास किया। कुछ अभिन्न मित्रों से प्रेरित और प्रोत्साहित होके धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी, कहानियां लिखनी प्रारंभ कीं. अब तक देश व क्षेत्र की कुछ ख्यातिलब्ध पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा का प्रकाशन, रचनाकार एवं शब्दकार में कुछ ग़ज़ल एवं कविताओं को स्थान मिला. श्रोताओं की तालियाँ, प्रेम एवं आशीर्वचनरूपी सम्मान व पुरस्कार प्राप्त किया.

हाल ही में प्रथम काव्य संग्रह 'अनुभूतियाँ' का शिवना प्रकाशन सीहोर से प्रकाशन.
रुचियाँ- साहित्य के अलावा चित्रकारी, अभिनय, पाककला, समीक्षा, निर्देशन, संगीत सुनने में खास रूचि।
ब्लॉग- मसि कागद(http://swarnimpal.blogspot.com)
email: mashal.com@gmail.com
संपर्क- +४४ ७५१५४७४९०९


खामोश!!!नेताजी दौरे पर हैं....

आज नेता जी को दौरे पर जाना है. सारी तैयारियों का जायजा लिया जा रहा है, असल में है क्या कि आज के छवि-सुधार शिड्यूल में नेता जी को श्रमदान करना है, पैदल चलना है, रस्ते में कार रोक समोसे खरीदकर खाना है और सबसे बाद में एक हरिज़न के यहाँ खाना खाना और सोना है. पहले से तैयारियों के चलते अफसरों की एक टीम पहले ही गाँव की तरफ गई हुई है. एक सेक्रेटरी सब व्यवस्थाओं का पुनरीक्षण कर रहा है.

नेता जी के खासमखास ''आदमी' ने एक चमचे को बुला कर कहा- ''देखो, मीडिया वालों को खबर कर के बुला लो और उनकी जम के खातिरदारी करना और समझा देना कि अपने खबरियों को कह दें कि ये खबर तब तक लीक नहीं होनी चाहिए.. जब तक कि दौरा पूरा ना हो जाए. हाँ दौरे के बाद ये समाचार बनाना कि नेता जी ने अचानक दौरा किया और सत्तारूढ़ पार्टी के राज में प्रशासन इतना चुस्त-दुरुस्त है कि देश का इतना बड़ा युवा नेता दौरा करके चला गया और किसी को कानो-कान खबर भी ना लगी.''
कहकर वापस अन्दर नेता जी को सजाने-संवारने के लिए अन्दर जाने लगे तो अचानक कुछ और ध्यान आया... पलट कर आये और बोले-
''अरे सुनो, उधर प्रशासन के सभी बड़े अफसरान के घर मिठाई के डब्बे भिजवा कर उन्हें भी बतला देना कि तरक्की चाहते हों तो थोड़ा सा अपमान सहें और दौरे के बाद ही अपनी गाड़ियां 'मुकम्मल' स्थान की तरफ दौडाएं. ''
कार्यालय के दूसरे कमरे में एक दूसरे खास आदमी जी लिस्ट मिला रहे हैं-
''प्लास्टिक का तसला ले लिया, थर्माकोल के बने रंगे हुए पत्थर ले लिए, नेता जी के कुरते को मजदूर के कुरते का लुक देने के लिए मटमैला चन्दन ले लिया, जिन मजदूर युवतियों के साथ नेता जी मिट्टी ढोएंगे उनका चयन खूबसूरती के आधार पर हो गया है और उन्हें हिदायत दे दी गई कि अच्छे से नेताजी द्वारा भिजवाये गए खुशबूदार साबुन से मल-मल कर नहा कर आयें और ढेर सारा डियोद्रेंट और परफ्यूम लगाना ना भूलें, वगैरहवगैरह...''

नेता जी का कारवाँ सज चुका है और जेड प्लस प्लस प्लस सुरक्षा के अतिरिक्त २ अन्य गाड़ियां, जो कि निजी कंपनियों के सुरक्षाकर्मियों से भरी थीं काफिले के आगे पीछे लगा दी गई हैं. एक गाडी में नहाने और पीने के लिए मिनरल वाटर भर लिया गया है. इस तरह नेता जी जिंदाबाद के नारे के साथ सभी १८-२० गाड़ियों का 'छोटा' सा काफिला बीहड़ के एक गाँव की तरफ रवाना हो गया. नेता जी ने रास्ते में पोलेराइड ग्लास वाला काला चश्मा लगा लिया है और सेक्रेटरी को गाँव के बाहर ही चश्मा उतारने की याद दिलाने के लिए भी कह दिया जिससे कि उन पर हाई-फाई बनने का इलज़ाम ना लगे.
नेता जी एक दूरदर्शी 'इंसान' हैं इसलिए रास्ते में ही अपने ख़ासमख़ास से पूछ लिया कि- ''समोसे वाले के यहाँ अपने रसोइये भेज कर हाइजीनिक समोसे बनवा के रखे या नहीं?''
जवाब से संतुष्ट ना हुए और खुद ही रसोइये से बात कर उसपर उपकार किया. उसको बोला कि- ''किसी तरह की गड़बड़ नहीं होनी चाहिए समोसे खाकर, कल एक और दौरे पर जाना है ना. तुम्हारे साथ फोटो भी निकलवा लेंगे अगर अच्छे बने तो.''
असल में वे अपने बेशकीमती जीवन के साथ कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे.
गाँव पहुँचते ही चश्मा उतारा गया, नेता जी गाँव के बड़े-बुजुर्गों से मिले और फिर श्रमदान स्थल पर पहुंच गए. लेकिन ये क्या उफ्फ्फ आज धूप इतनी कम.... खैर उसका भी इंतज़ाम हो गया मिनरल वाटर से नेताजी के कपड़ों और चेहरे पर पसीने का मेकअप किया गया(आखिर मेकअप वोमेन को साथ में लाना व्यर्थ नहीं गया).

नेता जी के आगे-पीछे मजदूर और बीच में नेता जी. अब मिट्टी डालने का शुभकार्य प्रारंभ हो गया और मीडिया जो कि घंटों से इस ऐतिहासिक क्षण की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी जल्दी जल्दी नेता जी के कई कोणों से पोज लेने में लग गई.
वहाँ से निपटकर काफिला आगे बढ़ा और 'सुनिश्चित' समोसे की दुकान पर 'अचानक' रुका. लेकिन हाय किसी ने ध्यान ही नहीं दिया उनकी तरफ... सिवाए समोसे वाले के, जिसे पहले से सब ज्ञात था. काफिले में से ही एक चमचा चिल्लाया- ''अरे इतना बड़ा नेता इतनी छोटी और 'अनहाइजीनिक' दुकान पर समोसे खा रहा है, कितने बड़े दिलवाला है, हमारा सच्चा हितैषी है. हमारी ही तरह का है.'' और जिंदाबाद के नारे लगने शुरू हो गए.
मीडिया तो पहले ही पीछे लगी हुई थी. वहाँ भी २-३०० फोटो निकाल डाले.

अब शाम को दलित बस्ती के एक सबसे साफ़ मगर फिर भी डेटोल से ४ बार धोये गए घर में नेता जी पहुंचे. परिवार की धुली-पुंछी वयोवृद्ध मुखिया के साथ फोटोशेसन चला. शाम को पास के ही पञ्च सितारा होटल से मंगवाया गया खाना साफ़ से बर्तनों में उड़ेल कर बाहर लाया गया और मीडिया के सामने किसी ने पीछे से कहा- ''देखिये दलितों के घर का खाना खा रहे हैं, क्या देवता स्वरुप आदमी हैं!!'' नेता जी फिर जिंदाबाद हुए.
इसी तरह रात में सारे काफिले और मीडिया के साथ उसी परिवार के साथ रात गुजारी.
सुबह तडके काफिला वापस कार्यालय की तरफ रवाना हो गया. कुछ देर में एस.पी. और डी.एम्. की गाड़ियां उस हरिजन के घर पहुँची जहाँ नेता जी रुके थे. सब ठीक तरह से संपन्न हो गया.

आज के अधिकाँश अखबार तो उनकी तारीफों में रंगे हुए थे. लेकिन पता नहीं क्यों मीडिया का एक वर्ग नाराज़ हो गया, जिसने कि उनके श्रमदान में कमियाँ निकालते हुए तस्वीर निकाल दी. बेवजह खबर को उछाला और कहा गया कि श्रमिक के हाथ में लोहे का तसला था और नेता जी के में प्लास्टिक का, श्रमिक के तसले में ऊपर तक पत्थर-मिट्टी भरी थी जबकि नेता जी का खाली था. यही तुलना उनके स्पोर्ट्स शूज और मजदूर की चप्पलों में हुई. हद हो गई शराफत की.. बेचारेनेताजी ने इतना सब किया इस बेदर्द जनता के लिए और नतीजा क्या मिला?'' खैर नेता जी ने तुरत-फुरत अगले कार्यक्रम के लिए नया तसला, जो कि प्लास्टिक का हो लेकिन दिखने में लोहे का लगे, बनवाने का ऑर्डर दे दिया साथ ही कुछ और थर्माकोल के रंगीन पत्थर जो असली से कहीं कमतर ना हों. आखिर में उस अखबार के हेड आफिस फोन लगा कर उसके चीफ को नेता जी के साथ डिनर पर आमंत्रित किया गया.

दीपक 'मशाल'

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. अब सिर्फ़ एक सप्ताह का समय ही शेष बचा है आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

20 comments:

  'अदा'

25 April 2010 at 05:32

वाह वाह वाह ...!!
दीपक को देख कर कितनी ख़ुशी हुई है मुझे... ये बयान नहीं कर सकती....
सर्वगुण संपन्न है दीपक...
हज़ारों दुआएं और ढेर सारा आशीर्वाद है दीपक को...
दीदी..

  Udan Tashtari

25 April 2010 at 05:55

दीपक चौरसिया 'मशाल'जी का वैशाखनन्दन सम्मान प्रतियोगिता में स्वागत है. इस बेहतरीन कथा के लिए बधाई.

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

25 April 2010 at 06:11

सुन्दर आलेख!
दीपक "मशाल" जी को बधाई!

  M VERMA

25 April 2010 at 06:21

करारा व्यंग्य
दीपक जी को बधाई

  पी.सी.गोदियाल

25 April 2010 at 06:23

Sundar vyangy. kaash ki daure par nikalne se pahle hee netaa ji ko dauraa pad jaataa.

  विनोद कुमार पांडेय

25 April 2010 at 07:52

वाह दीपक जी अभी तक आपकी कविताएँ पढ़ी थी आज एक नया अंदाज बेहद पसंद आया...बहुत खूब लिखे है....बढ़िया व्यंग के लिए धन्यवाद

  Sonal Rastogi

25 April 2010 at 09:14

बढिया व्यंग , वैसे भी ये नेताओ की ओउटिंग का बहाना है ..थोडा पसीना बहता है तो सिक्न ग्लो करती है नहीं मानते तो नेताजी का चेहरा देख लीजिये

  ललित शर्मा

25 April 2010 at 11:42

बहुत बढिया दीपक भाई

बधाई

  अजय कुमार झा

25 April 2010 at 14:07

हा हा हा नेताजी के दौरे को खूब दौडाया दीपक ने । बहुत बढिया व्यंग्य । ताऊ मैंने भी एक प्रविष्टि तैयार कर ली है आज ही भिजवाता हूं कही तारीख निकल गई तो ठन ठन गोपाल हो जाऊंगा ॥

  गिरीश बिल्लोरे

25 April 2010 at 14:43

दीपक जी
बधाई
बहुत खूब

  Ram Krishna Gautam

25 April 2010 at 15:09

Very Good Deepak ji...




Shubhkaamnayen TAAU...



"RAMKRISHNA"

  श्यामल सुमन

25 April 2010 at 15:56

एक सुन्दर पोस्ट और ये बेमिसाल सम्मान - बधाई दीपक जी।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

  Tej Pratap Singh

25 April 2010 at 16:18

दीपक जी को बधाई!...

  खुशदीप सहगल

25 April 2010 at 17:27

भ्रष्टाचार की डगर पे नेतापुत्रों दिखाओ चल के,
ये देश है तुम्हारा, कल खा जाना इसी को तल के...

जय हिंद...

  दीपक 'मशाल'

25 April 2010 at 18:10

Taau ji aur aap sabka hriday se aabhari hoon.

  Shobhna Choudhary

25 April 2010 at 21:12

सच्चाई बयां करती रचना

  शेफाली पाण्डे

25 April 2010 at 22:02

badhiya vyangya kiya hai deepak ji ne ..badhaai

  डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

25 April 2010 at 23:44

Z+++ सुरक्षा तुम्हारे नेताओं को ही मिल सकती है............... अच्छा है.....
गद्य में भी पद्य जैसी पकड़..
खुश रहो....शुभाशीष
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

  संजय कुमार चौरसिया

27 April 2010 at 17:50

दीपकजी आपको बहुत बहुत बधाई ,

इस व्यंग रचना के बारे मैं , मैं क्या कह सकता हूँ , मेरे पास तो शब्द ही नहीं है ,

मैं पहले भी कहता आया हूँ , तुसी ग्रेट हो पाजी ,

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