वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री राम त्यागी

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है. जिसके अंतर्गत आप नित्य विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं यहां पढ पा रहे हैं.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

आज श्री राम त्यागी की रचना पढिये.


लेखक परिचय
नाम : राम त्यागी
Location: Chicago (Native - Morena) : IL (Native - MP) : United States
ब्लाग : मेरी आवाज

मुरैना , ग्वालियर और मध्य प्रदेश के विभिन्न गावों और शहरों में बचपन और विद्यार्थी जीवन के अनमोल वर्ष गुजारने के बाद, दिल्ली , सिंगापुर जैसे अन्य महानगरो और देशो से गुजरते हुए आजकल अमेरिका के चिकागो के पास के एक कस्बे में कुछ सालो से डेरा डाले हुआ हूँ. मेरी नौकरी को मेहनत और लगन से कर रहा हूँ पर मेरा मन कहता है की जल्दी से छोड़ो कुछ और शार्थक करो, स्वच्छ राजनीतिक जीवन जीने का सपना है और लोगो के बीच रहकर उनके लिए काम कराने की तमन्ना है, लिखने और पड़ने में (विशेषकर भारत के बारे में) बहुत लगाव है, इसलिए ब्लॉग की दुनिया में आपके साथ हूँ. संयुक्त परिवार से आता हूँ, हिन्दी, हिंदुस्तान और भारतीय संस्कृति मेरे अभिन्न अंग है.


अरे भाई क्यों गाली देते हो ?

दुनिया वालों को भारत के सरकारी तंत्र से इतना शिकायत क्यों है , हम लोग हमेशा अपने मंत्री और संत्री लोगो को गाली देते रहते है, पर क्या कभी सोचा है उनकी मेहनत के बारे में ? इस बात को मेने तब अनुभव किया जब एक बहुत ही विद्वान दोस्त ने मेरी आँखों पर पड़े परदे को हटाकर मुझे वास्तविकता से परिचय कराया, में मूर्ख बहस करने बैठ गया कि अगर कोई चोरी से या भ्रष्ट होकर पैसा कमाए तो ऐसा करके देश के विकास से खिलवाड़ है , पर अब में ये नहीं कह सकता , अरे भाई उनको भी तो सुनो जो ऐसा करके निम्नलिखित रूप से देश की अर्थव्यवस्था को प्रगति के सोपान दे रहे है -

१। अगर ये दो नंबर की कमी न करेंगे तो इनके बच्च्चे और बीबी (यां) मल्टीप्लेक्स में जाकर कैसे सामान खरीदेंगे ? गाँव में कोई मल्टीप्लेक्स क्यों नहीं खोलता ? हर कोई वही क्यों खोल रहा है जहाँ पर ऐसे लोग रहते है ? इसका मतलब ये लोग आज की प्रगति के सच्चे जिम्मेदार लोग है.

२। शादियाँ इतनी रंगीन और आलिशान कैसे होंगी फिर ? आजकल शादियाँ इतनी आलिशान इसलिए ही है क्यूंकि हमारा प्रजातंत्र बहुत योजनाये लेकर आ रहा है, और जितनी योजनाये , उतना ही बचत सरकारी कर्मचारियों के लिए २ नंबर की कमाई से, और उतना ही पैसा शादी के खर्च में लगा सकते है, जिससे अर्थव्यवस्था का चक्र चलता रहता है. नहीं तो बैंड की और हलवाई की दुकाने ही बंद हो जायेंगी.

३। पेमेंट वाली सीटो के कॉलेज खुल रहे है क्यूंकि दो नंबर का पैसा है तो क्या टेंशन है बच्चा पढे या नहीं, कही न कही तो जुगाड़ हो ही जायेगी. कॉलेज खुलेंगे तो आसपास के क्षेत्र का भी विकास होगा, इसका मतलब इन लोगो का ये योगदान भी अभूतपूर्व है.

४। रिश्वत की कमाई के लिए इन लोगो को भी बहुत कुछ करना पङता है, जैसे फाइलो में हेराफेरी , साईट पर जाओ तो कर्मचारियों या फिर सामान की संख्या में हेराफेरी, बॉस की कमीशन की जुगाड़, आदि आदि , ये सब करने में भी मेहनत लगता है.

५। शायद हम इसलिए इन लोगो की बुराई करते है क्यूंकि हम इस काबिल ही नहीं की ऐसी चतुराई से काम कर सकें -)

इन सब कारणों को देखते हुए, ये सत्य है ये लोग भी आज के तथाकतित प्रगतिशील भारत के विकास में जिम्मेदार है। पर ये इससे भी बड़ा सत्य है भारत की ७० प्रतिशत जनता अभी भी प्रगति से अछूते उन गांवों में रहती है जहाँ बिजली आती कभी कभी है , जाती तो हर समय है, जहाँ पर रोड कभी पूरी बन नहीं पाती, पुल टूटे ही पढे रहते है, ५० प्रतिशत जनता के लिए अच्छे अस्पताल और विद्यालय नहीं है. जहाँ आज भी लोग हर साल हर कोने में भूख से आत्महत्या कर रहे है और फिर भी वोट डाले जा रहे है उन निकम्मे लोगो को जो सिर्फ देश सेवा और जन सेवा के नाम पर परिवार सेवा को ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते है और जिन्होंने इमानदारी और देश प्रगति की बातो को सिर्फ फाइलो की सुन्दरता का अभिप्राय बना रखा है.
जय हिंद को हमने नारा तो बना दिया पर जीवन का सिद्धांत बनाना भूल गए. 'नर हो न निराश करो मन को' के भरोसे हम जैसे लोग भी बस गाली देते रहते है और सर्कस देखते रहते है, करते कुछ नहीं. एक साक्षात्कार में हमारे राजदीप सरदेसाई जी बोलते है कि "जिस दिन कही विस्फोट हो जाए और आप उस शहर में तो इससे बड़ा दिन पत्रकार के लिए कुछ नहीं" ...कैसी मानसिकता है ये ?

जरुरी सूचना :-


सभी माननिय प्रतिभागी रचनाकारों को विनम्रता पूर्वक सूचित किया जाता है कि हमारे पास जिस क्रम में रचनाए आई हैं हम उन्हें उसी क्रम में छाप रहे हैं. जिनका भी सहमति पत्र मांगा गया है उनकी रचनाएं प्रतियोगिता में शामिल की गई हैं. जिनके सहमति पत्र आ चुके हैं उन सभी की रचनाएं क्रमवार प्रकाशित की जारही हैं. अभी प्रतिभागी रचनाकारों की सिर्फ़ प्रथम रचना ही छापी जा रही हैं. जिनकी एक से ज्यादा रचनाएं आई हैं उनका प्रकाशन अगले दौर में किया जायेगा.

इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तिथी ३० अप्रेल २०१० है. आपसे निवेदन है कि अपनी रचनाएं निर्धारित तिथी के पुर्व ही भिजवाने की कृपा करें. ३० अप्रेल २०१० के बाद आई हुई रचनाएं स्वीकार नही की जायेंगी.

- वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता कमेटी

7 comments:

  दीपक 'मशाल'

28 April 2010 at 05:14

Shree Ram Tyagi ji ka swagat hai.. ek behatreen vyangya rachne ke liye badhai bhi..

  राम त्यागी

28 April 2010 at 05:44

Thanks for posting my entry !!

  Udan Tashtari

28 April 2010 at 06:33

हा हा!! बहुत सटीक और मजेदार.

वैशाखनंन्दन सम्मान प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए बधाई.

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

28 April 2010 at 08:53

बहुत सुन्दर रचना है! राम त्यागी जी को बधाई और ताऊ श्री का आभार!

  ललित शर्मा

28 April 2010 at 08:56

व्यंग्य रचना के लिए
बहुत बहुत बधाई राम त्यागी जी

राम राम

  विनोद कुमार पांडेय

28 April 2010 at 09:54

मजेदार व्यंग..वैशाखनंदन प्रतियोगिता में स्वागत है...बधाई

  निर्मला कपिला

28 April 2010 at 14:54

RAAM TYAGI JEE KAA VYANG BAHUT ACHHA LAGAA. UNHEN BADHAAI AUR TAU JI AAPAKO RAAM RAAM KAI DIN BAAD AANE KE LIYE MAAFI CHAHATEE HOON JUNE ME HEE REGULAR HO PAAOONGEE. SHUBHAKAAMANAAYEN

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