वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री संगीता पुरी

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये आखिरी दिन है. इस प्रतियोगिता में आप सभी का अपार स्नेह और सहयोग मिला बहुत आभार आपका.

जिन मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हुई हैं और जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. अब तक ताऊजी डाट काम पर सभी प्रतिभागियों की प्रथम रचना प्रकाशित की जारही थी. अब कुछ ही प्रथम रचनायें शेष बची हैं. कल से प्रथम बची हूई रचनाओं और अगले दौर की रचनाओं का प्रकाशन सुबह शाम होगा.

हमने बहुत बारीकी से देखकर सभी रचनाओं का प्रकाशन किया है. फ़िर भी आप सम्माननिय प्रतिभागियों से निवेदन है कि अगर हमारी त्रुटीवश आपकी रचना का प्रकाशन शेष रह गया हो तो अविलंब सूचना देने की कृपा करें जिससे उन रचनाओं को प्रकाशित किया जा सके. हम आपके आभारी रहेंगे.

आपसे पुन: विनम्र निवेदन है कि इस प्रतियोगिता मे रचनाएं भेजने का आज आखिरी दिन है. अत: जो भी अपनी रचना भेजना चाहें आज भिजवाने की कृपा करें.

आज सुश्री संगीता पुरी की रचना पढिये.

लेखिका परिचय
नाम : संगीता पुरी
जन्म 19 दिसम्‍बर 1963 को झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत ग्राम - पेटरवार में हुआ।
रांची विश्‍वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में 1984 में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री ली।

उसके बाद झुकाव अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित
की गयी ज्‍योतिष की एक नई शाखा गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की ओर हुआ और सब कुछ
छोडकर इसी के अध्‍ययन मनन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। गत्‍यात्‍मक
ज्‍योतिष पर आधारित अपना साफ्टवेयर भी वे बना चुकी हैं।

सितम्‍बर 2007 से ही ज्‍योतिष पर आधारित अपने अनुभवों के साथ ब्‍लागिंग
की दुनिया में हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन करती आ रही हैं।
ज्‍योतिष पर आधारित एक पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: ग्रहों का
प्रभाव' 1996 में प्रकाशित हो चुकी है।

ब्‍लॉग : गत्यात्मक ज्योतिष और गत्यात्मक चिंतन


ग्‍लोबल वार्मिंग से लाभ ही लाभ

आज सभी पत्र पत्रिकाओं में .. चर्चा परिचर्चाओं में ग्‍लोबल वार्मिंग का
ही शोर है .. बताते हैं पृथ्‍वी गर्म होती जा रही है .. हानि ही हानि है
इससे .. चिंता का विषय बना हुआ है ये मुद्दा आजकल .. वैज्ञानिकों के
द्वारा वातावरण की वार्मिंग को कम किए जाने के लिए .. धरती को बचाने के
लिए निरंतर बैठकें की जा रही हैं .. चिंतन किया जा रहा है .. मुझे बडा
अजीब सा लग रहा है .. आखिर क्‍या हानि है .. इधर के वर्षों में सुबह से
दिनभर के रूटीन को देखूं तो .. ग्‍लोबल वार्मिंग से मुझे तो सिर्फ बचत ही
बचत .. लाभ ही लाभ नजर आ रहा है।

ग्‍लोबल वार्मिंग के फलस्‍वरूप ठंड सिकुडकर मात्र 20 या 25 दिनों का रह
गया है .. किसी तरह काटा जा सकता है .. नहाने के लिए पानी गरम करने में
होनेवाली ईंधन की बचत .. रूम हीटर या ब्‍लॉवर की कोई आवश्‍यकता नहीं ..
और न ही शरीर को गर्म बनाए रखने के लिए गर्म खानों पर माथापच्‍ची करने की
आवश्‍यकता .. मेहनत भी कम .. जाडे के महीने में भी हर जगह बचत ही बचत ..
इस समय कहीं आने जाने का झंझट छोड दो .. घर में पुराने कपडों में दुबककर
पडे रहो .. ऊनी कपडे बनवाने , खरीदने की बचत .. रजाई , कंबल आदि बनवाने ,
खरीदने का झंझट कम .. इसमें लगनेवाले समय और पैसों की बचत ।

इसके विपरीत गर्मी के दिन फैलकर छह महीने के हो गए हैं .. इन छह महीनों
में तो बचत तो तिगुनी , चौगुनी तक हो जाती है .. तापमान बढते हुए आज 48
डिग्री तक पहुंच चुका है .. ईंधन की कितनी कम जरूरत पडती है .. सबकुछ
गरमागरम .. 45 डिग्री तक स्‍वयं गरम हुए पानी को .. दुध को गैस पर चढाया
.. तुरंत उबल गए .. गरम पानी के कारण धोए गए चावल , दाल , सब्जियों तक का
तापमान स्‍वयं ही 45 डिग्री तक .. इससे गैस की सबसे अधिक बचत होती है..
सुबह के बजाय दोपहर में खाना बनाया जाए .. तो थोडी मुश्किल तो अवश्‍य हो
.. पर कम से कम एक सिलिंडर पंद्रह दिन और चल जाए।

जब ग्‍लोबल वार्मिंग न था तो पहले की गृहिणियों की परेशानी कितनी थी ..
कपडे धोए तो सुखाने के लिए छत या आंगन में जाओं .. आज धोकर घर पे ही कहीं
टांग दिए जाएं .. दो चार घंटों में कपडों को सुखना ही है .. फर्श पर पानी
गिर जाए पोछने की कोई आवश्‍यकता नहीं.. यहां तक कि बिस्‍तर पर भी पानी
गिर गया .. बाहर सूखने देने की कोई आवश्‍यकता नहीं .. तेज धूप की आंच
वहां भी आ रही है .. बिस्‍तर को कुछ ही देर में सूख ही जाना है .. डब्‍बे
में पडे सामानों के भी खराब होने का कोई झंझट नहीं .. किसी भी डब्‍बे का
सामान इस भीषण गर्मी से नहीं बच सकता .. पुरानी गृहिणियों की तुलना में
हमारे सुखी होने का राज का कारण तो ग्‍लोबल वार्मिग ही है।

गर्मी बढ गयी है तो बिजली की उपभोग तो बढेगा ही .. अब बारंबार बिजली की
कटौती .. भले ही झेलना कठिन हो .. पर बिल की बचत तो हो ही जाती है..
अत्‍यधिक गर्मी के कारण पानी की भी कमी हो गयी है .. भला मनमानी सप्‍लाई
हो भी तो कैसे .. सुबह सुबह आ जाने वाला पानी अब कम से कम दो घंटे देर से
ही आएगा.. सबलोग ब्रश करने के इंतजार में बैठे रह जाते हैं .. अब ब्रश ही
नहीं हुई .. तो चाय , नाश्‍ते सबमें कटौती होनी ही है .. सुबह सुबह कई कप
चाय की ही बचत हो जाती है .. और अधिक देर से पानी आए .. तो नाश्‍ते की भी
.. इस पानी के कारण स्‍नान में ही 12 बज जाए .. तो लोग एक ही बार खाना ही
तो खाएंगे .. गर्मी अधिक रहे तो एक बार खा भी लिया .. तो इतनी गर्मी में
पाचन संस्‍थान भी सही काम कहां कर पाएगा.. न खाना पचेगा और न भूख लगेगी
.. रात्रि में भी नाम मात्र का खाना ..खाद्यान्‍न की बचत तो होनी ही है
.. इससे कितने भूखों को खाना मिल जाए ।

ग्‍लोबल वार्मिंग का ही असर है .. कि बाजार में सब्जियों की कमी हो जाती
है .. भले ही बाजार जानेवाले मुंह लटाकाकर खाली झोला लिए वापस आते हों ..
पर पॉकेट के पैसे अवश्‍य सुरक्षित बने रहते हैं .. घर में मौजूद दूध ,
दही , बेसन , दलहन और चने मटर आदि का उपयोग कर भी तो घर चलाया जा सकता है
.. गृहिणी को भी आराम ही आराम .. हरी साग सब्जियां बीनने , छीलने, काटने
में लगने वाले समय की पूरी बचत .. ऐसे में गृहिणियों के समय की जो बचत
होगी .. उसमें वह अपनी रूचि का कोई काम कर सकती हैं .. इसी कारण तो महिला
ब्‍लॉगर प्रतिदिन अपना ब्‍लॉग भी अपडेट कर लेती हैं .. पर इतने तरह की
बचत और लाभ के बावजूद भी वैज्ञानिक ग्‍लोबल वार्मिंग पर चिंतित होकर
सेमिनार किए जा रहे हैं .. कहीं ग्‍लोबल वार्मिंग से पृथ्‍वी को छुटकारा
मिल जाए .. तो महिलाओं की समस्‍याएं कितनी बढ जाएंगी ..।

13 comments:

  M VERMA

30 April 2010 at 05:25

चलो ग्लोबल वार्मिंग के लाभ भी पता चल गये.
बहुत बढिया

  Udan Tashtari

30 April 2010 at 07:14

संगीता जी का स्वागत है इस प्रतियोगिता में..आलेख के लिए बधाई.

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

30 April 2010 at 07:22

बहुत सुन्दर रचना!
संगीता पुरी जी को बधाई!

  विनोद कुमार पांडेय

30 April 2010 at 08:09

फिर तो ग्लोबल वॉर्मिंग बड़े काम की चीज़ है...बढ़िया रचना..बधाई

  रंजन

30 April 2010 at 08:19

जय हो... बड़े फायदे की बात है ये तो..

  ललित शर्मा

30 April 2010 at 08:55

संगीता जी,
ग्लोबल वार्मिंग के सकारात्मक पहलु को दर्शाते हुए
बहुत ही अच्छा व्यंग्य।

शुभकामनाएं

  वाणी गीत

30 April 2010 at 10:48

ग्लोबिंग वार्मिंग के लाभ हमें तो पता ही नहीं थे...बेवजह पेड पौधे लगा कर इसे कम करने का प्रयास करते रहे इतने दिनों तक ...:)

व्यंग्य अच्छा रहा

  sangeeta swarup

30 April 2010 at 12:15

इस तरह तो सोचा ही नहीं था...काफी लाभदायक बाते हैं....अच्छा व्यंग है

  रेखा श्रीवास्तव

30 April 2010 at 16:09

जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.

सही कहा न, अगर अच्छाई का चश्मा चढ़ा कर देखा तो फायदे ही फायदे नजर आये, अभी बाकी लोगों को ये चश्मा बनवाना शेष है.
आपने तो आँखें ही खोल दी. ये ग्लोबल वार्मिंग अब वरदान नजर आ रही है.
--

  Ram Krishna Gautam

30 April 2010 at 16:34

Best Of Luck...



"RAM |<"

  pratibha

30 April 2010 at 17:14

ग्लोबल वार्मिंग को इस नजरिए से कभी देखा ही नहीं...धन्यवाद ग्लोबल वार्मिंग के दूसरे पहलू से परिचित कराने के लिए...।

  अल्पना वर्मा

30 April 2010 at 20:51

रोचक !
आप की लेखनी का ये रूप भी भाया.

  'अदा'

30 April 2010 at 21:03

बहुत सुन्दर रचना!
संगीता पुरी जी को बधाई!

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