वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : श्री M VERMA

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,

हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई हैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित कर दिया गया है. ताऊजी डाट काम पर हमने प्रतियोगिता में शामिल रचनाओं का प्रकाशन शुरु कर दिया है जिसके अंतर्गत आज श्री M Verma की रचना पढिये.

आपसे एक विनम्र निवेदन है कि आप अपना संक्षिप्त परिचय और ब्लाग लिंक प्रविष्टी के साथ अवश्य भेजे जिसे हम यहां आपकी रचना के साथ प्रकाशित कर सकें. इस प्रतियोगिता मे आप अपनी रचनाएं 30 अप्रेल 2010 तक contest@taau.in पर भिजवा सकते हैं.

लेखक के शब्दों में उनका परिचय :-
मेरा संक्षिप्त परिचय :
नाम : M Verma
मेरा जन्म वाराणसी के एक कृषक परिवार में हुआ। सम्पूर्ण शिक्षा वाराणसी में हुई (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए.(हिन्दी), बी. एड.)। शुरू से ही कविताओं का शौक रहा। साथ ही नाटकों में भाग भी लेते रहे। ऊहापोह की जिन्दगी और शादी, फिर बच्चे और अंततोगत्वा दिल्ली में ‘राजकीय विद्यालय’ में अध्यापक बन बैठे। बच्चों के बीच बच्चा बन जाने की आदत छोड़े नहीं छूटती जिसके कारण गुरूत्तर शिक्षकीय दायित्व को मजे लेकर निभा रहे हैं। थियेटर का शौक अभी भी जिन्दा है। कभी-कभार नाटकों में भाग लेते रहते हैं। ‘जश्ने बचपन’ में ‘नीली छतरी’ में अभिनय करना मेरे लिए अविस्मरणीय बन गया है। कविताएँ लिखना बदस्तूर जारी है। मैने भोजपुरी रचनाएँ भी लिखी। दिल्ली में हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित ‘रामायण मेले’ में भोजपुरी रचना पुरस्कृत हो चुकी है। हिन्द युग्म में जनवरी मास में मेरी कविता प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी है.

ब्लाग : जज्बात और यूरेका
email. : hamara8829@hotmail.com

सात्विक गुण : मूर्खता

मूर्खता एक सात्विक गुण है, जिसे धारण करने से अपमान की सम्भावना कम हो जाती है. याद रखें अपमानित सदा विद्वत्ता का दुर्गुण धारण करने वाले ही होते हैं. यह अनुवांशिक भी हो सकती है और अर्जित भी. मेरा यह आलेख अनुवांशिक रूप से मूर्खता धारण करने वालों के लिये नहीं है वरन उनके लिये है जो अर्जित मूर्खता के अभिलाषी हैं.

विकीपीडिया भी असमर्थ है इसे परिभाषित करने में :

This article does not cite any references or sources.

इसकी परिभाषा मिले न मिले इससे हर कोई परिचित जरूर होगा. इसे धारण करने से आप कई समस्याओं से निजात पा सकते है या लाभान्वित हो सकते है :

1. आपने अक्सर सुना ही होगा अरे ! वह तो मूर्ख है उसकी बात का क्या बुरा मानना. जिसके कारण कोई आपकी बात का बुरा न माने तो वह गुण अर्जित करने में क्या बुराई हो सकती है?

2. विद्वानों के मुख से विद्वत्ता की बातें आम बात है, पर मूर्खता गुण धारण करने वाला अगर भूल से विद्वत्ता की बात कर दे तो बल्ले-बल्ले.

3. कठिन कार्यों से निजात मिल जाती है, क्योंकि मूर्खों से कोई कार्य नहीं करवाना चाहता है.

4. दो मूर्ख (सात्विक) जब मिलते है तो मूर्खता की एक नई किस्म तैयार होती है.

5. दिमागी तनाव अधिकांश बीमारियों का कारक है, मूर्खता गुण धारण करने वाले दिमागी तनाव की स्थिति में नहीं आते इसलिये तमाम बीमारियों से बचे रहते हैं.

5.इसके अलावा और भी अनेक गुण हैं जो स्वत: ही इस गुण को धारण करने के पश्चात उजागर हो जायेगी.

यदि मैं इसके गुण गिनाता रहा तो इसे अर्जित करने का उपाय रह जायेगा. इस अर्जित करना उतना कठिन नहीं है जितना इसे लम्बे समय तक धारण करना. एक नितांत निरीह प्राणी जिसे सभ्य संसार गधा कहता है; हमारा प्रेरणा स्रोत हो सकता है. फिर भी कुछ उपाय निम्नवत हैं

  1. प्रथमत:, अपने स्वरूप को थोड़ा सुधार करके हम इस गुण को प्रदर्शित कर सकते हैं. एक सर्वेक्षण कहता है : 75 प्रतिशत पुरूष, महिलाओं के सौन्दर्य को प्रधानता देते हैं जबकि 75 प्रतिशत महिलायें पुरूष सौन्दर्य का आकलन उसके बाह्य स्वरूप से नहीं बल्कि, आंतरिक विवेक, बुद्धि और मानसिक स्थिति से करती हैं. अत: स्वरूप निर्धारण भी महत्वपूर्ण पहलू है.
  2. जब कभी विद्वत्ता की बातें हों तो शरीक अवश्य हों पर ऐसा प्रदर्शित करें कि कुछ समझ में आया ही नहीं और सही व्यक्तव्य जानते हुए भी अनर्गल व्यक्तव्य जारी करें.
  3. पानी से आधा भरा गिलास आपको आधा भरा नज़र नहीं आना चाहिये वरन वह आधा खाली नज़र आना चाहिये.


  1. याद रखें गंजापन नहीं नज़र आना चाहिये, क्योकि गंजापन बुद्धिमानी का लक्षण माना जाता है. इसके लिये या तो विशेष प्रकार का टोपी पहनना चाहिये या बाल ट्रांसप्लांट करवा लेना चाहिये.
  2. दिन में कई बार नीचे के चित्र जैसा मुँह गोल कर लेना चाहिये. यह आपके प्रति लोगों की धारणा बदलने में सहायक होगा

कहने को और भी बहुत कुछ था पर क्या करूँ इस चक्कर में कहीं मैं मूर्खता से वंचित करार न दे दिया जाऊँ.

वैधानिक चेतावनी : अतिशय मूर्खता प्रदर्शित करने से आप मूर्ख भी हो सकते हैं.

M Verma


23 comments:

  Udan Tashtari

11 April 2010 at 06:13

हा हा! बहुत मजेदार!!

आनन्द आ गया.

एम वर्मा जी को बहुत बधाई.

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

11 April 2010 at 06:40

वैधानिक चेतावनी : अतिशय मूर्खता प्रदर्शित करने से आप मूर्ख भी हो सकते हैं.

इस वैधानिक चेतावनी के साथ
वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में
श्री M VERMA को पढ़कर
और जानकर अच्छा लगा!

  Suman

11 April 2010 at 07:31

nice

  Razia

11 April 2010 at 07:33

मूर्खता से निज़ात पाने के भी उपाय बता देते.
बेहतरीन व्यंग्य.

  वाणी गीत

11 April 2010 at 07:47

इसीलिए विद्वतापूर्ण टिप्पणी करने के बाद भी हम खुद को मूर्ख ही मां लेते हैं ...
आपकी वैधानिक चेतावनी पर ध्यान देना होगा ...
आभार ...!!

  घटोत्कच

11 April 2010 at 08:08

दो मूर्ख (सात्विक) जब मिलते है तो मूर्खता की एक नई किस्म तैयार होती है.

बहुत अच्छे

जय भीम

  sangeeta swarup

11 April 2010 at 09:37

मूर्खता के गुणों के बारे में नयी जानकारी मिली :):)

  अल्पना वर्मा

11 April 2010 at 11:32

यह लेख मात्र व्यंग्य ही नहीं अपरोक्ष रूप से कुछ सीखा भी गया.
यह प्रस्तुति प्रभावी रही.
खास कर यह चेतावनी काबिले तारीफ है.-'अतिशय मूर्खता प्रदर्शित करने से आप मूर्ख भी हो सकते हैं.':D
****बधाई .

  Ekta

11 April 2010 at 11:40

बहुत सुन्दर व्यंग्य

  P.N. Subramanian

11 April 2010 at 11:44

मूर्खता तो पारिभाषिक और महिमा मंडित करने के लिए बधाई.

  Mahfooz Ali

11 April 2010 at 13:03

arey! bahut sahi........aaaa......ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha.... mazaa gaya....

  M VERMA

11 April 2010 at 13:53

@ Mahfooz ali
mazaa gaya.... या mazaa aaya....

  प्रकाश गोविन्द

11 April 2010 at 14:58

बेहतरीन व्यंग्य

बहुत-बहुत बधाई

  पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

11 April 2010 at 15:16

कुछ समझ में नहीं आया...खैर एक बार फिर से पढ के देखते हैं :-)
लाजवाब्! आनन्ददायक! प्रेरणादायक!.....!
बधाई वर्मा जी!!

  अविनाश वाचस्पति

11 April 2010 at 17:28

इस समस्‍त प्रवचन से सिद्ध होता है कि मूर्खता सदैव कल्‍याणकारिणी है। इसलिए मूर्ख ही बने रहें। वैसे बनना उनको पड़ता है जो होते नहीं हैं, हमें बनने की कोनो जरूरत नाहीं। मूर्खमन से स्‍वीकार रहे हैं।

  वन्दना

11 April 2010 at 19:57

हा हा हा…………मज़ा आ गया………………।बडे फ़ायदे है मूर्खता के तो।

  विनोद कुमार पांडेय

11 April 2010 at 21:03

वर्मा जी इस खूबसूरत व्यंग से आपने दिल जीत लिया..बेहतरीन रचना बधाई हो

  Jyoti

12 April 2010 at 08:18

दिमागी तनाव अधिकांश बीमारियों का कारक है, मूर्खता गुण धारण करने वाले दिमागी तनाव की स्थिति में नहीं आते इसलिये तमाम बीमारियों से बचे रहते हैं...........

बेहतरीन व्यंग्य......

  sumit

12 April 2010 at 20:53

aji murkho ke bare me likhan kaha tak murkhata nahi hai

  मो सम कौन ?

13 April 2010 at 01:33

छा गये वर्मा जी, प्वाईंट नं. पांच में हमने एक और एडीशन कर दिया है, मुंह गोल करके सीटी बजाकर ’आल ईज़ भेल’ गाने से मनोवांछित परिणाम और भी शीघ्र प्राप्त होंगे।

बहुत अच्छी रचना
मज़ा आ गया।
आभार

  संजय भास्कर

13 April 2010 at 08:13

मूर्खता से निज़ात पाने के भी उपाय बता देते.
बेहतरीन व्यंग्य.

  कमलेश वर्मा

13 April 2010 at 21:21

VERMA JI, IS LEKH KO PADH KAR MAZA TO AAYA HI ..SATH MOORKHTA BHI AK SADGUN KI TARAH LAGNE LAGI ..GURUJAN TO GURUJAN HI HOTE HAIN ,UNKI BARABARI KOI BHI NAHI KAR SAKTA ...SADHUWAD AAPKO...UTTAM AVM SARAL..BADHAYEE

  चंदन कुमार झा

13 April 2010 at 23:44

बहुत ही आंनद आया इस पोस्ट को पढ़कर, और मूर्खता अर्जित करने की अभिलाषा प्रबल हो उठी :)

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