वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री देवेंद्र कुमार पांडेय

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
सभी प्रतिभागियों का वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये हार्दिक आभार. इस प्रतियोगिता में सभी पाठकों का भी अपार स्नेह और सहयोग मिला, बहुत आभार आपका.

कुछ मित्रों की इंक्वायरी उनके शेष बचे आलेखों के बारे में आती रहती हैं. उनसे निवेदन है कि उनकी शेष रचनाएं क्रमश: प्रकाशित होंगी. अगर कोई रचना किसी त्रुटीवश नही मिल रही होगी तो आपसे इमेल द्वारा संपर्क किया जायेगा.

अब इस पोस्ट में श्री देवेंद्र कुमार पांडेय की रचना पढिये.

लेखक परिचय :
नाम : देवेन्द्र कुमार पाण्डेय
उम्र : 47, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

जड़-चेतन में अभिव्यक्त हो रही अभिव्यक्ति को समझने के प्रयास और उस प्रयास को अपने चश्में से देखकर आंदोलित हुए मन की पीड़ा को खुद से ही कहते रहने का स्वभाव जिसे आप "बेचैन आत्मा" कह सकते हैं।

ब्लाग : बेचैन आत्मा


वणिकोपदेश

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
जरूरत से ज्यादा कहीं जल न जाए।

मुद्रा पे हरदम बको ध्यान रखना
करो काग चेष्टा कि कैसे कमायें
बनो अल्पहारी रहे श्वान निंद्रा
फितरत यही हो कि कैसे बचाएं

पूजा करो पर रहे ध्यान इतना
दुकनियाँ से ग्राहक कहीं टल न जाए।

दिखो सत्यवादी रहो मिथ्याचारी
प्रतिष्ठा उन्हीं की जो हैं भ्रष्टाचारी
'लल्लू' कहेगा तुम्हे यह ज़माना
जो कलियुग में रक्खोगे ईमानदारी।

मिलावट करो पर रहे ध्यान इतना
खाते ही कोई कहीं मर न जाए।

नेता से सीखो मुखौटे पहनना
गिरगिट से सीखो सदा रंग बदलना
पंडित के उपदेश सुनते ही क्यों हो
ज्ञानी मनुज से सदा बच के रहना।

करो पाप लेकिन घडा भी बड़ा हो
मरने से पहले कहीं भर न जाए।

6 comments:

  M VERMA

1 May 2010 at 05:16

करो पाप लेकिन घडा भी बड़ा हो
मरने से पहले कहीं भर न जाए।
संत वचन
अमल करेंगे आपके बताये मार्ग का
मस्त

  विनोद कुमार पांडेय

1 May 2010 at 07:28

देवेन्द्र जी बेहतरीन..वहीं पुराने अंदाज में हास्य से लबरेज एक बढ़िया कविता.. हम ज़रूर ध्यान देंगे और आप भी ध्यान दीजिए गा..दिए का...हा हा हा मजेदार और भाव भी लाज़वाब....बधाई

  Udan Tashtari

1 May 2010 at 08:05

बहुत सही..

देवेन्द्र जी का वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे स्वागत है.

  sangeeta swarup

1 May 2010 at 13:27

:):)...आज के ज़माने की सीख देती अच्छी व्यंग रचना....

  संगीता पुरी

1 May 2010 at 20:21

नेता से सीखो मुखौटे पहनना
गिरगिट से सीखो सदा रंग बदलना
पंडित के उपदेश सुनते ही क्यों हो
ज्ञानी मनुज से सदा बच के रहना।

करो पाप लेकिन घडा भी बड़ा हो
मरने से पहले कहीं भर न जाए।
वाह !!

  दीपक 'मशाल'

2 May 2010 at 17:06

waah.. Devendra ji, kya khoob likha..

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