वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : कु. अक्षिता (पाखी)

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
सभी प्रतिभागियों का वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये हार्दिक आभार. इस प्रतियोगिता में सभी पाठकों का भी अपार स्नेह और सहयोग मिला, बहुत आभार आपका.

कुछ मित्रों की इंक्वायरी उनके शेष बचे आलेखों के बारे में आती रहती हैं. उनसे निवेदन है कि उनकी शेष रचनाएं क्रमश: प्रकाशित होंगी. अगर कोई रचना किसी त्रुटीवश नही मिल रही होगी तो आपसे इमेल द्वारा संपर्क किया जायेगा.

अब इस पोस्ट में पढिये इस प्रतियोगिता की सबसे नन्ही प्रतिभागी कु. अक्षिता (पाखी) की ये व्यंग रचना...

लेखिका परिचय :
नाम- अक्षिता
निक नेम - पाखी
जन्म- 25 मार्च, 2007 (कानपुर)
मम्मी-पापा - श्रीमती आकांक्षा - श्री कृष्ण कुमार यादव
अध्ययनरत - नर्सरी, कार्मेल स्कूल, पोर्टब्लेयर
रुचियाँ- प्लेयिंग, डांसिंग, ड्राइंग, बाल कवितायेँ पढ़ना व लिखना, ब्लागिंग
मूल निवास - तहबरपुर, आजमगढ़ (यू.पी.)
वर्तमान पता - द्वारा- श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
ई-मेल- akshita_06@rediffmail.com

ब्लॉग- पाखी की दुनिया



मिल्क पाउडर ही पी जाएँ

दूध पीना मुझे भाता
पर बड़ी परेशान हूँ
किससे मैं शिकायत करूँ
होती बड़ी हैरान हूँ .

दूध वाला ना अच्छा दूध दे
बस पानी की भरमार है
जब उससे करूँ शिकायत
रोये, महँगाई की मार है.

दूध में पानी या पानी में दूध
कुछ भी समझ ना आये
इससे अच्छा तो अब
मिल्क पाउडर ही पी जाएँ.

-अक्षिता

41 comments:

  M VERMA

2 May 2010 at 06:25

महगाई की मार है
पर आपको
दूध पीने का अधिकार है

चलो फिर पाऊडर वाला ही सही

  ललित शर्मा

2 May 2010 at 06:41

बहुत बढिया कविता है
आभार

  विनोद कुमार पांडेय

2 May 2010 at 06:49

अक्षिता जी...वैशाखनंदन प्रतियोगिता में स्वागत है..

  रंजन

2 May 2010 at 06:51

good hai ji

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

2 May 2010 at 07:08

"वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में :
कु. अक्षिता (पाखी)" का अभिनन्दन करते हुए अपना शुभाशीष देता हूँ!

  संगीता पुरी

2 May 2010 at 08:45

वाह .. बढिया !!

  Shekhar Kumawat

2 May 2010 at 09:10

pakhi ko badhai

  sangeeta swarup

2 May 2010 at 09:51

मंहगाई और मिलावट पर अच्छा व्यंग है...पाखी ...बहुत बहुत शुभकामनाएं

  Ghanshyam

2 May 2010 at 10:23

बहुत खूब अक्षिता ...मन को छू गई यह कविता...आशीष व प्यार !!

  Ghanshyam

2 May 2010 at 10:25

@ दीपक मशाल जी,

अजी आजकल टी. वी. शो में कितने छोटे-छोटे बच्चे लाइव परफार्मेंस दे रहे हैं. हो सकता है इतने क्लिष्ट शब्दों के चयन में वे दूसरों की मदद लेते हों, पर साहित्य तो भावनाओं से चलता है.

  Ratnesh

2 May 2010 at 10:26

पाखी के क्या कहने..हर जगह धूम ही धूम ....बधाई.

  Bhanwar Singh

2 May 2010 at 10:31

वाकई बच्चों की व्यथा पर सुन्दर व्यंग्य...मज़बूरी है. पाखी को शुभकामनायें.

  ersymops

2 May 2010 at 10:36

पाखी ने तो खूब कहा..अब वाकई डिब्बे वाला दूध ही चारा है.

  ersymops

2 May 2010 at 10:36

बड़ों के साथ-साथ बच्चे भी...ताऊ जी की जय हो.

  Ram Shiv Murti Yadav

2 May 2010 at 10:45

बच्चों की व्यथा को शब्द देती सुन्दर कविता..पाखी को बधाई !!

  KK Yadava

2 May 2010 at 10:52

खूबसूरत प्रयास..पाखी को आशीष व शुभकामनायें.

  अभिलाषा

2 May 2010 at 10:54

अक्षिता की ये रचना
मेरे दिल को भाई
खा लो अक्षिता
मेरी तरफ से मिठाई.

  अभिलाषा

2 May 2010 at 10:57

वैशाखनंद सम्मान प्रतियोगिता में बच्चों की सहभागिता देखकर अच्छा लगा. वाकई ये प्यारे बच्चे ही कल के भविष्य हैं. अक्षिता को उसके ब्लॉग "पाखी की दुनिया'' पर सदैव से पढ़ती-देखती आ रही हूँ. परिकल्पना ब्लागोत्सव में भी पहले दिन ही अक्षिता की प्रस्तुति देखकर मन गदगद हो गया था..फिर यहाँ..बल्ले-बल्ले.
ताऊ जी, संभव हो तो अन्य बच्चों की रचनाएँ भी प्रकाशित करें.

  Akanksha~आकांक्षा

2 May 2010 at 11:03

पाखी के मनोभावों पर जाइए और सोचिये कि क्या यही सच नहीं है. दुर्भाग्य से आज सच ही व्यंग्य बन गया है. यह समाज का अंतर्दंध है...शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई.

  अक्षिता (पाखी)

2 May 2010 at 11:14

ताऊ जी, मेरी कविता प्रकाशित करने के लिए ढेर सारा प्यार और धन्यवाद.

  Amit Kumar

2 May 2010 at 14:10

दूध में पानी या पानी में दूध
कुछ भी समझ ना आये
इससे अच्छा तो अब
मिल्क पाउडर ही पी जाएँ.

...बहुत खूब अक्षिता..करार व्यंग्य कसा है आज के समाज पर, जो अपने बच्चों को एक अदद शुद्ध दूध नहीं दे सकता.

  SR Bharti

2 May 2010 at 14:23

बहुत गहरी सोच, पाखी ! आपकी बात तो सीधे दिल को छू गयी.

  Dr. Brajesh Swaroop

2 May 2010 at 14:32

आजकल तो बच्चे काफी स्मार्ट हो गए हैं. इतनी कम उम्र में ही हर जगह दिखने लगे हैं. कोई कहता है कि बचपना छीन रहा है, तो कहीं बच्चे इसी उम्र में अपनी विलक्षण रचनात्मकता को दर्शा रहे हैं...TV चैनल्स के रियल्टी शो से लेकर ब्लागिंग तक बच्चों की अपनी समानांतर दुनिया है. इन बच्चों को यहाँ तक लाने में उनके मम्मी-पापा और परिवारीजनों का बहुत योगदान है. यहाँ नन्हीं ब्लागर पाखी की प्रस्तुति भी काफी मनभावन लगी. संचालकों को बधाई.

  Dr. Brajesh Swaroop

2 May 2010 at 14:35

..और हाँ, एक डाक्टर की नज़र से इतना अवश्य कहूँगा कि डिब्बा बंद दूध स्वस्थ्य के लिए बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता. इसका इस्तेमाल मज़बूरी में ही किया जाय.

  Shahroz

2 May 2010 at 14:37

दूध पीना मुझे भाता
पर बड़ी परेशान हूँ
किससे मैं शिकायत करूँ
होती बड़ी हैरान हूँ ।

...परेशान तो मैं भी हूँ पाखी. अब किससे कहें...लाजवाब रचना.

  raghav

2 May 2010 at 14:45

वाह पाखी! बहुत खूब! लाजवाब! हर एक शब्द दिल को छू गयी! बेहद सुन्दर और भावपूर्ण व्यंग्य रचना!

  raghav

2 May 2010 at 14:45

वाह पाखी! बहुत खूब! लाजवाब! हर एक शब्द दिल को छू गयी! बेहद सुन्दर और भावपूर्ण व्यंग्य रचना!

  शरद कुमार

2 May 2010 at 14:53

दूध वाला ना अच्छा दूध दे
बस पानी की भरमार है
जब उससे करूँ शिकायत
रोये, महँगाई की मार है।
....मेरा दूध वाला भी यही कहता है पाखी. उसे मैं तुम्हारी इस कविता के बारे में जरुर बताऊंगा.

  डाकिया बाबू

2 May 2010 at 15:02

यह तो वाकई सोचने वाली बात है..गंभीर सवाल !!

  Rashmi Singh

2 May 2010 at 15:14

बच्चों के मन की अंतर्वेदना का भावपूर्ण चित्रण..शानदार है.

  Rashmi Singh

2 May 2010 at 15:14

पाखी ममा से कहो कि ममा मुझे काजल का टीका लगा दो ..नही तो लोगों की नजर लग जायेगी..

  अक्षिता (पाखी)

2 May 2010 at 15:19

आप सभी के प्यार और आशीष के लिए ढेर सारा प्यार व धन्यवाद !!

  अक्षिता (पाखी)

2 May 2010 at 15:35

@ Dr. Brajesh SwarooP Uncle,

अंकल बात तो आपकी सही है, पर शुद्ध दूध मिले तो सही...

  अक्षिता (पाखी)

2 May 2010 at 15:35

@ शरद अंकल,
जरुर बताना और कहना कि अब पानी नहीं मिलाये.

  अक्षिता (पाखी)

2 May 2010 at 15:36

@ अभिलाषा आंटी,

पूरे 5 मिठाई खाऊँगीआपकी तरफ से..

  अक्षिता (पाखी)

2 May 2010 at 15:37

@ Rashmi Singh Aunty,

खैर इत्ती प्यारी लग रही हूँ तो ..ठीक है कह देती हूँ...

  ersymops

2 May 2010 at 15:41

दूध में पानी या पानी में दूध
कुछ भी समझ ना आये
इससे अच्छा तो अब
मिल्क पाउडर ही पी जाएँ।

कुछ जुदा ही अंदाज है ...खूब पसंद आई पाखी की ये रचना.

  Udan Tashtari

2 May 2010 at 17:24

प्यारी बिटिया अक्षिता पाखी ने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता का सम्मान बढ़ाया है.

बहुत प्यारी सी, बिल्कुल पाखी बिटिया जैसी रचना को पाकर बहुत अच्छा लगा.


वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता टीम को बधाई और बिटिया पाखी का आभार.

  यशवन्त मेहता "फ़कीरा"

4 May 2010 at 11:22

मैं सब समझ रहा हूँ पाखी, दूध न पीना पड़े इसलिए ये कविता रच डाली
और क्यूंकि मिल्क पावडर मीठा मीठा होता हैं इसलिए तुम उसको सुखा ही खा जाना चाहती हो, ऐसा नहीं चलेगा........जावो अभी जावो रसोई में, दूध गरम करो और गिलास में डाल कर घटाघट पी जाओ.....मिल्क पावडर हमें भेज देना, हम उसकी चाय बना लेंगे.....
दूध पियो ताकि ऐसे ही सुन्दर सुन्दर कविता लिख सको, दूध पीने से दिमाग चलता हैं

  यशवन्त मेहता "फ़कीरा"

4 May 2010 at 11:25

अरे ताऊ, तेरे पास भैंस तो होगी ही, सारा दिन चौपाल पर बैठकर रामप्यारे "गधे" के साथ गप मारता रहता हैं, अब मेरी मान भैंस का दूध निकल और पाखी बिटिया को भेज......शुद्ध दूध....बिना मिलावट के.......

  इम्तियाज़ गाज़ी : गुफ्तगू

14 May 2010 at 12:40

बच्चों की व्यथा को शब्द देती सुन्दर व्यंग्य रचना...पाखी को बधाई !!

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