वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री जी. के. अवधिया

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री जी. के. अवधिया की रचना पढिये.

लेखक परिचय :-
नाम : जी.के. अवधिया
उम्र : 59 वर्ष, सेवानिवृत
शहर : रायपुर (छ्ग)

मैं एक संवेदनशील, सादे विचार वाला, सरल, सेवानिवृत व्यक्ति हूँ। मुझे अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व है। आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है।


प्रकाशित होना पोस्ट का और आना टिप्पणी का

अब देखिये ना, मैंने ब्लोगर में एक नया पोस्ट कर के प्रकाशित किया नहीं कि फटाक से मेरे गूगल टॉक ने संदेश दिया कि एक नई टिप्पणी आई है। मन प्रसन्नता से झूम उठा, अरे भाई हूँ तो मैं भी साधारण ब्लोगिया ही, टिप्पणी के बारे में जान कर भला कैसे खुश नहीं होउंगा? और इस बार तो बात ही विशेष थी। विशेषता यह थी कि पोस्ट प्रकाशित हुआ नहीं कि टिप्पणी आ गई। जैसे कोई इंतिजार करते हुये बैठा था कि कब ये पोस्ट प्रकाशित हो और कब मैं टिप्पणी करूँ। जब स्कूल में पढ़ता था तो हिन्दी के सर ने अतिशयोक्ति अलंकार का उदाहरण बताया था - 'हनूमान के पूँछ में लगी न पाई आग। लंका सिगरी जल गई गये निशाचर भाग॥' उदाहरण से अच्छी प्रकार से समझ में आ गया था कि अतिशयोक्ति अलंकार क्या होता है। पर पोस्ट प्रकाशित होते ही टिप्पणी आने पर जरा सा भी नहीं लगा कि यह अतिशयोक्ति हो सकती है। और लगे भी क्यों भाई, भले ही अच्छा न लिख पाउँ पर समझता अवश्य हूँ कि मैं भी एक लिख्खाड़ हूँ। अब पोस्ट प्रकाशित होते ही टिप्पणी आ जाने पर यही तो सोचूँगा न कि अब तो मैं बहुत अच्छा लिख्खाड़ हो गया हूँ, भला यह क्यों सोचने लगा कि यह अतिशयोक्ति टाइप की कुछ चीज हो सकती है?

यह भी विचार नहीं आया कि मेरे पोस्ट में तो प्रायः टिप्पणी आती ही नहीं। और आये भी क्यों? मैं खुद तो टिप्पणी करने के मामले में संसार का सबसे आलसी प्राणी हूँ, कभी किसी के ब्लोग में जा कर टिप्पणी नहीं करता। तो भला क्या किसी को क्या पागल कुत्ते ने काटा है कि मेरे ब्लोग में आ कर टिप्पणी करेगा? यह बात अलग है कि दूसरों के ब्लोग में टिप्पणियों को देख कर कुढ़ता अवश्य हूँ। सोचता हूँ कि इतने साधारण लेख पर इतनी सारी टिप्पणियाँ और मेरे सौ टका विशेष लेख पर एक भी नहीं। खैर, यह सोच कर स्वयं को तसल्ली दे लेता हूँ कि अभी लोगों की बुद्धि इतनी विकसित नहीं हुई है कि मेरी बात को समझ पायें। जब सही तरीके से समझेंगे ही नहीं तो भला टिप्पणी क्या करेंगे।

ऐसा भी नहीं है कि मेरे ब्लोग में कभी टिप्पणी आती ही न हो। आती है भइ कभी-कभार चार छः महीने में। अब संसार सहृदय व्यक्तियों से बिल्कुल खाली तो नहीं हो गया है। किसी सहृदय व्यक्ति को तरस आ जाता है कि बेचारा चार छः महीनों से बिना टिप्पणियों के ही लिखा चला आ रहा है, चलो आज इसके ब्लोग पर भी टिप्पणी कर दें।

हाँ तो मैं कह रहा था कि पोस्ट प्रकाशित हुआ नहीं कि टिप्पणी आ गई।

"Warning! See Please Here"

अरे! यह भी कोई टिप्पणी हुई? ये तो कोई चेतावनी है। टिप्पणीकर्ता 'यहाँ देखो' कह कर शायद यह बता रहा है कि मैंने किसी और स्थान से लेख चोरी कर के अपने ब्लोग में पोस्ट कर दिया है। सरासर चोरी का इल्जाम लग रहा है यह तो। प्रसन्नता काफूर हो गई।

मैंने भी सोचा कि चलो देखें तो सही कि ये कहाँ जाने को कह रहा है, आखिर मैंने चोरी किस जगह से की है। क्लिक कर दिया भैया। अब क्लिक कर देने पर जो शामत आई है उसके बारे में मत ही पूछो तो अच्छा है। न जाने कौन कौन से साइट्स खुलने लगे। चेतावनी पर चेतावनी - आपके कम्प्यूटर में ये वायरस आ गया है, वो वायरस आ गया है, हमसे मुफ्त स्कैन करवायें। मुफ्त स्कैन करवाने पर वायरसों की एक लम्बी फेहरिस्त आ गई जिसे दूर करने के लिये उनके एन्टीवायरस को खरीदने की सलाह दी गई थी। मैने तो केवल एक बार क्लिकिया था बन्धु, यकीन मानिये कि एक बार क्लिक करने के बाद हिम्मत ही नहीं हुई दुबारा क्लिक करने की। पर न जाने कैसे बिना क्लिक किये ही वो साइट अपने आप खुल जाती थी कुछ कुछ देर में और मेरे कम्प्यूटर का मुफ्त स्कैन होने लगता था। लगता था कि कोई भूत घुस आया है मेरे कम्प्यूटर में। अब बन्धु मेरे, बड़ी मुश्किल से उस भूत को भगा पाया मैं।

बड़ी कोशिश करके भूत को भगाने के बाद थोड़ा धीरज बंधा और थोड़ी शान्ति मिली। अब मन में विचार आया कि वो टिप्पणी तो अभी भी मेरे ब्लोग में है। यदि मेरे पाठकों ने उस पर क्लिक कर दिया तो? जरूर वह भूत उन्हें भी तंगायेगा। यह टिप्पणी तो बीच रास्ते में केले का छिलका बन कर पड़ा हुआ है, कोई फिसल कर गिर न जाये। इस टिप्पणी को मिटाना ही पड़ेगा।

अब भइ, इससे पहले कभी कोई टिप्पणी मिटाई नहीं थी। अब कभी-कभार आये हुये टिप्पणी को मैं मिटाने क्यों लगा - क्या मैं इतना बेवकूफ़ हूँ कि अपने ब्लोग से टिप्पणी को मिटा दूँ। हाँ तो टिप्पणी मिटाने का मुझे कुछ अनुभव ही नहीं था। मैंने ब्लोगर एक एक हिस्से को छान मारा पर टिप्पणी मिटाने के उपाय के बारे में कहीं कुछ न मिला। हाँ इस दौरान मुझे ब्लोगर से संकेत जरूर मिला कि कोई स्वतः टिप्पणी करने वाला सॉफ्टवेयर आपके ब्लोग में ऐसे वायरस न फेंक दे इसके लिये वर्ड व्हेरिफिकेशन का प्रयोग करें। हाँ तो मुझे ब्लोगर में टिप्पणी मिटाने का उपाय नहीं मिला (शायद कहीं हो भी तो अक्ल का अंधा होने के कारण मैं उसे देख नहीं पाया), निदान मैं ब्लोगर के फोरम में गया और ढ़ूंढ़-ढ़ांढ़ कर टिप्पणी मिटाने का उपाय प्राप्त कर ही लिया। टिप्पणी को मिटाया और ब्लोगर.कॉम महाशय के सुझाव के अनुसार वर्ड व्हेरिफिकेशन भी लगा दिया।

फिर मैंने सोचा कि अरे, यह मैंने क्या कर दिया। कभी-कभार तो मेरे ब्लोग में टिप्पणी आती है और वर्ड व्हेरिफिकेशन लगा कर मैंने उस कभी-कभार आने वाले टिप्पणी का रास्ता भी बंद कर दिया। एकदम पागल हूँ मैं। दस मिनट बाद ही मैंने उस वर्ड व्हेरिफिकेशन को हटा भी दिया पर इस दस मिनट के दौरान हमारे सभी ब्लोगर बन्धुओं को उस वर्ड व्हेरिफिकेशन के विषय में पता चल गया।

तो साहब किया टिप्पणीकर्ता सॉफ्टवेयर ने और भरना मुझे पड़ा।


--
http://agoodplace4all.com
http://computers.agoodplace4all.com

15 comments:

  M VERMA

6 May 2010 at 05:08

अभी लोगों की बुद्धि इतनी विकसित नहीं हुई है कि मेरी बात को समझ पायें।
शायद यही बात हो
मजेदार

  Udan Tashtari

6 May 2010 at 05:13

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे श्री जी. के. अवधिया जी का पुनः स्वागत है इस मजेदार रचना के साथ. बधाई.

  ललित शर्मा

6 May 2010 at 06:15

माल खाए गंगाराम अऊ मार खाए मनबोध,
बने लिखे हस अवधिया जी, गाड़ा गाड़ा बधई

  अविनाश वाचस्पति

6 May 2010 at 06:20

इसे ही कहते हैं
करे कोई
भरे कोई
पर हैं दोनों ही इंसान
एक इंसान के रूप में शैतान
और
दूसरा साहित्‍य सर्जक महान।

  विनोद कुमार पांडेय

6 May 2010 at 07:53

आपकी रचना से प्रभावित होते है लोग जो पहले ही भाप लेते हैं की अब आप पोस्ट करने वाले है और फिर उससे पहले ही टिप्पणी आ जाती है..बढ़िया मजेदार व्यंग..बधाई अवधिया जी

  जितेन्द़ भगत

6 May 2010 at 08:25

काश 'टिप्‍पणी वायरस' नाम का कोई सॉफ्टवेयर होता, जि‍ससे कि‍सी की पोस्‍ट खुलते ही 40-50 ब्‍लॉगरों के नाम से टि‍प्‍पणी धड़ाधड़ दि‍खती चली जाती।
अरे भार्इ कोई ऐसा सॉफ्टवेयर तो बनाओ।
सभी ब्‍लॉगर इस वायरल का शि‍कार होना चाहते हैं:)

  'अदा'

6 May 2010 at 08:28

अवधिया भैया को बधाई एवं हार्दिक शुभकामना..!!

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

6 May 2010 at 09:36

जी.के. अवधिया को बहुत-बहुत बधाई!

  अभिलाषा

6 May 2010 at 11:01

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे श्री जी. के. अवधिया जी का स्वागत है.शानदार रचना के लिए बधाई.
________________


'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर हम प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रचनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं. आपकी रचनाओं का भी हमें इंतजार है. hindi.literature@yahoo.com

  SANJEEV RANA

6 May 2010 at 11:18

जी.के. अवधिया जी को बहुत-बहुत बधाई!
इस रचना के लिए आप भी बधाई के पात्र हो

  shikha varshney

6 May 2010 at 14:43

जी.के. अवधिया को बहुत-बहुत बधाई

  दीपक 'मशाल'

6 May 2010 at 17:00

ye virus wala khel hamare sath bhi khela gaya Awadhiya ji.. achchha laga ek dard vyangya ke roop me jaankar. :)

  दिलीप कवठेकर

6 May 2010 at 19:49

मज़ा आ गया!!

  राम त्यागी

6 May 2010 at 22:21

स्वागत है आपका ...लो आ गयी टिपण्णी :-)

  Tej Pratap Singh

7 May 2010 at 01:50

jabardast...swagat hai aap ka.

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