वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री संजय कुमार चौरसिया

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री संजय कुमार चौरसिया की रचना पढिये

लेखक परिचय
नाम :-- संजय कुमार चौरसिया

माता :-- श्रीमती जानकी देवी चौरसिया

पिता :-- श्री जगत नारायण चौरसिया

जन्म :--- १५ मार्च १९७८

शिक्षा :--- M. COM

स्थान :---- शिवपुरी , मध्य-प्रदेश

ब्लाग : संजय कुमार



मेरे आगे तो आज का भगवन भी हारा
अरे नहीं भई मैं कोई नास्तिक नहीं हूँ ! और ना ही मेरे अन्दर इतनी शक्ति है कि मैं भगवान से टक्कर ले सकूं ! या मैं अब भगवान से बड़ा हो गया हूँ ! नहीं मैं तो एक साधारण इन्सान हूँ ! मुझमे इतना दम कहाँ ! मेरी तो किसी के आगे नहीं चलती ! चलती है तो आज के उस भगवान की जो सारे भगवानों से बड़ा है ! आप सब लोग अच्छी तरह से जानते हैं आज के उस भगवान को ! क्योंकि आज तो हर जगह या यूँ कह सकते हैं ! कि हर पल हर दिन उसी की चलती है ! उसके आगे तो सब नतमस्तक हैं ! चाहे कोई छोटा हो या बड़ा ! नेता हो या अभिनेता ! आज बड़े बड़े साधू संत भी उसके आगे नतमस्तक हैं ! अरे मैं बात कर रहा हूँ ! हम सबके प्रिये भगवान नगद नारायण की ! बस इनका नाम लेते ही सब कुछ समझ मैं आजता है ! कि मैं कोंन हूँ ! और क्या है आज मेरी ताक़त ! मैं हूँ आज का भगवान !
इस ब्रह्माण्ड कि सबसे ताक़तवर चीज ! जिसके ना होने पर सब कुछ फीका सा लगता है ! और ज्यादा होने पर खून कि नदियाँ तक वह जातीं हैं ! मैंने तो पता नहीं कितने इतिहास बना दिए और कितने बदल दिए ! और कितने बदलेंगे ! मेरे लिए तो इन्सान इतना गिर जाता है कि , पूँछिये मत ! इन्सान को इन्सान से लड्बाना , आज हर जगह मेरा ही बोलबाला है ! आज देश मैं जो बड़े बड़े कांड हो रहे हैं वो सब मेरे कारण ही हो रहे हैं ! देश मैं होने बाला हर बड़ा घोटाला मेरे लिए ही तो हो रहा है ! चाहे मेरा इस्तेमाल हिन्दू मुस्लमान को आपस मैं लडवाना हो , भाई का खून भाई के हांथो बहाना हो ! देश मैं कहीं भी दंगा करवाना हो ! सब कुछ !अब तो मेरे लिए इन्सान किसी भी वक़्त बिकने को तैयार रहता है ! अब तो मैं ये देख रहा हूँ कि यह इन्सान कितना गिर गया है ! कि वह भगवान कि भी चिंता नहीं करता ! अपने रिशते नाते तक भूल जाता है ! मेरा लालच इन्सान को इतना है कि वो कब किस हद से गुजर जाये पता नहीं ! आज इस संसार मैं ऐसा एक भी इन्सान नहीं है , जिसकी चाहत मैं नहीं ! मैं सब कुछ कर सकता हूँ ! आज मेरे आगे तो भगवान भी हार गया है ! आज इन्सान कहता है कि भले ही मुझे भगवान मिले ना मिले , अगर तुम एक बार मेरे पास आ गए तो भगवान कि मुझे शायद कभी जरूरत ना पड़े ! इतनी ताक़त है मेरे अंदर ! पल पल पर विकता ईमान , पल पल गिरगिट कि तरह रंग बदलता इन्सान सब मेरे कारण ही है ! और अब मैं आपसे क्या कहूं , आप सब लोग मेरे महत्व से भली भांति परिचित हैं !
तो एक बार सब मिलकर मेरे साथ बोले जय हो आज के भगवान , भगवान नगद नारायण कि जय
आज पैसा बोलता है , खुद कि अहमियत बताता है !


धन्यवाद

तारी 13 मई 2010

7 comments:

  महेन्द्र मिश्र

13 May 2010 at 05:13

sundar prastuti....shubhakamanaye....

  Udan Tashtari

13 May 2010 at 05:55

संजय चौरसिया जी का स्वागत है. बेहतरीन आलेख के लिए बधाई.

  दीपक 'मशाल'

13 May 2010 at 06:37

संजय जी का स्वागत है.. रचना असर छोडती है..

  श्यामल सुमन

13 May 2010 at 07:11

सुन्दर पोस्ट - बधाई संजय जी।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

  विनोद कुमार पांडेय

13 May 2010 at 07:11

बढ़िया व्यंग..स्वागत है संजय जी..सुंदर रचना के लिए बधाई

  'अदा'

13 May 2010 at 07:19

Sanjay ji ko bahut bahut badhai..

  M VERMA

13 May 2010 at 07:20

नकद नारायण की जय हो ..

Followers