वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : श्री जी.के. अवधिया

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री जी. के. अवधिया की रचना पढिये.

लेखक परिचय :-
नाम : जी.के. अवधिया
उम्र : 59 वर्ष, सेवानिवृत
शहर : रायपुर (छ्ग)

मैं एक संवेदनशील, सादे विचार वाला, सरल, सेवानिवृत व्यक्ति हूँ। मुझे अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व है। आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है।

पत्नी पुराण

अब पत्नी चाहे अवधिया जी की हो, चाहे पात्रो जी की हो, चाहे गुप्ता जी की हो या चाहे किसी अन्य व्यक्ति की हो, सभी में एक समानता तो जरूर पाई जाती है। वे सभी चाहती हैं कि अपने पति को अपनी मुट्ठी में ही रखें। और 99.99% पत्नियाँ अपने इस उद्देश्य में सफल रहती हैं। आप पूछेंगे कि 0.01% क्यों सफल नहीं हो पातीं? तो भैया अब यदि हम पत्नी पुराण लिखने बैठे हैं तो तो क्या 100% पतियों को जोरू का गुलाम बना दें? अरे नहीं भइ, ये पतियों के प्रति एकदम अन्याय हो जायेगा। हम समझते हैं कि कम से कम 0.01% पतियों को भी इस बात का श्रेय दिया जाये कि वे इस तथ्य को अच्छी प्रकार से समझते हैं कि उनकी पत्नियाँ उन्हें अपनी मुट्ठी में रखना चाहती हैं और वे बचने के लिये स्वयं पर इतनी चिकनाई लगा कर रखते हैं कि मुट्ठी में आते ही वे फिसल के बाहर निकल आयें।

हम जानते हैं कि दूसरा प्रश्न आपके दिमाग में कुलबुला रहा है और आप पूछेंगे कि लेखक की पत्नी किस श्रेणी में आती हैं, 99.99% वाली श्रेणी में या 0.01% वाली में? तो जवाब सुन कर खुश हो जाइये कि वे भी उसी श्रेणी में आती हैं जिस श्रेणी में आपकी श्रीमती जी आती हैं। अब आप इससे अधिक खुलासा करने के लिये मत आग्रह कीजियेगा क्योंकि यदि आप आग्रह करेंगे भी तो हम इससे अधिक खुलासा नहीं करने वाले।

मूलतः पत्नियाँ दो प्रकार की होती हैं पहला पति को गुलाम बना कर रखने वाली और दूसरा पति की गुलामी करने वाली। पहला प्रकार बहुतायत से पाया जाता है और दूसरा प्रकार लुप्तप्राय हो रहा है। हमें तो लगता है कि कुछ ही अरसे में दूसरा प्रकार पूरी तरह से लुप्त हो जायेगा। दूसरे प्रकार के लुप्त होने में ज्यादा योगदान आजकल के सिस्टम का ही है। पहले जाति के आधार पर बने मुहल्लों में रहने का सिस्टम था पर अब आधुनिक कालोनियों में रहने का सिस्टम हो गया है जहाँ पर अधिकांशप्राय अपने ही विभाग के सहकर्मी लोग रहा करते हैं। अब देखिये ना जब हम अपने पुराने मुहल्ले में रहते थे तो मंहगाई भत्ते का एरियर्स, बोनस आदि की राशि को बड़े मजे के साथ खुद डकार जाया करते थे, पत्नी को हवा तक नहीं लगती थी। पर जबसे हमने अपने विभाग वाली कालोनी में आकर रहना शुरू किया है ऐसा बिल्कुल नहीं कर पाते। हमारे पड़ोसी सहकर्मी की श्रीमती जी पहले ही आकर हमारी पत्नी को बता जाती हैं कि उन्हें उनके पति ने बताया है कि एक दो दिन में ही मंहगाई भत्ते के एरियर्स का पेमेन्ट होने वाला है। और हमारे आफिस से आते ही पत्नी का पहला प्रश्न होता है, "मंहगाई भत्ते का एरियर्स मिल गया क्या?" तो इस आधुनिक सिस्टम ने हमारी पत्नी को पहले प्रकार से निकाल कर दूसरे प्रकार में ला दिया है।

कालोनी में आने के शुरुवाती दौर में हम प्रत्येक इतवार को अपने माता-पिता (जो आज भी पुराने मुहल्ले में रहते हैं) से मिलने चले जाया करते थे। पर आजकल हमें हर इतवार को पत्नी के साथ उनके मायके अर्थात् अपनी ससुराल में जाना पड़ता है क्योंकि कालोनी के अधिकांश निवासियों के द्वारा इसी प्रथा को निभाया जाता है। जब कालोनी के सभी परिवारों में यही रिवाज है तो क्या हमारी पत्नी इस रिवाज से दूर रह कर कालोनी में अपमानित होना पसंद करेंगीं?

पत्नियों के इन दो मूल प्रकारों से हट कर एक और प्रकार की पत्नी भी कभी हुआ करती थीं जो अपने पति को कह देती थीं:

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"

पर साहब, पत्नी का वह प्रकार एक अपवाद था।

लिखना तो अभी और भी बहुत कुछ चाहता था पर फिलहाल यहीं समाप्त करना पड़ रहा है क्योंकि पत्नी का पड़ोस से वापस आने का समय हो गया है। चलिये बाकी बातें किसी और दिन लिख देंगे यदि पत्नी ने इजाजत दी तो।


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तारी 16 मई 2010

5 comments:

  महेन्द्र मिश्र

16 May 2010 at 06:11

रोचक उम्दा प्रस्तुति...आभार

  Ratan Singh Shekhawat

16 May 2010 at 06:43

वाह ! बढ़िया व्यंग्य !!

  ललित शर्मा

16 May 2010 at 08:42

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥


बहुत बढिया व्यंग्य अवधिया जी

पड़ोस से पत्नी का आने का समय हो गया है।
बहुत डर लगता है,पत्नी नामक बवंडर से।

  अनामिका की सदाये......

16 May 2010 at 23:40

pados se patni ke aane ka samay ho gaya....waaah to apki b dusri type wali hai. ha.ha.ha.

patni chalisa achhi kahi. badhayi.

  Udan Tashtari

17 May 2010 at 06:14

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री अवधिया जी का स्वागत है. बहुत उम्दा आलेख के लिए बधाई.

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