वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'

आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में सुश्री स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' की रचना पढिये.

लेखिका परिचय
पूरा नाम : स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'
शिक्षा : विज्ञानं में स्नातकोत्तर (जीव विज्ञान)
एम्.सी.ए (मास्टर इन कम्प्यूटर अप्लिकेशन)
स्थान : कनाडा
शौक़ : संगीत, नाटक, लेखन


पुरुषोत्तम

त्याग दिया वैदेही को

और जंगल में भिजवाया

एक अधम धोबी के कही पर

सीता को वन वन भटकाया

उस दुःख की क्या सीमा होगी

जो जानकी ने पाया

कितनी जल्दी भूल गए तुम

उसने साथ निभाया

उसने साथ निभाया

जब तुम कैकई को खटक रहे थे

दर दर ठोकर खाकर,

वन वन भटक रहे थे

अरे, कौन रोकता उसको

वह रह सकती थी राज-भवन में

इन्कार कर दिया था उसने

तभी तो थी वह अशोक-वन में

कैसे पुरुषोत्तम हो तुम !

क्या साथ निभाया तुमने

जब निभाने की बारी आई

तभी मुँह छुपाया तुमने ?

छोड़ना ही था सीता को

तो खुद छोड़ कर आते

अपने मन की उलझन

एक बार तो उसे बताते !

तुम क्या जानो कितना विशाल

ह्रदय है स्त्री जाति का

समझ जाती उलझन सीता

अपने प्राणप्रिय पति का

चरणों से ही सही, तुमने

अहिल्या का स्पर्श किया था

पर-स्त्री थी अहिल्या

क्या यह अन्याय नहीं था ?

तुम स्पर्श करो तो वह 'उद्धार' कहलाता है

कोई और स्पर्श करे तो,

'स्पर्शित' !

अग्नि-परीक्षा पाता है

छल से सीता को छोड़कर पुरुष बने इतराते हो

भगवान् जाने कैसे तुम 'पुरुषोत्तम' कहलाते हो

एक ही प्रार्थना है प्रभु

इस कलियुग में मत आना

गली गली में रावण हैं

मुश्किल है सीता को बचाना

वन उपवन भी नहीं मिलेंगे

कहाँ छोड़ कर आओगे !

क्योंकि, तुम तो बस,

अहिल्याओं का उद्धार करोगे

और सीताओं को पाषाण बनाओगे

तारी 16 मई 2010

7 comments:

  वाणी गीत

16 May 2010 at 17:34

क्योंकि, तुम तो बस,
अहिल्याओं का उद्धार करोगे
और सीताओं को पाषाण बनाओगे
रामजी के प्रति पूर्ण आदर प्रकट करते हुए भी कहूँगी ..प्रश्न करने का हक हर मनुष्य का है ...ईश्वर से भी ...पुरषोत्तम से भी ...!!
अच्छी कविता ...

  ललित शर्मा

16 May 2010 at 18:04

बहुत बढिया

भगवान परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं

  माधव

16 May 2010 at 19:07

अच्छा है

http://madhavrai.blogspot.com/

http://qsba.blogspot.com/

  महफूज़ अली

16 May 2010 at 23:28

आदरणीय अदा जी...को नमन....

इनकी रचना अच्छी लगी...

  अनामिका की सदाये......

16 May 2010 at 23:45

ada di mere khayaal se yah vyangy rachnao wala tauji dot com he na???

aur pehle b ek rachna dekhi thi aur ye b inme vyangye nahi he.

halanki aapne jis drishtikon ko paish kiya hai vo kaabile tareef hai...iske baare me kya kahu....ha.n lekin ek baat jo dimag me khatakti he vo ye...ki agar sita us swarn hiran ki maang na karti to shayed ye ramanyan na rachit hoti.

koi baat buri lagi ho to kshama-prarthi hu.

  Udan Tashtari

17 May 2010 at 06:13

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में अदा जी का स्वागत है. बहुत उम्दा रचना के लिए बधाई.

  अर्चना तिवारी

17 May 2010 at 16:11

bahut achhi rachna

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