वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री संजय कुमार चौरसिया

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री संजय कुमार चौरसिया की रचना पढिये

लेखक परिचय
नाम :-- संजय कुमार चौरसिया

माता :-- श्रीमती जानकी देवी चौरसिया

पिता :-- श्री जगत नारायण चौरसिया

जन्म :--- १५ मार्च १९७८

शिक्षा :--- M. COM

स्थान :---- शिवपुरी , मध्य-प्रदेश

ब्लाग : संजय कुमार


मंदिर या मस्जिद, बस इक इन्सान चाहिए ...............................

पिछले कई वर्षों से हमारे देश मैं एक मुद्दा चल रहा है, मंदिर या मस्जिद , हिन्दू और मुस्लमान ! यह एक ऐसा मुद्दा है, जो तब तक ख़त्म नहीं होगा, जब तक इस धरती पर इन्सान है ! क्योंकि इस तरह के मुद्दे या मजहबी वातावरण या हिन्दू , मुस्लिमों को लेकर चलाया जा रहा ये धार्मिक युद्ध आज के इंसानों द्वारा निर्मित है ! यह सब तो आज के कुछ मतलब परस्त लोगों ने इस देश मैं ऐसा माहोल बना दिया है, वर्ना यह देश तो हमेशा से हिन्दू, मुस्लिम एकता और भाईचारे के लिए जाना जाता है ! ना की हिन्दू , मुस्लिम के लिए ! जब एक इन्सान के नजरिये से सोचा तो ये महसूस किया , की यह सब कुछ नहीं , कुछ धर्म परस्त, मतलब परस्त लोग दिखाबा कर रहे हैं ! अपने को कट्टर धर्माब्लाम्बी कहलाने का .................

जब मैंने एक साधारण हिन्दू और मुस्लिम से पूंछा की, आज देश मैं मंदिर, मस्जिद और हिन्दू , मुस्लिम को लेकर जो अफरा-तफरी का माहौल है, तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे, तो वह बोले, आज देश मैं इतनी महगाई, लूट खसोट, बेईमानी और भ्रस्टाचार है, की आज की मासूम जनता तो इन सब से पहले ही मर रही है ! उसे कहाँ इन सब बातों से मतलब होता है ! हमारा जीवन तो गुजर बसर और जीवन की आपाधापी मैं ही निकल जाता है ! तो क्या मंदिर क्या मस्जिद ! यह सब तो धर्म की आग पर रोटियां सेंकने बालों का काम है ! हम वह हिन्दू मुस्लिम हैं जो सभी धर्मों को एक समान द्रष्टि से देखते हैं! हम ईद पर अपने मुस्लिम भाइयों के गले लगते हैं उनके यहाँ , ईद की सिवैयां खाते हैं और उनका मान बढ़ाते हैं, उसी तरह मुस्लिम भाई हम हिन्दुओं के पर्व मैं शामिल होते हैं, चाहे वह होली हो या दिवाली हर पर्व मैं ये शामिल होकर हम उन लोगों का भी मान बढ़ाते हैं !

पर यह सब हिन्दू मुस्लिम नहीं एक इन्सान हैं ! हम लोग तो राम-रहीम दोनों को मानते हैं ! हम अजमेर शरीफ जाते हैं , तो शिर्डी के साईं भी एक साथ जाते हैं ! हमें न तो मंदिर चाहिए और न ही मस्जिद ! हमें तो सिर्फ इक इन्सान चाहिए , जिसमें इंसानियत हो , और जो इन्सान को इन्सान समझे

जय राम ----जय रहीम

हम सब भाईचारा चाहते हैं , आपस मैं मिलकर रहना चाहते हैं ! न लड़ाओ, हमें अपने ही भाइयों से ! हमें इन्सान रहने दो ! न मंदिर न मस्जिद, बस इक इन्सान चाहिए

जब मैंने दोनों की बात सुनी तो यह महसूस किया, की वाकई मैं अगर आज ये मुद्दे उठना बंद हो जाएँ तो हम और हमारा देश भाईचारे की वह मिशाल कायम कर सकते हैं, जो विश्व मैं कहीं देखने नहीं मिलेगी ! जब हम सब एक साथ उठते बैठते हैं, तो कहाँ रह जाता है फर्क , मंदिर और मस्जिद, हिन्दू मुस्लिम का

आप सभी अपने दिल पर हाँथ रखकर महसूस करें, तो आप एक अच्छा इन्सान चाहेंगे, न हिन्दू और न मुस्लिम,और कहेंगे की हम इन्सान हैं , और हमें समझने बाला बस इक इन्सान चाहिए .........................बस इक इन्सान चाहिए ................................


धन्यवाद
http://sanjaykuamr.blogspot.com

5 comments:

  anjana

28 May 2010 at 17:13

बहुत ही अच्छे विचार ..उम्दा लेख...

  पी.सी.गोदियाल

28 May 2010 at 17:15

अरे ताउजी बधाई हो आप कब लौटे छुटिया बिता कर ?

  pankaj mishra

28 May 2010 at 18:13

सवाल सही और विचारणीय है। आपके विचार सही हैं। लिखते रहिए अच्छा लिख रहे हैं। मेरी शुभकामनाएं।
http://udbhavna.blogspot.com/

  सुनील दत्त

28 May 2010 at 18:49

रोचक

  M VERMA

28 May 2010 at 19:12

सद्विचारो की रचना
सुन्दर

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