वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : सुश्री शैफ़ाली पांडे

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में सुश्री शैफ़ाली पाण्डे की रचना पढिये.

लेखिका परिचय :-
नाम - शेफाली पांडे

शिक्षा - एम्. ए. अर्थशास्त्र एवं अंग्रेज़ी, एम् .एड.,[कुमायूं विश्विद्यालय, नैनीताल]

व्यवसाय - शिक्षण

निवास - हल्द्वानी, उत्तराखंड.

शौक - लिखना और पढ़ना


मज़े का अर्थशास्त्र

जब भी वो मुझसे टकराती है मुझे याद दिलाना नहीं भूलती कि मैं कितने मज़े में हूँ. मैं ईश्वर के इस खेल को समझ नहीं पाती हूँ , मेरे लिए जो एक अमूर्त वस्तु है , उनके लिए वही मूर्त कैसे हो जाती है, ज़रूर ये सरकारी योजनाओं के सदृश्य हैं , जिनमें पैसा तो बहुत खर्च बहुत होता है, लेकिन किसी को दिखता नहीं. इसकी तुलना ओबामा के उन शाति प्रयासों से भी की जा सकती है , जो सिर्फ नोबेल देने वालों को दिखते हैं , दुनिया को नहीं . महिलाएं इसकी तुलना उस लडकी से कर सकती हैं जिसके इश्क के चर्चे सारे शहर में आम हों लेकिन, उसके घर वालों को लडकी के घर से भागने के बाद पता चले.
वह नौकरी नहीं करती, मैं करती हूँ , इस लिहाज़ से वह मुझे कुछ भी कहने की अधिकारिणी हो जाती है , मोहल्ले से हँसती - खिलखिलाती गुज़रती है , मुझे देखते ही उसे दुखों का नंगा तार छू जाता है . ''हाई ! तुम कितनी लक्की हो !तुम्हें देखकर जलन होती है'' का हथगोला मेरी ओर फेंककर, अपना कलेजा ठंडा करके वह आगे बढ़ लेती है.

वह कहती है कि उसे चाय पीते समय किसी का टोकना पसंद नहीं है, क्योंकि उसके साथ वह अखबार पढ़ती है ,फ़िल्मी अभिनेता और अभिनेत्रियों के लेटेस्ट अफेयर और फिल्मों की खबर के साथ - साथ सोने के हर दिन के भाव उसे मुँह ज़बानी याद रहते हैं. मेरी आधी चाय मेरे आँगन में लगा हुआ रबर प्लांट पीता है, जिस दिन स्वयं चाय की अंतिम बूँद का स्वाद लेने की सोचती हूँ उसी दिन बस छूट जाती है और मुझे अस्सी रूपये खर्चने पड़ते हैं, जिससे मुझे उसके व्यंग्य बाणों से भी ज्यादा तकलीफ होती है, लेकिन जब यह रबर प्लांट बड़ा हो जाएगा, तो मैं गर्व से कह सकूंगी कि ''बेटा'! तुझे मैंने अपनी चाय पिला कर बड़ा किया है''.बच्चों से नहीं कह पाउंगी , कभी कहने की कोशिश भी करूंगी तो पता है कि क्या ज़वाब मिलेगा ''कौन सा एहसान किया ? अपने माँ बाप का कर्जा ही तो चुकाया''
.
उसका कहना है कि वह , उसके पति और बच्चे सुबह का बना हुआ खाना रात को नहीं खा सकते, और खाने मैं उन्हें नित नई वेराइटी चाहिए, इसके लिए उसने भारत के पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ,चाइनीज़ से लेकर, थाई ,मेक्सिकन तक सारे व्यंजन बनाने सीख लिए हैं, ऐसा वह सिर्फ कहती है कभी किसी ने इस बात की पुष्टि नहीं करी .उनके पति यह नहीं खाते, उनके बच्चे वह नहीं पसंद करते. मुझे सुबह के तीन बजे उठना होता है, मैं रात की बनाई हुई सब्जी के साथ रोटी बनाकर सबके टिफन भर देती हूँ , मेरे पति और बच्चों को फरमाइश करने की इज़ाज़त नहीं है.

वह कहती है ''मैं अपने पति से हर महीने की पहली तारीख को एक नई साड़ी और एक नया सूट लेकर रहती हूँ , नौकरी नहीं करती हूँ तो क्या हुआ ?,आखिर मेरा भी कुछ हक़ बनता है'' हर करवाचौथ पर उसे व्रत करने की एवज़ में एक मुआवज़े के तौर पर सरप्राइज़ में सोने का बड़ा सा गहना ज़रूर मिलता है,

उसकी रात को पहनने वाली नाइटी पर भी प्रेस की क्रीज़ इधर से उधर नहीं होती, सुबह उठते ही उसके होंठों पर पुती हुई लिपस्टिक की लाली देर शाम तक बरकरार रहती है .वह हर हफ्ते कान के टॉप्स और मंगलसूत्र बदल देती है, एक हफ्ते से ज्यादा कोई गहना पहिनने पर उसे घबराहट होने लगती है, उसकी सास जब भी मुझे देखती है मुँह बिचकाकर कहती है ''छिः ! कैसी सुहागन हो तुम ? ना सिन्दूर, ना मंगलसूत्र'' लिहाज़ा एक दिन उसे देख कर मैंने भी अपने कान की बाली पहनी और इतराती हुई बस में बैठ गई, सुबह की उठी हुई थी, खिड़की से सर टिकाया और ठंडी हवा के झोंके लगते ही झपकी लग गई, और तब ही आँख खुली जब चोर कानों से बाली खींच ले गया, खून से लथपथ आँखों में आँसू लेकर लौटी और आकर सबकी डांट खाई सो अलग.

कई बार बस स्टॉप पर खड़ी होकर ही मुझे पता चलता है कि जल्दीबाजी में बाथरूम स्लीपर पहिन कर आ गई हूँ, वापिस जाना संभव नहीं होता क्यूंकि बस का समय निश्चित है ,इसीलिए ऐसे ही जाना पड़ता है और सबकी हँसती , मज़ाक उड़ाती नज़रों का सामना करने की शक्ति वह सर्वशक्तिमान ईश्वर मुझे प्रदान कर ही देता है.
कभी पति से किसी चीज़ की फरमाइश करने का मन करता है तो टका सा जवाब मिलता है, '' क्या आम औरतों की तरह नखरे करती हो ?खुद जाकर खरीद लाओ, अपने आप कमाती तो हो''

वह नियम से सुबह शाम दो घंटे योग करती है, उसका चेहरा पैंतालीस की उम्र में भी दमकता रहता है. मैं पैंतीस की उम्र में ही स्पोंडिलाइटिस, आर्थरआइटिस, माइग्रेन से ग्रसित हो गई हूँ , जाड़ों के दिनों में एक - एक सीढ़ी चढना भी दूभर हो जाता है.

वह अक्सर गुस्से में कहती है कि इस साल वह अपनी गृहस्थी अलग कर लेगी अन्यथा पति से तलाक ले लेगी, क्यूंकि उसकी सास कभी - कभी उससे सबके सामने ऊँची आवाज़ में बात करती है, जिससे उसे बहुत बेईज्ज़ती महसूस होती है.

मेरे ऑफिस में साहब तो एक तरफ , बड़ा बाबू तक मेरी खुलेआम बेईज्ज़ती करता है, कहता है, कि मुझे ठीक से इनकम टेक्स के कागज़ भरने भी नहीं आते . और सहकर्मियों के कागज़ स्वयं भरता है लेकिन मेरे लिए कोई मदद नहीं. पीठ फिरते ही सारा कार्यालय हंसने लगता है . कभी पानी को भी नहीं पूछने वाला, काम के समय दसियों बहाने बनाने वाला , आठवीं पास चपरासी तक कहने से ही चूकता '' बेकार है इन औरतों को नौकरी देना , ये बस घर का चूल्हा ही संभाल सकती हैं ''

उसका पति उसे अकेले बाहर नहीं जाने देता , कहते हुए वह शर्म से लाल हो जाती है, मेरे माथे पर आत्मनिर्भर का ठप्पा लगा हुआ है लिहाज़ा घर से लेकर बाहर तक सभी काम अकेले मेरे ही जिम्मे आ गए. चार - चार बैग अकेले कंधे पर लटकाए सोचना पड़ता है कि आत्मनिर्भरता क्या इसी दिन के लिए चुनी थी. मेरा अस्त व्यस्त घर देखकर उसके माथे पर शिकन आ जाती है,'' में तो ज़रा सी भी धूल बर्दाश्त नहीं कर सकती, घर फैला हुआ देखकर मुझे हार्ट अटैक होने लगता है,'' कहकर वह माथे पर आया हुआ पसीना पोछने लगती है.में डर जाती हूँ कि भगवान् ना करे कि कभी यह अचानक मेरे घर में बिना बताए घुस जाए , तो खामखाह ही मुझ पर इसकी मौत का इलज़ाम आ जाएगा.

वह हर मुलाक़ात में मेरी तनखाह पूछना नहीं भूलती, मेरे बहुत मज़े हैं, उसे याद रहता है, लेकिन तनखाह में लिपटी जिम्मेदारियां, मकान की किस्तें, पुराने उधार कई बार बताने पर भी उसकी मेमोरी से डिलीट हो जाते हैं. वह सबकी चहेती है , सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़ -चढ़ कर भाग लेती है, शादी - ब्याह के अवसरों पर उसकी बहुत पूछ होती है, सब जगह से उसके लिए बढ़िया कपड़े बनते हैं, मुझसे कोई खुश नहीं रहता, अक्सर बगल के घर वाले भी मुझे निमंत्रण देना भूल जाते हैं. ससुराल से लेकर मायके तक सभी असंतुष्ट रहते हैं , कितने ही गिफ्ट ले जाओ फिर भी सुनना पड़ता है ''दो - दो कमाने वाले हैं और गिफ्ट सिर्फ एक, छाती पर रखकर कोई नहीं ले जाता , खाली हाथ दुनिया में आए थे, और खाली हाथ जाना है'', गीता का अमूल्य ज्ञान देने से छोटे - छोटे बच्चे भी नहीं चूकते .

कभी वह मेरे मामूली कपड़े देखकर परेशान रहती है, तो कभी चप्पल व पर्स देखकर, मेरी दुर्दशा देख कर उसने पिछले महीने शलवार - सूट का बिजनेस शुरू किया है, इस हफ्ते वह चप्पल और साड़ियों को पंजाब से मंगवाने वाली है, उसने मेरे लिए ख़ास सिल्क के सूट दक्षिण से मंगवाए हैं , उसने शपथ खाकर कहा है कि वह मुझे बिना कमीशन के बेचेगी, क्यूंकि मेरे स्टेंडर्ड को लेकर उसे बहुत टेंशन है.

उसका दृड़ विश्वास है कि नौकरीपेशा औरतों को सदा तरोताज़ा दिखना चाहिए . मैं मेंटेन रहूँ , मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहे, इसके लिए वह ओरिफ्ल्म, एमवे की एजेंट बन गई है. जबरदस्ती मुझे महंगे केल्शियम और प्रोटीन के उत्पाद पकड़ा गई . मैंने पैसे नहीं होने की बात कही तो हिकारत भरी नज़रों से बोली ''छिः - छिः कैसी बात करती हो ? नौकरी वाली होकर भी पैसों को लेकर रोती हो, अरे, अगले महीने दे देना , पैसे कहाँ भागे जा रहे हैं ''
मेरी अनुपस्थिति में अक्सर वह किसी न किसी गृह उद्योग वाली महिला के साथ नाना प्रकार के अचार, पापड़, बड़ी के बड़े बड़े पेकेट लेकर आ जाती है, उसके अनुसार मुझ जैसों की निःस्वार्थ मदद करना उसकी होबी है.

जब वह कहती है मेरे बहुत मज़े है क्यूंकि मैं रोज़ घर से बाहर निकलती हूँ ,नाना प्रकार के आदमियों के बीच मेरा उठना बैठना है, और उन्हें बस उनके पति का ही चेहरा सुबह - शाम देखने को मिलता है, तब मैं दफ्तर के बारे में सोचने लगती हूँ, जहाँ मेरे सहकर्मी बातों - बातों में तकरीबन रोज़ ही कहते हैं ''आपको क्या कमी है, दो - दो कमाने वाले हैं '' ये सहकर्मी ऑफिस में देरी से आते हैं, जल्दी चले जाते हैं, मनचाही छुट्टियाँ लेते हैं , नहीं मिलने पर महाभारत तक कर डालते हैं मैं बीमार भी पड़ जाऊं तो नाटक समझा जाता है, सबकी नज़र मेरी छुट्टियों पर लगी रहती हैं.

अक्सर बस में खड़ी - खड़ी जाती हूँ, कोई सीट नहीं देता, कंडक्टर तक कहता है ''आजकल की औरतों के बहुत मज़े हैं''

मेरे साथ काम करने वाले एक सहकर्मी के प्रति मेरी कुछ कोमल भावनाएं थीं , वह अक्सर काम - काज में मेरी मदद किया करता था .एक दिन उसकी मोटर साइकल में बैठकर बाज़ार गई तो वह उतरते समय निःसंकोच कहता है ''पांच रूपये खुले दे दीजियेगा .''

बरसात का वह दिन आज भी मेरी रूह कंपा देता है जब उफनते नाले के पास खड़ी होकर मैंने साहब से फोन पर पूछा था, ''सर, बरसाती नाले ने रास्ता रोक रखा है ,आना मुश्किल लग रहा है, आप केजुअल लीव लगा दीजिए. साहब फुंफ्कारे '''केजुअल स्वीकृत नहीं है, नहीं मिल सकती'' कहकर उन्होंने फोन रख दिया. मैंने गुस्से में आकर चप्पलों को हाथ में पकड़ा और दनदनाते हुए वह उफनता नाला पाल कर लिया, जिसमे दस मिनट पहले ही एक आदमी की बहकर मौत हो चुकी थी,

अक्सर रास्ते में हुए सड़क हादसों में मरे हुए लोगों के जहाँ तहां बिखरे हुए शरीर के टुकड़ों को देखती हूँ तो काँप उठती हूँ , और अपने भी इसी प्रकार के अंत की कल्पना मात्र से मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं .

वह कहती है कि उनके पति को औरतों का नौकरी करना पसंद नहीं है, उनके पति गर्व से मेरे सामने कई बार यह उद्घोष कर चुके हैं ,''इसे क्या ज़रुरत है नौकरी करने की? इतना पैसा तो मैं इसे हर महीने दे सकता हूँ''

मैं भी एक दिन पूछ ही बैठी '' अरे वाह बहिन, तुम्हारे पति कितने अच्छे हैं ,तुम्हें यूँ ही हर महीने इतना पैसा दे दिया करते हैं, अब तक तो आपने लाखों रूपये जोड़ लिए होंगे , वह बगलें झाँकने लगी, और अपने पति का मुँह देखने लगी , पति सकपका गया ''अरे ! इसने तो कभी पैसा माँगा ही नहीं,वर्ना क्या में देता नहीं?,
वह भी सफाई देती है, ''हाँ, मुझे कभी ज़रुरत ही नहीं पड़ी, वर्ना ये क्या देते नहीं', क्यूँ जी"?
''हाँ हाँ क्यूँ नहीं, चलो बहुत देर हो गई'', कहकर पति उठ गया और वे दोनों चलते बने.

7 comments:

  महफूज़ अली

24 May 2010 at 17:06

बहुत बढ़िया पोस्ट.

  दीपक 'मशाल'

24 May 2010 at 18:17

पुनः सुस्वागतम मैम.. फिर से इतिहास अपने को दोहराता हुआ(आपके व्यंग्य कि कितनी भी तारीफ की जाये कम ही है).

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

24 May 2010 at 19:55

बढ़िया लेखन के लिए शेफाली जी को बहुत-बहुत बधाई!

  Udan Tashtari

25 May 2010 at 00:14

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में सुश्री शैफ़ाली पाण्डे का स्वागत है इस बेहतरीन आलेख के साथ.

  sangeeta swarup

25 May 2010 at 13:20

नौकरीपेशा औरतों की दुखभरी दास्तान...व्यंग के साथ सच कहा है..

  Avinash Chandra

27 May 2010 at 10:00

bahut khoob aalekh hai. Achchha laga padhna

  सुरेश यादव

2 September 2010 at 18:39

शेफाली पाण्डेय को बधाई.

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