वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री दीपक चौरसिया 'मशाल'

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री दीपक मशाल की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम : दीपक चौरसिया 'मशाल'
माता- श्रीमति विजयलक्ष्मी
पिता- श्री लोकेश कुमार चौरसिया
जन्म- २४ सितम्बर १९८०, उरई(उत्तर प्रदेश)
प्रारंभिक शिक्षा- कोंच(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- जैवप्रौद्योगिकी में परास्नातक, पी एच डी(शोधार्थी)
संस्थान- क्वीन'स विश्वविद्यालय, बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैण्ड, संयुक्त गणराज्य

१४ वर्ष की आयु से साहित्य रचना प्रारंभ की, प्रारंभ में सिर्फ लघु कथाओं, व्यंग्य एवं निबंध लिखने का प्रयास किया। कुछ अभिन्न मित्रों से प्रेरित और प्रोत्साहित होके धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी, कहानियां लिखनी प्रारंभ कीं. अब तक देश व क्षेत्र की कुछ ख्यातिलब्ध पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा का प्रकाशन, रचनाकार एवं शब्दकार में कुछ ग़ज़ल एवं कविताओं को स्थान मिला. श्रोताओं की तालियाँ, प्रेम एवं आशीर्वचनरूपी सम्मान व पुरस्कार प्राप्त किया.

हाल ही में प्रथम काव्य संग्रह 'अनुभूतियाँ' का शिवना प्रकाशन सीहोर से प्रकाशन.
रुचियाँ- साहित्य के अलावा चित्रकारी, अभिनय, पाककला, समीक्षा, निर्देशन, संगीत सुनने में खास रूचि।
ब्लॉग- मसि कागद(http://swarnimpal.blogspot.com)
email: mashal.com@gmail.com
संपर्क- +४४ ७५१५४७४९०९



बंदरों से चिथने का पहला अहसास..------------------>>>दीपक 'मशाल'

ये तो सच है कि अपने जीवन का पहला अहसास कोई बड़ी मुश्किल से ही भूल सकता है. अब वह अहसास अच्छा है या बुरा उसका फर्क इतना पड़ता है कि बुरे अहसासों को लोग बहुत कम भूल पाते हैं. इंसानी फितरत ही ऐसी है.. देखिये ना हमारे साथ किये गए अहसान हम भूल सकते हैं लेकिन कोई अगर हमारा कुछ बिगाड़ दे या हमारे साथ जाने-अनजाने में कुछ बुरा कर दे तो मजाल कि हम आसानी से उसे भुला दें.
हाँ तो यहाँ आज एकबार फिर अपने जीवन के एक और पहले अहसास का जिक्र करने जा रहा हूँ.. और वो अहसास जुड़ा हुआ है मेरे खुद के साथ घटी पहली दुर्घटना से. आमतौर पर दुर्घटना शब्द बोलने पर मस्तिष्क के ७२ इंच के श्वेत परदे पर जो चित्र प्रक्षेपित होता है वो सड़क हादसे से जुड़ा ही लगता है या फिर उसमे किसी मशीन का कहीं ना कहीं कोई ना कोई योगदान प्रतीत होता है. लेकिन दुर्घटना सिर्फ सड़क या मशीन से जुड़ी ही नहीं होतीं कई बार आप अपने आप घर बैठे दुर्घटनाओं को निमंत्रण पत्र थमा देते हैं, जैसा कि मैंने किया देखिये कैसे-


''ये पहली दुर्घटना उस समय की है जब मैं ६-७ साल का रहा होऊंगा... तो हुआ ये कि मेरी बुआ जी ने अपनी शादी के बाद अपनी घनिष्ठ सहेलियों को और भाभियों को एक पार्टी दी थी जैसा कि भारत में ये चलन है. मेरे घर के सामने ही एक पारिवारिक मित्र रहते हैं जिनके साथ मेरे परिवार के कई सालों से घर जैसे या उससे बढ़कर सम्बन्ध हैं, तो उस परिवार से एक बच्चा(बच्चा इसलिए कि वो मुझ से भी २ साल छोटा था) अपनी मम्मी जी के साथ पार्टी में शामिल था. मैं बहुत छोटा होने के कारण कोई ज्यादा काम तो नहीं कर रहा था लेकिन हाँ कभी किसी को पानी, समोसा या शरबत चाहिए होता तो ला देता था. जाने उस बच्चे का क्या मन हुआ कि वो बोला कि उसे घर जाना है और उसका नाश्ता उसके साथ भिजवा दिया जाये क्योंकि प्लेट बड़ी होने की वजह से उसके हाथ में ना आएगी. बुआ जी ने मुझसे उसको उसके घर तक भेज आने और नाश्ता भी दे आने के लिए कहा.

अब मेरे दोनों हाथों में एक में रसगुल्ले और एक में समोसे.. मैं आगे-आगे चल दिया. हाँ तो बताना जरूरी है कि उनका घर ऐसा बना हुआ था कि मुख्य द्वार से अन्दर जाकर एक काफी लम्बी गैलरी फिर आँगन फिर सीढियां और फिर छत और उसके बाद वो कमरे जहाँ पर उसका घर था. हमारे यहाँ बंदरों की बहुतायत है इसलिए रोज ही उनसे मुठभेड़ होती रहती है और जब कभी छत पर गेंहू या धान वगैरह सूखने के लिए डालते तो फिर इन वानर श्रेष्ठों की कभी-कभी छतों पर पार्टी भी हो जाया करती थी. तो दुर्भाग्यवश उस दिन उनकी छत पर गेंहूं सूख रहा था और मैं उस बालक का नेतृत्व करते हुए जब छत पर पहुंचा तो देखा कि करीब १०-११ बन्दर छत पर कच्चे गेंहू का आनंद ले रहे हैं. वो बच्चा तो बन्दर देखते ही चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतर लिया और मैं जब तक पलटता कि किसी शातिर बन्दर ने मेरे हाथ के रसगुल्लों पर नीयत ख़राब कर दी. खुद तो ठीक बाकी सब बंदरों को भी 'खों-खों' कर पार्टी का माल उड़ाने का इशारा कर दिया.
बस फिर क्या था घेर लिया गया मुझे. मैं भी कुछ ज्यादा ही अक्लमंद निकला और ये सोच लिया कि भाई इन्हें दे दिए तो और रसगुल्ले कहाँ से लाऊंगा? बस फिर क्या था चुपचाप वहीँ बैठ गया और उनके आक्रमण झेलता रहा. अब एक धरमेंदर और १०-११ अमरीश पुरी तो कब तक बचता भाई.. जब लगा कि उनके दाँत और नाखून शरीर में कई जगह तो लगे ही लेकिन सिर में कुछ ज्यादा ही गड़ चुके हैं और अब ज्यादा देर की तो मीठे सीरे के बजाय इन्हें मेरे शरीर में बहता लाल सीरा पसंद आ जायेगा और वैसे भी हाथ में जो प्लेट थीं वो दर्द के कारण कब मुट्ठी में भींच गयीं पता भी ना चला, तो दोबारा अकल लगाई कि भाई अब छोड़ दे ये सने हुए रसगुल्ले अब कोई ना खायेगा.
उधर वो बालक नीचे जाके चुपचाप खड़ा रहा और किसी को इत्तला भी नहीं किया कि मेरे साथ क्या ज़ुल्म हो गया. :) मैं कुछ इस उम्मीद में था कि वो किसी को बताएगा तो मेरे रक्षक कोई देव आयेंगे, पर ऐसा कुछ ना हुआ अंततः जब मैंने रसगुल्ले और समोसे वहीँ फेंक दिए तो सारे लफंगे बन्दर मुझपर जोर-आज़माइश छोड़ उनका इंटरव्यू लेने के लिए मुखातिब हुए और मैं नीचे उतर कर आँगन, गलियारा पार करता हुआ बाहर चबूतरे पर जाकर खड़ा हो गया.
अब चूंकि मेरा घर सड़क पार करते ही सामने ही था तो मेरी मम्मी ने छत से मुझे देख लिया. तब तक मेरी स्कूल की सफ़ेद शर्ट मुफ्त में पूरी सुर्ख हो चुकी थी. मम्मी तो देखते ही गश खा कर गिर गयीं और जब वो गिरीं तो बाकी लोगों कि नज़र भी मुझ पर इनायत हुई कि मम्मी क्या देख कर मूर्छित हो गयीं. जब तक लोग आये तो दर्द और रक्तस्राव के कारण ग्लेडिएटर दीपक जी बेहोश होने की हालात में पहुँच गए थे.

बस आनन-फानन में ताऊ जी के क्लिनिक में पहुँचाया गया, फिर क्या हुआ ज्यादा याद नहीं हाँ बस इतना याद है कि मुझे चेतन रखने के लिए डॉक्टर ताऊ अपने बेटे से कह रहे थे कि- 'देखो कितना बहादुर बच्चा है १० बंदरों से लड़ा और ७ टाँके सर में लगवाए तब भी नहीं रोया और एक तुम हो जो एक इंजेक्शन में रोते हो'. अब तारीफ सुन मैं भी खुद को पहलवान समझने लगा था जबकि भाई हकीकत में तो बंदरों से लड़ा नहीं बल्कि चिथा था. :) ''

तो कैसी लगी ये राम ऊप्स दीपक कहानी?? यानि बंदरों से चिथने का पहला अहसास.. वैसे आखिरी भी तो यही था क्योंकि इसके बाद बंदरों का आतंक मन से ऐसा निकला कि जब भी बन्दर देखता तो उनकी तरफ खाली हाथ ही दौड़ पड़ता और अबकी वो बेचारे भाग रहे होते मुझे देखकर..
दीपक 'मशाल'


तारी 5 जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगोता मे : पं.डी.के.शर्मा "वत्स"

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में प. डी.के. शर्मा "वत्स", की रचना पढिये.

हिन्दी ब्लागिंग और टिप्पणियों का हिसाब-किताब (हास्य कथा)

(दरवाजे पर दस्तक की आवाज)
ललित शर्मा:- अरी ओर भगवान! जरा देखना तो सही कौन नासपीटा इतनी सुबह सुबह दरवाजा खटकटा रहा है।
(इतनी देर में फिर से दरवाजे पर ठक ठक की आवाज सुनाई देने लगी)
ललित:- (खीझ कर) तुम मत सुनना! मुझे ही उठना पडेगा। हाँ भाई बोलो तो सही कौन हो। भई हमसे कोई गलती हो गई क्या जो इतनी सुबह सुबह दरवाजा ही तोडने पर तुले हो।
आगन्तुक:- अरे भाई पहले दरवाजा तो खोलिए! क्या बाहर से ही टालने का इरादा है।
ललित शर्मा:- ठहरिए आता हूँ!
"अरे वाह्! मिश्रा जी.....आईये आईये...धन्यभाग हमारे जो आप पधारे! आईये बैठिए...
मिश्रा जी आसन ग्रहण कर लेते हैं तो ललित जी अपनी धर्मपत्नि को आवाज लगाते हैं। "अरी ओ भागवान! जरा इधर तो आना..."
श्रीमति आती हैं तो ललित जी बडे हर्षित मन से उनका मिश्रा जी से परिचय कराते हैं।" देख आज हमारे ब्लागर मित्र मिश्रा जी आए हैं...जा जरा जल्दी बढिया से चाय-नाश्ते का प्रबन्ध कर.." सुनते ही श्रीमति जी रसोई की ओर प्रस्थान कर लेती हैं और इधर ललित जी अपने ब्लागर मित्र मिश्रा जी से वार्तालाप में व्यस्त हो जाते हैं।
"अच्छा मिश्रा जी! ये तो बताईये कि अचानक कैसे आना हो गया...न कोई सूचना, न फोन"
मिश्रा जी:- भई बात ये है कि हम आज आपसे अपना हिसाब किताब क्लियर करने आए हैं।
सुनते ही ललित जी हैरान, "हिसाब! अजी मिश्रा जी कैसा हिसाब ? हमने आपसे कौन सा लोन ले रखा है जो आप हमसे वसूल करने आए हैं।
अब पता नहीं इनके मन में क्या आया कि इन्होने धर्मपत्नि को आवाज देकर चाय नाश्ता भेजने से मना कर दिया। " जरा ठहर जाओ, चाय नाश्ता अभी मत भेजना..."
भई मिश्रा जी साफ साफ कहिए, हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि आप किस हिसाब किताब की बात कर रहे हैं"
मिश्रा जी अपनी जेब से एक नोटबुक निकालते हैं और उसके पन्ने उलटते हुए बोलते चले जाते हैं...."बात ये है कि पिछले कईं दिनों से मैं आपको फोन करके कहने भी वाला था, लेकिन फिर ये सोचकर रूक गया कि कुछ दिनों बाद मेरा रायपुर जाना होगा ही, सो उसी समय आमने सामने बैठ कर ही क्लियर कर लेंगें"
भई क्या क्लियर कर लेंगें ? कुछ पता तो चले....आप तो पहेलियाँ बुझाए चले जा रहे हैं"
"भई बताता हूँ, जरा रूकिए तो सही.....अच्छा ये बताईये कि ब्लागिंग में रहते हम लोगों को आपस में जुडे हुए एक साल से अधिक तो हो ही चुका है न ?"
"जी हाँ, बिल्कुल! आप तो हमारे नजदीकी मित्रों में से हैं"
"वो सब तो ठीक है! मित्रता अपनी जगह है और हिसाब किताब अपनी जगह"
"अरे! फिर वही बात! भाई कौन सा हिसाब किताब ?"
मिश्रा जी अपने हाथ में पकडी नोटबुक ललित शर्मा के आगे कर देते हैं। ये देखिए पिछले एक साल में हमने आपकी जिस जिस पोस्ट पर जब जब टिप्पणी की है, उन सबका हिसाब इसमें लिखा हुआ है। ये देखिए कुल 420 टिप्पणियाँ हमारे द्वारा की गई हैं, ओर ये इधर देखिए साल भर में हमारी पोस्टों पर आपने कुल कितनी टिप्पणियाँ की हैं, महज 136. अभी ले देकर आपकी तरफ हमारी 284 टिप्पणियाँ बकाया रहती हैं। लेकिन आप हैं कि लौटाने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी कुछ दिनों से हमारी किसी भी पोस्ट पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आ रही...जब कि हमारी टिप्पणी रोजाना आपको पहुँच रही है। भाई ऎसा कैसे चलेगा?
"अरे मिश्रा जी! क्या बताएं आपको, आजकल बस कुछ समय ही नहीं मिल पा रहा.......वर्ना आपकी पोस्ट पर हम न टिप्पयाएं, ऎसा भला कभी हो सकता है."
"अरे वाह्! ये भी खूब कही...हमारी पोस्ट पढने के लिए आपके पास समय नहीं होता....ओर बाकी दिन भर जो 365 ब्लागों की कमेन्ट सूची में आपकी ये बनवारी लाल सरीखी मूच्छों वाली फोटू चस्पा मिलती है, वो शायद कोई जादू मन्तर से लग जाती होगी"
"ओह हो! अजी छोडिए भी इन बातो को... कुछ ओर सुनाईये"
"अरे ऎसे कैसे छोड दें....क्या हमारा समय फालतू का है जो हम आपको टिप्पणियाँ देने में खर्च करते हैं? क्या सरकार की ओर से बिजली हमें मुफ्त में मिलती है या इन्टरनैट सेवा कम्पनी हमारे बाबा जी की है, जिसके पैसे नहीं लगते! अगर इस जमाने में हम यूँ ही फोकट में दिन भर इन्टरनैट पर घूम घूम कर ब्लागों पर टिप्पयाते रहे न तो जल्द ही किसी गुरूद्वारे की शरण लेनी पड जाएगी। अरे भाई हम इतना समय और पैसा जो नष्ट करते हैं सिर्फ इसीलिए न कि हमें बदले में उसका कुछ प्रतिफल मिले, चाहे टिप्पणी के बदले टिप्पणी ही सही। लेकिन आप हैं कि उसमें भी धोखाधडी किए जा रहे हैं. ये तो सरासर हिन्दी ब्लागिंग के मूल सिद्धान्तों को नकारना हुआ। अगर आप अब भी इन्कार करते हैं तो हमारे पास सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं, या तो हम आपके खिलाफ अपने ब्लाग पर दो चार गरियाती हुई पोस्टें लिख मारें या फिर अपनी "चन्गू-मन्गू ब्लागर एसोसियशन" में अपनी शिकायत दर्ज करवाएं। अब आप ही बताईये कि हम क्या करें"
"अरे छोडिए मिश्रा जी, अच्छा चलिए आज आपकी शिकायत दूर कर देते हैं। रात भर जागकर आज आपकी सभी टिप्पणियाँ लौटा देता हूँ। अब तो खुश!"......चलिए चाय पीते हैं.....ओ भागवान!
"जी! आई!" कहते ही भाभी जी चाय नाश्ता ले आई.......मानो चाय की प्लेट थामे इन्तजार में दरवाजे के बाहर ही खडी हों...
दोनों परम मित्रों नें चाय नाश्ता किया....कुछ देर इधर उधर की बातें की और फिर मिश्रा जी दुआ सलाम करके वापिसी के लिए निकल लिए...ओर इधर ललित शर्मा जी इनका हिसाब किताब चुकता करने लैपटोप खोलकर रात भर बैठे रहे....जब सारा ऋण चुकता हो गया तो अगले दिन ही उधर से मिश्रा जी का फोन भी आ गया...आभार व्यक्त करने हेतु!
"हैल्लो! हाँ भाई ललित जी, आपकी टिप्पणियाँ वसूल पाई....इसके लिए आपका आभार. हाँ आगे से टिप्पणी साथ के साथ ही चुकता कर दिया करें. ज्यादा लम्बे चौडे हिसाब-किताब में गडबड होने का डर रहता है। अच्छा रखता हूँ, राम-राम्! भाभी जी को हमारी ओर से चरण स्पर्श कीजिएगा"
ललित जी नें फोन बन्द किया ही था कि साथ खडी उनकी श्रीमति जी पूछ बैठी--"अजी किसका फोन था?"
"वो कल जो आए थे अपने मिश्रा जी, उन्ही का था.....अरे हाँ याद आया" इतना कहते ही ललित जी नीचे को झुकने लगे.....अब पता नहीं उनकी कोई चीज गिर गई थी, जिसे कि वो उठाने के लिए झुके थे या फिर मिश्रा जी द्वारा फोन पर कहा गया अन्तिम वाक्य उन्हे याद आ गया था........राम जाने! :-)




तारी5जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री अविनाश वाचस्‍पति

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री अविनाश वाचस्पति की रचना पढिये.

लेखक परिचय :-
अविनाश वाचस्‍पति,
साहित्‍यकार सदन, पहली मंजिल,
195 सन्‍त नगर,
नई दिल्‍ली 110065
मोबाइल 09868166586/09711537664



अमिताभ बच्‍चन एक दिन अविनाश वाचस्‍पति के घर आए

एक दिन अमिताभ बच्चन हमारे घर आए
घर में अचानक उन्हें देख हम चकराए
अमिताभ भाई ने हमें गले से लगाया
हमको अंदर तक रोमांच हो आया

हम मन ही मन सोच रहे थे
इस रहस्य को टटोल रहे थे
तीर तुक्के उन पर फेंक रहे थे
निशाना न लगने पर झेंप रहे थे

लगता है अमिताभ भाई
करोड़पति तृतीय खेल रहे हैं
पहले फोन पर करते थे बात
अब घर घर डोल रहे हैं

कवि मित्र पवन चंदन प्रतिभागी होंगे
करोड़पति बनने की लाईन में डटे होंगे
डोर ए फ्रेन्ड्स का ऑप्शन चुना होगा
अरबपति बनने का ताना बाना बुना होगा
कौन बनेगा अरबपति ?
अमिताभ बोले नहीं वाचस्पति।

अब तो शाहरूख खेल खिला रहे हैं
चैक पर साईन करने से डर दिखा रहे हैं
करोड़पति बनने के लिए
लोग तो अब भी खूब किस्मत आजमा रहे हैं
शाहरूख गले मिल रहे हैं, जफ्फी पा रहे हैं
टोटके तो किंग खान के भी लोगों को खूब भा रहे हैं

मैंने कहा यह सारी दुनिया जानती है
टीवी ने आपके दीवानों को दीवाना और बनाया है
और तो और शाहरूख भी आपका दीवाना बनने से
नहीं बच पाया है तो बाकियों की क्या बिसात है

अभी तो न जाने किन मुद्दों पर चर्चा चलती
तभी श्रीमतीजी ने चाय के लिये आवाज लगाई
चाय के लिए किया मना और खींच ली पूरी रजाई
पर फिर न तो नींद आई और न ही अमिताभ भाई
बिग बी का साथ छूट गया और हमारा सपना टूट गया।


तारी 4 जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री विनोद कुमार पांडेय

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री विनोद कुमार पांडेय की रचना पढिये.

लेखक परिचय :-
नाम-विनोद कुमार पांडेय

जन्मस्थान: वाराणसी

शिक्षा: मास्टर ऑफ कंप्यूटर अप्लिकेशन
उम्र: २६ वर्ष
व्यवसाय: नौकरी
शौक: पढ़ना एवम् लिखना
ब्लाग : मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने


कुछ हीरोबाज़,जो अधिकतर वाहन स्टैंड पर पाएँ जाते है..

(विनोद कुमार पांडेय)

रजनीगंधा खाकर के,कुल दाँत सड़ाये बैठे हैं,

हीरोबाज़ी के ठप्पा, मुँह पर ठपकाये बैठे हैं.

लतखोरी मे पारंगत ,सब शरम घोल कर गटक गये,

दाँत निपोरी के तो जैसे,टिकिया खाए बैठे हैं,

पूर्ण लफंगा, सब से पंगा,फटा शर्ट पैंट अधटंगा,

चिकती चिकती लगा लगा कर,बबुआ काम चलाए बैठे हैं,

चार लफंगे और जोड़ कर,घूम रहे हैं,इधर उधर,

मँगनी की पल्सर लेकर , ई धूम मचाये बैठे हैं,

घर मे लोग रहे जैसे भी,इनकी शान सलामत हो,

पास पड़ोसी मे बस झूठी,धाक जमाए बैठे हैं,

बने निठल्ले घूम रहे है, ना करनी करतूत,

नाम करेंगे फ्यूचर मे ,सब को भरमाए बैठे हैं,

माँ,बापू को बहला-फुसला,रूपिया ऐठ रहे घर से,

बदनामी ही सही गुरु ,पर नाम कमाए बैठे हैं,




तारी4जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : सुश्री वाणी शर्मा

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में सुश्री वाणी शर्मा की रचना पढिये.

लेखिका परिचय ....
नाम : वाणी शर्मा
शिक्षा : एम . ए .(इतिहास ), एम . ए प्रिविअस (हिंदी )
साधारण गृहिणी ...पढने का अत्यधिक शौक और कभी कभी लिख लेने का प्रयास हिंदी ब्लोगिंग तक ले आया है ...
ब्लाग : ज्ञानवाणी और गीत मेरे.........


क्या आप जानते हैं ...अंग्रेज मासूम भारतीयों (पाकिस्तानी और बंगलादेशी भी गिन लीजिये ) पर पूरे 100 वर्षों तकनिरंकुश शासन किस प्रकार कर पाए ...इस दौरान उनकी रणनीति क्या थी ...
भारत के इतने बड़े भू- भाग और जनता को गुलाम बनाये रखने के लिए अंग्रेजों ने एक ख़ास मूल मंत्र अपनाया था...उनका मानना था ... " इनको भूखा रखो ...नंगा रखो ...बस इन्हे सम्मान दो ..." उनकी शासन व्यवस्था को चलानेके लिए भेजे गए अफसरों को खास तौर पर इस रणनीति को अपनाने की ताकीद की जाती थी ....बाद के वर्षों में इसमे"फूट डालो राज्य करो" का मंत्र भी जुड़ गया था ...अब इतने लंबे अरसे तक गुलामी की बेड़ियों में जकडे रहे ....अंग्रेजोंका नमक खाया ...तो कुछ कुछ उनके गुणों (!!) का अवशेष तो हम भारतीयों में रहना स्वाभाविक ही है ...अब इसकेपीछे किस वैज्ञानिक का कौन सा फार्मूला लगेगा ...ये बताने जितनी अपने शैक्षणिक योग्यता नही है ...ये आप स्वयंसोचें ...हो सके तो हमें भी बताएं ...
अंग्रेज चले गए ...अपनी अंग्रेजियत और निरंकुश शासन चलाने के ....निरीह जनता को वर्षों गुलाम बनाये रखने केअपने मूल मंत्र उपहार में हमें दे गए ...कालांतर में इनका उन्नयन होता गया और मंत्र जुड़ते गए ...कुछ मंत्रो कीबानगी यहाँ है ....


बेशक घंटो बिजली कटौती करें, दरें बढायें

कूलर
एसी पर दाम घटाए


शिक्षा चिकित्सा गाँव -गाँव उपलब्ध हो
घर घर मोबाइल इन्टरनेट पहुंचाए
डीजल पेट्रोल के दाम बढायें
कारें मोटरसाईकिल सस्ती कराएँ

किसानों को देसी बीज खाद पानी बिजली उपलब्ध ना हो
विदेशी कीटाणुनाशक बोरी भर सस्ती पहुंचाएं

कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगा पायें
मिस इंडिया प्रतियोगिता जरुर कराएँ

आटा चीनी दाल राशन महंगा हो भले
सस्ती शराब जरुर उपलब्ध कराएँ

पंचायत नगरपालिका में अशिक्षित महिलाओं का प्रतिशत बढाये
प्रशिक्षित किरण बेदी को जबरन सेवानिवृति दिलाएं

लोकल बस, मेट्रो के पास मंहगे कर दे
धार्मिक यात्रायें मुफ्त कराएँ

सैनिक रक्षा खर्चों में कटौती कर दे
सांसद विधायकों के भत्ते बढायें

पुलिस के लिए टूटी जिप्सी घटिया बाईक काफी हैं
जनता के नुमायिन्दों को लिमोजिन दिलवाएं

जनता की नब्ज दबाने को दिए हैं ये थोड़े से उपाय
कुछ अपना दिमाग दौडाएं

राजनैतिक दलों को और भी नए गुर सिखाएं
कुछ अपने भी विचार बताएं


आपके अनमोल विचारों और सुझावों का स्वागत और इंतज़ार है ....इनाम विनाम दिलाने जैसा हमारा आर्थिक स्तरनही है ...हम तो बस ये दुआ कर सकते हैं कि ....आपके उपायों और सुझावों पर राजनैतिक दलों की दृष्टि पड़ जाए...शायद किसी दल के थिंक टैंक में आपका नाम जुड़ जाए...!!



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तारी3 जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री जी.के. अवधिया

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री जी. के. अवधिया की रचना पढिये.

लेखक परिचय :-
नाम : जी.के. अवधिया
उम्र : 59 वर्ष, सेवानिवृत
शहर : रायपुर (छ्ग)

मैं एक संवेदनशील, सादे विचार वाला, सरल, सेवानिवृत व्यक्ति हूँ। मुझे अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व है। आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है।

तरस जाओगे भीख देने के लिये यदि हम मांगने न आयें तो

"कुछ दे दो बाबा, भगवान आपका भला करेगा।" मेरे पास आकर वो बोला। अच्छा खासा जवान आदमी था, किसी प्रकार की शारीरिक अपंगता भी न थी।

"हट्टे-जवान आदमी होकर भी भीख मांगते शर्म नहीं आती। कुछ काम क्यों नहीं करते?" मैंने कहा।

"काम ही तो कर रहा हूँ। क्या भीख मांगना काम नहीं है? हम लोग यदि मांगने न आयें तो आप लोग भीख देने के लिये तरस जायेंगे। कुछ देना है तो दीजिये, फालतू उपदेश देकर मेरे धंधे का वक्त खोटा मत कीजिये।"

उसकी बातें सुनकर मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये। मैंने सोचा ठीक ही तो कह रहा है। जेब से एक रुपये सिक्का निकाल कर कहा, ये लो।

उसने एक के सिक्के को तुच्छ नजरों से देखा और बोला, "एक रुपये से क्या होता है साहब आजकल? एक रुपये में एक सिगरेट तक तो नहीं मिलता। सिगरेट की बात छोड़िये, एक पानी पाउच तक तो नहीं आता, रायपुर की इस बढ़ी हुई गर्मी में दुकानदार लोग एक रुपये के पानी पाउच को दो रुपये से तीन रुपये तक में बेच रहे हैं, लोग यह तक नहीं जानते कि अधिक पैसे लेकर उन्हें महीनों पुराने स्टॉक का सड़ा पानी दिया जा रहा है। दस रुपये नहीं तो कम से कम पाँच रुपये तो दीजिये।"

मैं बोला, "देखो, एक रुपया लेना है तो लो नहीं तो चलते बनो।"

"वाह साहब, दोस्तों के साथ 'बार' में बैठ कर दारू पीने में तो हजार पाँच सौ रुपये खर्च कर दोगे। 'वेटर' को ही बीस पचीस रुपये टिप दे दोगे। पर हमें दस पाँच रुपये भी नहीं दे सकते।"

उसकी बातों में अब मुझे भी थोड़ा रस आने लगा था। मैंने कहा, "दारू चाहे अच्छा हो या बुरा पर वह कम से कम हमारे अंग में तो जाता है, वेटर भी अपनी सेवाएँ देता है। पर तुम्हें देने से भला क्या मिलेगा?"

"हमें देने से आपको पुण्य मिलेगा साहब जो परलोक में आपके काम आयेगा। और सबसे बड़ी बात तो हमारा आशीर्वाद मिलेगा जो अमूल्य है और इस लोक में आपकी बढ़ती करेगा। बस अब जल्दी से दस रुपये दे दीजिये।"

"देख भाई, एक रुपये ले कर चलता बन। और भी लोगों से मांगेगा तो दस पाँच रुपये बन ही जायेंगे।"

"एक रुपया तो मैं किसी से नहीं लेता साहब, मैं तो पुण्य और आशीर्वाद का व्होलसेल डीलर हूँ। देना है तो कम से कम पाँच रुपये दीजिये।"

"मैं चिल्हर पुण्य और आशीर्वाद लेना चाहता हूँ भाई थोक नहीं, जाओ तुम कोई और ग्राहक ढूंढो और मैं कोई चिल्हर दुकानदार देखूँगा।"

कुछ देर तो वो मुझे बड़ी हिकारत भरी नजर से देखता रहा फिर चला गया।

अब मेरे भी संस्कार कुछ ऐसे हैं कि वह एक रुपया मुझे काटने लगा, जब तक मैं उस रुपये को दान में न दे देता मुझे चैन नहीं मिलने वाला था। अब मैं इन्तिजार करने लगा कि कोई दूसरा भिखारी आये तो मैं उसे वो एक रुपया दे दूँ।

कुछ देर बाद मेरी मुराद पूरी हुई और एक दूसरा भिखारी मेरे पास आ कर बोला, "एक रुपया दे दीजिये साहब, गरीब भिखारी को।"

था तो वह भी पहले वाले जैसा ही याने कि हट्टा कट्टा जवान पर उसे काम करने के लिये कहने की हिम्मत अब मेरी न हुई क्योंकि मैं खुद ही अपने एक रुपये से पीछा छुड़ाना चाहता था। पर मेरे अचेतन में एकाएक पहले भिखारी के शब्द गूँज उठे और अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "एक रुपये से आजकल होता क्या है?"

वो बोला, "होता तो कुछ भी नहीं है साहब पर देने वाली की औकात देख कर मांगना पड़ता है।"

मुझे पहली बार अपनी औकात का पता चला। मैंने उसे एक रुपया थमाते हुये कहा, "तुम मांगने वालों की किस्मत खुल गई है कि रायपुर में एक जमाने से अठन्नी चवन्नी का चलन बन्द हो चुका है। नहीं तो एक आदमी से मुश्किल चवन्नी ही मिलती, मैं भी तुम्हें चवन्नी ही दिया होता।"

"तो क्या आप समझते हैं कि मैं आपकी चवन्नी ले लेता?" आश्चर्यमिश्रित स्वर में उसने मुझसे कहा, "नहीं साहब, मैं कभी भी आपकी चवन्नी नहीं लेता क्योंकि मैं अपने से कम औकात वालों से भीख नहीं लेता बल्कि उन्हें खुद ही कुछ दे दिया करता हूँ।"

एक रुपये से मेरा पीछा छूट चुका था इसलिये मैं खुश था और इसीलिये आगे बिना कुछ कहे सुने उसे चुपचाप चले जाने दिया।


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तारी 3 जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री संजय कुमार चौरसिया

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री संजय कुमार चौरसिया की रचना पढिये

लेखक परिचय
नाम :-- संजय कुमार चौरसिया

माता :-- श्रीमती जानकी देवी चौरसिया

पिता :-- श्री जगत नारायण चौरसिया

जन्म :--- १५ मार्च १९७८

शिक्षा :--- M. COM

स्थान :---- शिवपुरी , मध्य-प्रदेश

ब्लाग : संजय कुमार



कहीं नेताजी की नजर ना पड़ जाये

हिंदुस्तान के नेताजी का क्या कहना ! एक पहुंचे हुए या विख्यात पुरुष के रूप मैं जाने जाते हैं ! या यूँ कह सकते हैं ! वह व्यक्ति जिसके पास होती है पारखी नजर ! और पहुंचे हुए लोगों की खोज करने बाला ! अरे नहीं समझे अपनी पार्टी के लिए बिख्यात लोगो को ढूढने बाला ! जिन्होंने अपनी ही पार्टियों के लिए ढूढे ऐसे लोग जो पहले से ही पहुंचे हुए थे ! अरे भई हम सबके प्यारे बाहुबली सांसद नेता ! आज ऐसे ही लोगों की तलाश मैं रहते हैं ! हमारे खादीधारी नेता ! फिर चाहे कोई भी कीमत हमारी प्यारी जनता को चुकानी पड़े ! क्या आप भूल गए डाकू फूलनदेवी जो कभी दस्यु सुन्दरी हुआ करती थी ! जब खून-खरावा छोड़ दिया तो हमारे नेताओं की खोजी नजर उन पर पड़ ही गयी! और देखते देखते हम सब के बीच हमारी प्रिये नेता बन गयी ! फिर शहाबुद्दीन हों या राजा भैया ! पप्पू यादव हों या अन्य कोई सांसद यह सब कहाँ थे पहले ! जब इनके ऊपर हमारे नेताओं का रहमों करम हुआ !और आज हम सब के बीच मैं यह लोग आराम की (ऐश ) जिंदगी बिना किसी झंझट के ! मजे से सरकारी खर्चे पर जी रहे हैं ! सब हमारे नेताओं की बजह से ! जय हो देश के महान पुरुषों ............कुछ दिनों पहले खबर लगी की कुख्यात सरगना अबू-सलेम भी अब चुनाव मैदान मैं कून्दने बाला हैं ! तब तो मजा आ जायेगा ! हमारे नेताजी इनसे भी बड़ा बाला कोई कुख्यात, कहीं से भी किसी भी हालत मैं ढूंढकर ले आयेंगे और इसके विपक्ष मैं खड़ा कर देंगे ! और फिर यह लोग इस देश को कुख्याय लोगों की ऐशगाह बना देंगे !

हमारी सरकार तो सिर्फ इतना सा आदेश दे दे की , प्यारे नेताओं आप को खुली छूट दी जाती है ! आप हिंदुस्तान की किसी भी जेल से कोई भी छोटा बड़ा आतंकवादी, छोटा बड़ा गंगस्टर , सबसे बड़ा हत्यारा जिसके सर १०० -१५० खून हों या कोई नरपिशाच ! और इस तरह की सारी खूबियों बाले इन्सान को अपनी पार्टी के लिए चुन सकते हैं ! तो देखिये क्या होता है फिर ! अरे भई पार्टिया और आज के यह दल कम पड़ जायेंगे ! या फिर कोई नेता अपनी असली पार्टी को छोड़कर ! इन लोगों के साथ एक नयी पार्टी का गठन कर लेंगे ! काश कुख्यात सरगना "डी कम्पनी " भी भारत मैं होता तो हमारे नेताजी उनको भी अपनी पार्टी मैं लेने के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाते ! पर बो तो कहीं दूर बैठा है ! जिसको हमारे नेताजी नहीं खोज पा रहे हैं ! अभी तक फंसी की सजा काट रहे अफजल गुरु पर भी नेताओं की नजर नहीं पड़ी ! नहीं तो संसद पर हमले मैं शामिल यह !वहीँ संसद मैं आज बैठा होता ! सब नेताजी की कृपा है !

अगर यह इजाजत मिल जाये की! आप लोग कहीं से भी अपनी पार्टी के लिए उम्मीदवार चुन सकते हो ! देश या विदेश कहीं से भी ! तो नेताजी सबसे पहले पाकिस्तान भागेंगे क्योंकि हमारे यहाँ से ज्यादा तो वहां पर अनेकों खूबियों बाले एक से बढ़कर एक मिल जायेंगे ! मैं कहता हूँ नेताजी को वहां जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी ! हमारे यहाँ की जेलों मैं कई कुख्यात आतंकवादी बंद हैं ! जिनकी देखभाल हम किसी अतिथि से कम नहीं करते ! उन्हीं मैं से कोई एक आध अच्छा ढूंढ लेंगे ! अरे मैं तो भूल ही गया ताजा ताजा आतंकवादी तो हम सब जानते ही हैं ! अरे भई मुंबई हमलों का दोषी "मियां कसाब" अब तो उसे फंसी भी हो गयी है ! उसके पास तो सब कुछ हैं ! क्योंकि उसे फंसी की सजा तो हो गयी , लेकिन उसे फंसी मिलती कब है, यह कोई नहीं जानता ! अगर नहीं मिली तो वह जरूर इन नेताओं की पकड़ मैं एक दिन आ जायेगा ! और फिर ..........

क्योंकि आज के दिन हम सब के प्रिये राजीव गाँधी की हत्या करने बाली महिला नलिनी की फांसी की सजा भी माफ़ हो गयी है ! और वह अब बाहर आने बाली है ! उस पर भी इन नेताओं की नजर पड़ेगी ! और फिर क्या होगा यह बात हम सब अच्छी तरह से जानते हैं !


अब तो हम सबको डर लगने लगा है , की ऐसे लोगों पर ...........कहीं नेताजी की नजर ना पड़ जाये


धन्यवाद


धन्यवाद
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तारी 2जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : सुश्री निर्मला कपिला

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में सुश्री निर्मला कपिला की रचना पढिये.

लेखिका परिचय : निर्मला कपिला
पंजाब सरकार के सेहत कल्यान विभाग मे नौकरी करने के बाद चीफ फार्मासिस्ट के पद से सेवानिवृ्त् होने के बाद लेखन कार्य के लिये समर्पित हूँ1 इसके अतिरिक्त पढना लिखना समाज सेवा मे गरीब बच्चों कि शिक्षा के लिये 1सहायता कला साहित्य प्रचार्मंच की अध्य़क्ष हूँ 1

2004 स लेखन विधिवत रूप से शुरु किया 1 ाब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हुई दो छपने के लिये तयार हैं
1. सुबह से पहले---कविता संग्रह 2. वीरबहुटी---कहानी संग्रह 3. प्रेम सेतु---कहानी संग्रह
अनेक पत्र पत्रिकायों मे प्रकाशन, विविध भारती जालन्धर से कहानी का प्रसारण सम्मान, पँजाब सहित्य कला अकादमी जालन्धर की ओरे से सम्मान, ग्वालियर सहित्य अकादमी ग्वालियर की ओर से शब्दमाधुरी सम्मान .शब्द भारती सम्मान व विशिष्ठ सम्मान
देश की 51 कवियत्रियों की काव्य् कृ्ति शब्द माधुरी मे कविताओं का प्रकाशन कला प्रयास मँच नंगल दुआरा सम्मानित इसके अतिरिक्त कई कवि सम्मेलनो़ मे सम्मानित
परिकल्पना ब्लाग दुआरा 2009 के शीर्ष 9 महिला चिठाकारो मे नाम
संवाद दात काम दुयारा श्रेषठ कहानी लेखन पुरुस्कार
मेरे खुशहाल परिवार मे मेरे पती जो एन एफ एल प्राईवेट लि से डिप्टी मैनेजर रिटायर हुये हैं और तीन बेटियाँ उच्चशिक्षा प्राप्त कर अपने ससुराल मे सुखी जीवन जी रही हैं



अन्तर्राष्टिय महिला दिवस

(व्यंग कविता)


आज महिला दिवस उस पर ये छुटी
हमने भी इसे मनाने की हठ कर ली
सोच लिया कि अपना अधिकार जताना है
हमे महिला मीटिंग मे जाना है
सुबह उठते ह हमने किया ऎलान्
हमारे तेवर देख कर पती थे हैरान
आज गर्व से अपना चेहरा था तमतमाया
उस पर महिला दिवस का था रंग छाया
पती से कहा उँची आवाज़ मे
आज से हम महिला मीटिंग मे जायँगे
एक सप्ताह तक आप घर चलायेंगे
आज का विशेश दिन हम अपनी
आज़ादी से शुरु करते हैं
आप सम्भालो घर की चारदिवारी
हम महिला मीटिंग मे चलते हैं
तुम बच्चोंको खिला पिला कर
स्कूल पहुँचा देना
घर के काम काज से निपट
माँ की टाँग दबा देना
बर्तन चौका सब निपटाना समय पर
हम रात को देर से लौटेंगे घर
बस फिर हफ्ता भर हमने
पती को खूब नचाया
महिलायों के जीवन का
वास्तविक दृ्षय दिखलाया
हमने अपनेअधिकार दिखा
कर धूम मचा दी
सदियों से चली आ रही
पती प्रथा की नींव हिला दी
तब सोचा ना था कि
ये महिला दिवस
इतना रंग लायेगा
कि अपने घर का
इतिहास बदल जायेगा


तारी 2 जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री अविनाश वाचस्‍पति

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री अविनाश वाचस्पति की रचना पढिये.

लेखक परिचय :-
अविनाश वाचस्‍पति,
साहित्‍यकार सदन, पहली मंजिल,
195 सन्‍त नगर,
नई दिल्‍ली 110065
मोबाइल 09868166586/09711537664



लालकिले को कैसे उड़ायेंगे ?

इस आजादी पर
जो कल आ रही है
पर पहले तो हम
भारतवासियों के
मन पर छा रही है

उसके मनाने से
ठीक पहली संध्‍या को
आतंकवादियों ने दी है
धमकी कि वे लालकिला
उड़ायेंगे , पर मैं सोच
रहा हूं कि क्‍या उड़
सकता है लालकिला भी।

अवश्‍य ही वे कल
एक पतंग उड़ायेंगे
उस पर लालकिले
की तस्‍वीर लगायेंगे
और करेंगे अपनी
तमन्‍ना पूरी उड़ाने
को लालकिले की।

लग रहा है आतंकवादी
बच्‍चे हैं
बच्‍चों को ही किसी को
भी उड़ता देखने की
होती है ख्‍वाहिश।

चाहे वे उनके खिलौने ही
हों , या विचार हों अथवा
प्रश्‍न हों उनके , जिनके
उत्‍तर न मिल सकते हों
पर वे उड़ते नजर आयें
जैसे उड़ते हैं गुब्‍बारे
तो बच्‍चे खुश हो जाते
हैं , मौज मनाते हैं।

हम भारतीय भी
आजादी की इसी
पूर्व संध्‍या पर
करते हैं घोषणा
कि हम आतंकवादियों
को उड़ायेंगे , नहीं उड़ाया
गर तो बंद कर देंगे
बांध देंगे या निकाल देंगे
उनकी हवा , जैसे गुब्‍बारे
बिना हवा के हो जाते हैं।

वही हश्र इस दफा करना
है , आतंकवादियों को
और उनके कुत्सित
मंसूबों को दफा करना है।

पोतनी है कालिख
उनकी करतूतों पर
और उतारना है नकाब
उनका , करना है चिंदी
चिंदी , बोलो जय भारत
जय जय भारत और
जय जय जय जय हिंदी।


तारी 1 जून 2010

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री दीपक 'मशाल'

प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में श्री दीपक मशाल की रचना पढिये.

लेखक परिचय
नाम : दीपक चौरसिया 'मशाल'
माता- श्रीमति विजयलक्ष्मी
पिता- श्री लोकेश कुमार चौरसिया
जन्म- २४ सितम्बर १९८०, उरई(उत्तर प्रदेश)
प्रारंभिक शिक्षा- कोंच(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- जैवप्रौद्योगिकी में परास्नातक, पी एच डी(शोधार्थी)
संस्थान- क्वीन'स विश्वविद्यालय, बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैण्ड, संयुक्त गणराज्य

१४ वर्ष की आयु से साहित्य रचना प्रारंभ की, प्रारंभ में सिर्फ लघु कथाओं, व्यंग्य एवं निबंध लिखने का प्रयास किया। कुछ अभिन्न मित्रों से प्रेरित और प्रोत्साहित होके धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी, कहानियां लिखनी प्रारंभ कीं. अब तक देश व क्षेत्र की कुछ ख्यातिलब्ध पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा का प्रकाशन, रचनाकार एवं शब्दकार में कुछ ग़ज़ल एवं कविताओं को स्थान मिला. श्रोताओं की तालियाँ, प्रेम एवं आशीर्वचनरूपी सम्मान व पुरस्कार प्राप्त किया.

हाल ही में प्रथम काव्य संग्रह 'अनुभूतियाँ' का शिवना प्रकाशन सीहोर से प्रकाशन.
रुचियाँ- साहित्य के अलावा चित्रकारी, अभिनय, पाककला, समीक्षा, निर्देशन, संगीत सुनने में खास रूचि।
ब्लॉग- मसि कागद(http://swarnimpal.blogspot.com)
email: mashal.com@gmail.com
संपर्क- +४४ ७५१५४७४९०९



भारतीय मुद्रा की इकाई बनता रुपया और गुमशुदा होता पैसा(एक व्यंग्य)------ दीपक 'मशाल'

'गरीबों की सुनो... वो तुम्हारी सुनेगा....

तुम एक पैसा दोगे ... वो एक लाख देगा...'

कहने की जरूरत नहीं समझ आती की इस गाने का एक-एक शब्द अब सिर्फ झूठ बन कर रह गया है. ना कोई गरीबों की सुनता है और न ही गरीब अब एक पैसा लेता है. सौ-पचास साल नहीं हुए साहब, अभी कुछ दशक पहले की ही बात है जब एक पैसा यथार्थ था और भारतीय मुद्रा की इकाई भी. बड़ी तेजी से कुछ ही सालों में पैसे की कीमत में गिरावट आयी और लोगों की नज़र में उस बेचारे की इज्ज़त में भी. बाज़ार से १, २ और ३ पैसे तो ऐसे ९-२-११ हुए जैसे कि सरकारी कार्यालय से ईमानदारी(अपवाद भाई इसे अन्यथा न लें.. मेरे साथ भी मजबूरी है अगर गधे के सर से सींग गायब होना बताया तो गधे जी भड़क सकते हैं या फिर मेनका गाँधी, लेकिन ये उपर्युक्त उदाहरण देने पर कोई भी सरकारी कर्मचारी सच्चे दिल से बुरा नहीं मानेगा.. क्योंकि इतनी ईमानदारी तो अभी बाकी है.. भाई).

आजकल तो अगर एक रुपैया किसी की जेब से निकलता है तो बगल वाला ऐसे छिटक के दूर खड़ा हो जाता है जैसे गलती से भिखारी के साथ खड़ा हो गया हो. अजी कितने साल बीत गए.. जरा हिसाब लगाना तो.. मुझे अभी २०-२५ साल पहले के अपने ही बचपन के दिन याद हैं भाई, जब इतवार के इतवार एक षठकोणीय २० पैसे का या दो लहरदार किनारे वाले १० पैसे के सिक्के साप्ताहिक जेबखर्च के रूप में मिलते थे. एक दोस्त को २० के बजाए २५ पैसे जेबखर्च मिलता था उसके बाबा से.. तो मुए से आज तक इसी बात पर दिल सुलगा रहता है कि उसे ५ पैसे ज्यादा क्यों मिलते थे?

आना!!! अजी आने-जाने वाला आना नहीं बल्कि आपसे पूछ रहा हूँ कि आना याद है? खैर आपकी तो स्मृतिदानी अभी तक दुरुस्त होगी और याद ही होगा कि आना क्या होता है या था.. पर आजकल के बच्चों को बेचारों को पता ही नहीं होता कि चवन्नी या चार आने और अठन्नी या आठ आने क्रमशः २५ और ५० पैसे के ही पर्यायवाची हैं. संभाल के पूछना कहीं उनमे से भी कुछ साहबजादे २५ पैसे का नाम सुनकर ही गश खाकर ना गिर जाएँ कि ये २५ पैसा या पैसा क्या बला है? असल में बेचारों को बचपन से ही एक रुपये से छोटी इकाई दिखाई ही नहीं गई. जब पैसे को ही कोई नहीं जानता तो आना तो 'आना, मेरे प्यार को ना तुम झूठा समझो जाना' की तरह बीते ज़माने की बात हो गई ना. लगता है अभी कल ही की बात है वैसे है तो अस्सी के दशक की के जब दशहरे, जवारे, नवरात्रि, ईद या ताजिया का मेला देखने जाना होता तो १ या २ रुपये मिलता था मेला घूमने के लिए. अब ये तो कहिये मत कि २ रुपये में आता क्या है, भाई उस समय २५ पैसे में चिड़ियामार बन्दूक से ४ गुब्बारों पर या सुई पर निशाना साधते थे(ये दीगर बात है कि पीछे चिपके कागज़ में छेद करने के अलावा और कुछ कर भी नहीं पाते थे), २५ पैसे के उबले चने, २५ पैसे का एक पापड़ और बचे पैसों की मूंगफली/ रेवड़ी या गज़क/बेसन की लच्छी की तरह का कुछ घर ले आते थे. कभी कभी ५० पैसे में झूला, मक्के के फूले(आज के पोपकोर्न) या मिट्टी कि गुल्लक/ तोता कुछ ले लेते थे.

भाई साहब १ रुपये में तो बेकमेन्स बिस्कुट का पैकेट आ जाता था हाथ में या सुबह सबेरे बज़रिया निकल गए तो १ रुपये में दो समोसे या आधा पाव जलेबी ही तुलवा लेते थे. एक रुपया क्या था उसकी तो महिमा अपरम्पार थी. जितने चाहो उतने ऑप्शन खोल लो, कोई पाबंदी नहीं. सुबह से शाम तक ऑप्शन(विकल्प) ही खोलते रहो लेकिन वो हैं कि बंद होने का नाम ही ना लेते थे. कसबे में जब नुमाइश(प्रदर्शनी) लगती तो १ रुपैया तो गज़ब ही ढाता था.. सर्कस देखना हो तो १ रुपैया, जादूगर का तमाशा देखना हो तो एक रुपैया जिंदाबाद, सोफ्टी एक रुपये, मौत का कुआं तो १ रुपैये में दो बार देख लो और दो बार ही अपने चेहरे झाँक लो टेढ़े-मेढ़े आइनों में(असल में वो आईने ही शक्लों को टेढ़ा-मेढ़ा बना देते थे लेकिन अपनी शक्ल कौन टेढ़ी कहे). अजी छोड़िये आज के सौ रुपये की बात, उस समय के १ रुपये के सामने आज के १०० की औकात क्या है?

अगर आपको याद हो तो डायमंड कॉमिक्स के एक बेहद चर्चित पात्र बिल्लू की कॉमिक्स में १ रुपये का बड़ा ही महत्त्व बताया गया था. कहीं दशहरे के मेले में बहुत भीड़ हो और आप छोटे कद के कारण भीतर घुसने में सक्षम ना हों तो कोई खोटा ही सही १ रुपये का सिक्का जमीं पर गिरा कर किसी से पूछ लो कि,''भाई, ये १ रुपये का सिक्का आपका गिरा पड़ा है क्या?'' फिर देखिये पूरा मेला उस सिक्के के लिए झगड़ जाएगा और एकदूसरे के ऊपर कूद-कूद पड़ेगा उस सिक्के पर अपनी मिलकियत साबित करने के लिए. बस आप आगे घुसके आराम से मेले का आनंद लीजिये. ये था चमत्कार एक रुपये का.

अगर कहीं रास्ते में पड़ा मिल गया तो... आहा.. हा!! फिर तो पूछिए ही मत. लगता था जैसे कि कोई लौटरी जीत ली हो. शाम को फ़ौरन ही उस रुपये की बदौलत प्लास्टिक का रंगीन चश्मा या प्लास्टिक की कलाई घड़ी(खिलौने वाली) मटक के हीरो बने इठलाते फिरते थे वर्ना कभी-कभी बहिन के लिए प्लास्टिक की स्प्रिंग वाली चूड़ी खरीद देते थे.

अब तो लोग चिल्लाये पड़े हैं कि 'एक रुपये में कर लीजिये बात, अपनों की अपनों के साथ.. बड़ी शान के साथ' भाई इत्ता सस्ता. १ रुपये को तो ऐसे देखते जैसे बेचारे एक रुपये की कोई इज्ज़त ही नहीं, जैसे रुपया लेकर नहीं बल्कि मुफ्त में बात करा रहे हों. अगर कुछ कह दिया तो ठुर्रस के साथ ये वचन सुनो कि, 'लल्ला!! १ रुपये की कम्पट चचोर(चूस) कर फेंक दोगे, पता भी ना लगेगा.. इधर १ रुपये में एस.टी.डी. बात करा रहे हैं सम्पूरण भारत मा'. बात भी सही लगती है कि एक रुपये में एक एल्पेन्लीबी(एक सोफिस्टीकेटिड कम्पट) आती है अब तो.

आप मानो या ना मानो लेकिन हमारे कसबे से सबसे नजदीकी कसबे का रेल किराया भी उन दिनों १ रूपया ही था और इधर आज तो भिखारी भी १ रुपये देने वाले को अपने से गया गुज़रा समझता है.

ऐसा नहीं है कि मुझे महंगाई बढ़ने से डर नहीं.. हाँ डर तो है लेकिन उससे ज्यादा डर है देश की मुद्रा की इकाई खोने का. मैंने आजतक इस तरह किसी देश की मुद्रा की इकाई का क्षरण होते नहीं देखा(अब आप पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका या नेपाल के उदाहरण मत ढूढने लगना.. उनके बारे में मेरा सामान्यज्ञान जरा कमज़ोर जो है). पेंस आज भी पौंड की इकाई है और सेंट डॉलर और यूरो की, फिर हम ही क्यों पैसे को भुलाये दे रहे हैं. देखते ही देखते अब १ रुपये के कम और ५ रुपये के सिक्के ज्यादा दिखने लगे हैं. ऐसा ना हो कि कल को १ रुपये भी चलन से बाहर हो जाये और हमारे बच्चे इकाई का मतलब ५ या १० रुपये समझ बैठें और आज का खेलता-दौड़ता बच्चा(अजी मैदान में नहीं बल्कि कम्पूटर पर दौड़ता-भागता.. मैदान अब धरे ही कहाँ हैं) कल 'इन्डियन करेंसी' की ‘यूनिट’ पर मेरी तरह ही कुछ लिख रहा हो.

दीपक 'मशाल'


तारी 1 जून 2010

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